मानवीय विचारों और भावों की अभिव्यक्ति शब्द के द्वारा संभव होती है। मानवीय शब्द अन्य प्राणियों की ध्वनि से अलग करते हैं। उच्चारण की दृष्टि से ध्वनि भाषा की सबसे लघुतम इकाई है, लेकिन सार्थकता की दृष्टि से ङ्खशब्दङ्ग को यह स्थान प्राप्त है। अर्थपरकता की दृष्टि से शब्द को ही भाषा की सबसे महत्वपूर्ण सार्थक इकाई माना जाता है। सामान्य व्यावहारिक बोलचाल में भी शब्द को भाषा का महत्वपूर्ण तत्व माना जाता है।
शब्द भाषा की ध्वनियों का सार्थक समूह है। शब्द ही भाषा में ध्वनियों को अर्थ वैभव व चमत्कार प्रदान करते हैं। शब्द ही अक्षरों के समूह से पद एवं वाक्य का निर्माण करते हैं। संस्कृत में मूल शब्द को प्रकृति या प्रतिपादन कहते हैं। मूल संस्कृत धातु शब्द से ही शब्द की उत्पत्ति मानी गई है। संस्कृत और हिन्दी की तरह पंजाबी, मराठी, बांग्ला, असमिया, उड़िया, गुजराती में भी इसे शब्द कहते हैं। दक्षिण भारतीय भाषा में कन्नड़ में शब्द के साथ-साथ 'नूडल' का भी प्रचलन है और तेलुगु में 'शब्दमु' के साथ 'पद्मू' का व्यवहार होता है। अंग्रेजी में इसे 'word' कहते हैं, जबकि फ्रेंच भाषा में 'श्दू', स्पेनिश में 'Mot', इटालियन में 'Palabra', जर्मन में इसे 'Parola', ग्रीस में इसे 'Wort', रूस में 'Slovo', जापान में 'Kotoba',अरबी, फारसी और उर्दू में इसे ङ्खलफ़्ज़ङ्ग कहा जाता है। संसार भर की भाषाओं में शब्द ही भाषा के सारे प्रकार्यों की संवाहक हैं।
प्राचीन संस्कृत विद्वान पतंजलि ने अपने महाभाष्य में सूचित किया है कि लोक व्यवहार में जिस ध्वनि से अर्थ का बोध होता है, वह शब्द है। उन्होंने यह भी कहा कि मुख से उच्चारित, कान से श्रुत, बुद्धि से ग्राह्य और प्रयोग से स्फूरित होने वाली आकाशव्यापी ध्वनि शब्द है। सत्य यही है कि शब्द के बिना किसी भी भाषा में भाषिक व्यवहार के किसी प्रकार्य की कल्पना नहीं की जा सकती है। जैसे-जैसे भाषा के कार्य क्षेत्र में विस्तार होता गया, शब्द की क्षमता प्रभेदों में भी विस्तार होता गया है।
भारतीय भाषाओं की शब्द संपदा - विश्व भाषाओं के रूप में हिन्दी की पहचान जिन आधारभूत विशेषताओं के कारण हुई है, उनमें से हिन्दी की विशाल शब्द संपदा का अपना विशेष महत्व है। अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर हिन्दी के प्रकाश विस्तार की संभावनाएं इसी कारण असीमित हुई हैं। विस्तृत विशाल भारतीय देश में जहाँ के लोग अनेकानेक भाषा परिवार से हैं, जिनमें अलग-अलग भाषा और बोलियों का प्रयोग किया जाता है, भारतीय संविधान की धारा-३४८ की आठवीं अनुसूची में भी अनेक भाषाओं को एक साथ राजकीय भाषा का दर्जा प्राप्त है। असमिया, उड़िया, बांग्ला, उर्दू, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगु, मलयालम, मणिपुरी, छत्तीसगढ़ी, संस्कृत, सिंधी, पंजाबी और भी न जाने कितने शब्द इन राष्ट्रीय भाषाओं में प्रवाहित होकर हिन्दी शब्द भंडार में समाहित होकर हिन्दी की शब्द संपदा को बढ़ाया है। इस प्रकार से भाषा शास्त्रियों ने लगभग ४५० शब्द ऐसे ढूंढ निकाले हैं, जिनका स्रोत अन्य भारतीय भाषा समूह से है।
भारत देश प्राचीन काल से ही विदेशियों के आकर्षण का केंद्र रहा है। उनके संपर्कों के द्वारा विदेशी भाषाओं का आदान-प्रदान भी व्यापक रूप से हुआ जिससे उनकी भाषाओं के अनेकों शब्द भारतीय भाषाओं में समाहित हो गए और इस प्रकार हिन्दी की विशाल शब्द संपदा को पाली, प्रकृत, अपभ्रंश और अन्य भारतीय भाषाओं के समानांतर अंग्रेजी, अरबी, फारसी, उर्दू, फ्रेंच, पुर्तगाली, डच, जापानी, रूसी, चीनी, रोमन आदि विदेशी भाषाओं की समृद्धि मिली है। परिणामस्वरूप हिन्दी भाषा का शब्द संपदा का भंडार समृद्ध व विस्तृत हुआ है। इसी कारण इसमें अभिव्यक्ति की विरासत के साथ विराटता आई है। किसी भी वैज्ञानिक मानक अंतरराष्ट्रीय भाषा से यही अपेक्षा की जाती है, कि उसमें पूर्व परंपरा से एवं नवीन प्रायोगिक द्वारा प्राप्त शब्दों को स्वीकारने, आत्मसात करने और अभिव्यक्त करने की क्षमता हो। हिन्दी भाषा ने अपनी क्षमता का बृहत्तर परिचय दिया है, इसका कारण बहुत ठोस व मजबूत है। हिन्दी भाषा में शब्द संपदा का वैविध्य और सम्प्रेषण कौशल अभूतपूर्व है। भारतीय दर्शन में शब्द को ङ्खब्रह्मङ्ग की संज्ञा दी गई है, इसके पीछे का मुख्य कारण यही है कि शब्दों के माध्यम से ही ज्ञान विज्ञान की सारी दिशाएँ नियमित और निर्धारित होती हैं। शब्द उस सघन मेघ की तरह है, जिससे अनंत अर्थों की अनवरत वर्षा होती है। शब्द की व्याख्या दार्शनिक, काव्यशास्त्रीय, वैयाकरण और भाषा विज्ञानी सभी ने की है, और सभी ने यह स्वीकार किया है, कि मनुष्य के लिए शब्द साध्य और साधन दोनों ही है। हिन्दी में उपलब्ध शब्दों का स्वरूप और विकास यह बतलाता है कि शब्दों का कोश भाषाई आदान-प्रदान के दायित्व के साथ लोक जीवन के गृहित शब्दों का समन्वय है।
पारिभाषिक शब्दावली – ङ्खशब्द विज्ञानङ्ग द्वारा शब्द समूह का वर्गीकरण किया जाता है, जिसमें प्रयोग और व्यवहार द्वारा विशेष विषय समूह के शब्दों को परिभाषित कर ङ्खशब्दावलीङ्ग के रूप में एक श्रृंखला तैयार की जाती है, जिससे उसे विशेष विषय से संबंधित नाम दिया जाता है। जिससे उस शब्दावली की पहचान बनती है जिसके बाद उसे पारिभाषिक शब्दावली कहा जाता है। डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार पारिभाषिक शब्दावली उसको कहते हैं जो शास्त्र या विज्ञान विशेष अर्थ में आते हैं। पारिभाषिक शब्दावली ने क्रमशः अपना रूपांतर व्यवस्था के आधुनिकीकरण और सभ्यता के वैज्ञानिकरण के कारण अर्जित किया है। अतः अब पारिभाषिक शब्दावली से तात्पर्य उन सभी शब्दाभिव्यक्तियों से है, जो नाट्यशास्त्र, प्रशासन, विज्ञान, व्यवहार में विशिष्ट अर्थ के लिए प्रयुक्त होते हैं। जैसे - वैज्ञानिक शब्दावली, प्रशासनिक शब्दावली, बैंक शब्दावली, कंप्यूटर शब्दावली, व्यावसायिक शब्दावली, पदनाम शब्दावली, कार्यालय अनुदेश इत्यादि।
हिन्दी में शब्दावली विषयक चिंतन का प्रारंभ भारत में द्विभाषीय कोश कार्य से हुआ है। अंग्रेजी भाषा के भारत में उसके व्यापक प्रभाव ने इस दिशा में अग्रसर होने के लिए प्रेरित किया। जिसकी वजह से हिन्दी-इंग्लिश के पारंपरिक कोषों ने भारतीय मानक शब्दावली की समस्याओं की ओर विचारकों का ध्यान आकृष्ट किया। तकनीकी, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, राजनैतिक, शिक्षा व्यवस्था तथा अन्य शास्त्रों के माध्यमों के लिए उपयुक्त मानक शब्दावली के निर्माण की समस्याओं के बारे में लगातार चिंतन मनन को प्रेरित किया। हिन्दी में शब्दावली के महत्व को निरंतर विकासशील प्राविधिक एवं प्रायोगिक उपलब्धियों के संदर्भ में स्वाधीनता के पश्चात तीव्रता से अनुभव किया गया। भारतीय भाषाओं में और हिन्दी भाषा के लिए स्वतंत्र पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण के प्रयास प्रारंभ से ही होते रहे हैं, और इस दिशा में प्रयास अनेक परिदृश्यों का स्पर्श करते किया है। हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली पारिभाषिक है, जिसे बोलचाल में प्रयोग नहीं किया जाता। यह केवल उन लोगों के कार्य व्यवहार के प्रयोग में लाई जाती है, जो किसी प्राविधिक विषय का विशेष अध्ययन करना चाहते हैं। निश्चित ही पारिभाषिक शब्दावली दैनिक व्यवहार में नहीं आती है। इसीलिए चिकित्सा विज्ञान, धातु अभियंत्रण के लिए प्रयुक्त होने वाले शब्दों को अंग्रेजी से हिन्दी में पर्यायीकरण न होने पर कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इसी कारण प्रत्येक भाषा की पारिभाषिक शब्दावली में सामान्य व्यवहार के शब्द बड़ी संख्या में ग्रहण कर लिए गए हैं। हिन्दी में अनेक भाषाओं के शब्द तद्भव रूप में समाहित हो चुके हैं, जैसे – अंग्रेजी के शब्द - जज, बैंक, रबर, मशीन, टिकट, बम, टीन, कॉफी, गिलास, पुलिस, टब, बीमा, बिस्कुट इत्यादि। फारसी भाषा के शब्द - अखबार, नौकर, जलेबी, वकील, चश्मा, दामाद, तमाचा, सितार, पुलिस, बीमा, यह सब।
तुर्की भाषा में – बहादुर, कुली, कैंची, तोप, चाकू, सौगात। पुर्तगाली में - अचार, बोतल, संतरा, नीलम, चाबी, गोभी, तौलिया, गमला, कमरा, प्रात, गोदाम, आलपिन इत्यादि। शब्द ग्रहण का यह सिद्धांत पारिभाषिक शब्दावली के संदर्भ में आकृष्ट करता है, शब्दावली में शब्द ग्रहण शब्दानुकूलन का रूप धर कर सामने आते हैं। इंग्लिश के अनेक शब्दों को हिन्दी ने अपने अनुकूल ढालकर ग्रहण किया है जैसे-अकादमी, तकनीक। शब्द ग्रहण द्वारा शब्दानुकूलन की सुविधाजनक शॉर्टकट में विचरना सुखदायक है, लेकिन इससे शब्दावली को परिभाषित करने की उलझन समाप्त नहीं होती है। नए सिरे से पारिभाषिक शब्दावली बनाने की जहमत उठाना तलवार की धार पर चलने के बराबर है।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने एक बार कहा था ङ्खहमें इतना साहसी होना चाहिए कि हम ऐसी विदेशी व पारिभाषिक शब्दावली को जिनका प्रचलन संसार के विभिन्न भागों में हो गया हो, उन्हें अपना लेना चाहिएङ्ग। काशी नागरी प्रचारणी हिन्दी सभा द्वारा प्रारंभ किए गए प्रयासों के द्वारा हिन्दी के लिए शब्दावली का चयन करते समय यह स्वीकार किया गया कि हमें पंडित नेहरू के विचारों से सहमत होकर उन्हें यथासंभव स्वीकार कर लिया जाए। ऐसे शब्दों की संख्या कुल शब्दावली का लगभग ३० प्रतिशत है। शेष शब्दों के लिए नवीन शब्दावली निर्मित किए जाने की कोशिश जारी है। अंग्रेजी के पारिभाषिक शब्दावली के हिन्दी के पर्याय बनाने वाले विशिष्ट लोगों में से प्रमुख हैं सुख सम्पत लाल भंडारी की पुस्तक की सभी गलतियाँ'।
राहुल सांकृत्यायन, डॉ. भगवान दास केला, गजाधर प्रसाद अंबष्ट और पराईबेट प्रमुख विद्वान हैं। हिन्दी के शब्दावली के स्वरूप को डॉ. रघुवीर ने अपने १७७२ पृष्ठ के बृहदारण्यक कोष में नई गति दी है। ज्ञान विज्ञान की लगभग ६०० शाखाओं में उपलब्ध लगभग २,००,००० शब्दों को डॉ. रघुवीर ने पारिभाषिक शब्दावली का स्वरूप प्रदान किया है। वस्तुतः शब्दावली के निर्माण क्रम में हिन्दी की प्रकृति, हिन्दी भाषियों की अभिरुचि एवं प्रयोग की सुगमता का ध्यान प्रत्येक शब्द निर्माता को रखना पड़ता है। भारत सरकार के केंद्रीय संस्थान ने इसी संकल्प के साथ पारिभाषिक शब्द संग्रह की प्रस्तुति की है कि सारे देश की पारिभाषिक शब्दावली संग्रह एक रूप प्राप्त कर सके। सामाजिक विज्ञान, प्रशासनिक एवं तकनीकी विज्ञान में प्रयुक्त होने वाले ङ्खशब्दङ्ग का अपना विशिष्ट औचित्य होता है। शब्द ही पूरी शब्दावली की प्रक्रिया के सूचक होते हैं। विचारों के समुचित आदान-प्रदान के लिए पारिभाषिक शब्दावली का विस्तार एवं मानकीकरण करना बहुत ही मुश्किल और कठिन प्रक्रिया है। यह एक सच्चाई है कि अंग्रेजी से उधार लिए गए शब्दों से अपनी राष्ट्रीय भाषा सशक्त एवं स्वतंत्र दिशा में उन्मुख नहीं होती, परन्तु फिर भी अनुकूल शब्द चयन शब्द ग्रहण से भाषा के सभी तत्व समान गति व स्वाभाविक प्रकृति का बोध होता है। बाह्य अंतर्विरोध से किसी भाषा के सभी तत्व समान गति नहीं बदलते लेकिन शब्द भंडार में उल्लेखनीय परिवर्तन लक्षित होते हैं। हिन्दी में ऐसे परिवर्तन अनेकों हुए हैं, और राष्ट्र भाषा के रूप में हिन्दी की विकास प्रक्रिया ने पारिभाषिक शब्दावली की समस्याओं को स्वतंत्र निर्माण की दिशा में प्रेरित किया है। हिन्दी के संस्कार एवं हिन्दी भाषाओं की परम्पराएँ इतनी गहरी हैं कि विदेशी भाषाओं के झोंके इस हिन्दी रूपी वटवृक्ष को नहीं हिला सके। पारिभाषिक शब्दावली के प्रयोगकर्ता रामविलास शर्मा ने यह स्वीकार किया है कि - हिन्दी ने अपने मूल शब्द भंडार की जिस तरह से रक्षा की है उसे देखते हुए इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि पारिभाषिक शब्दावली के लिए अंग्रेजी भाषा की शरण में न जाकर वह अपने ही भाषा तत्वों से पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण कर रही है। हिन्दी में कई विषय विशेष पर पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण हुआ है– जैसे पदनाम शब्दावली, प्रशासनिक शब्दावली, बैंक शब्दावली, कार्यालयी अनुदेश शब्दावली, व्यावसायिक शब्दावली, कंप्यूटर शब्दावली। जीवन विज्ञान व चिकित्सा शास्त्र में प्रयोग की जाने वाली शब्दावली का व्यावहारिक प्रयोग दुष्कर कार्य है, कारण अंग्रेजी भाषा का इसमें जबरदस्त दखल है कि इसे राष्ट्रीय शब्दावली को प्रयोग में लाना गहरी नदी को तैर कर पार करने जैसा है। इसीलिए हिन्दी शब्दावली का विकास हिन्दी की समन्वयात्मक सामाजिक परम्परा के अनुरूप हो और उसकी स्वीकार्यता बड़े पैमाने पर हो। तभी हिन्दी भाषा अपनी स्वीकार्यता सिद्ध कर पाएगी।
निष्कर्ष- भारतीय विद्वान अपना कार्य बड़ी निष्ठा और लगन से कर रहे हैं। भारतीय मानक शब्दावली के निर्माण की समस्या जितनी कठिन है, उससे भी दुष्कर है हिन्दी में स्वीकृत शब्दावली को स्वीकारने वाली उदार राष्ट्रीय मानसिकता का उदय होना। अंग्रेजी भाषा ने अपनी जड़ें बहुत फैला रखी हैं वह भारतीयों के जीवन के प्रत्येक पहलू में गहराई से रचबस गई है कि बचपन में प्रयोग में लाये गए शब्द सहसा छोड़े नहीं जा सकते। आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दी भाषा को उसकी मानक शब्दावली के प्रयोग के लिए राष्ट्रीय चेतना जागृत की जाये, बच्चों में जागरूकता व साहस उत्पन्न किया जाए, एवं उसकी स्वीकारता का प्रचार-प्रसार का प्रयत्न किया जाए राष्ट्रव्यापी स्तर पर। हिंदी में निर्मित पारिभाषिक शब्दावली प्रयोग और स्वीकार्यता की राह देख रही है।
डॉ. सीमा शेखर