माँ की साड़ी
यह भावुक कहानी एक माँ की साधारण सूती साड़ियों में छिपे असाधारण प्रेम और त्याग को दर्शाती है। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद माँ अपनी साड़ियों को बेहद सहेजकर रखती हैं और समय के साथ उन्हीं पुराने कपड़ों से गुड़िया के कपड़े, गोदड़ी, बेटी के लिए कपड़े के पैड, बच्चे की गोदड़ी, फ्रॉक और घर की अनेक उपयोगी चीज़ें बनाती रहती हैं। बेटी के लिए माँ की साड़ी केवल कपड़ा नहीं, बल्कि बचपन, ममता, सुरक्षा, संस्कार और अनगिनत यादों का प्रतीक बन जाती है। कहानी का भाव यही है कि महँगी चीज़ें हमेशा अनमोल नहीं होतीं; माँ के प्रेम से जुड़ी साधारण वस्तु भी पूरी दुनिया से अधिक कीमती हो सकती है।
मेरी माँ और पापा दोनों सरकारी स्कूल में शिक्षक थे। घर में हम तीन भाई-बहन, दादा-दादी और बुआ रहते थे। पापा पर पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी थी। तनख़्वाह आते ही उसका बड़ा हिस्सा घर के खर्च और पुराने कर्ज़ों में चला जाता था।
माँ को रोज़ स्कूल जाना होता था, इसलिए उन्हें कई साड़ियों की आवश्यकता रहती थी। लेकिन घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे महँगी साड़ियाँ खरीद सकें। इसलिए पापा शहर से माँ के लिए जोड़ वाली साड़ियाँ लाते थे। वे साड़ियाँ सस्ती होती थीं, मलमल और सूती कपड़े की बनी होती थीं-गर्मी में पहनने में आरामदायक और धोने में भी आसान।
माँ उन साड़ियों को बहुत सहेजकर रखती थीं। नई साड़ी कुछ दिनों तक स्कूल में पहनतीं, फिर धोकर, प्रेस करके अलमारी में बड़े जतन से तह लगाकर रख देतीं। हर साड़ी के बीच नेफ़्थलीन की गोलियाँ रखतीं, ताकि उनमें कीड़े न लगें। कभी-कभी अलमारी खोलकर साड़ी को सूँघतीं और मुस्कुराकर कहतीं, ठदेखो, अभी भी नई जैसी महक रही है।ङ्ग
एक ख़ास साड़ी
माँ की अलमारी में एक सितारों वाली साड़ी थी। वह साड़ी दादी ने उन्हें शादी के समय दी थी।
हर त्योहार पर माँ वही साड़ी पहनती थीं। दिवाली हो, रक्षाबंधन हो या मेरा जन्मदिन-माँ उसी साड़ी में सबसे सुंदर लगती थीं। पड़ोस की महिलाएँ भी कहतीं, ठसुशीला बहनजी, आज तो आप बिल्कुल दुल्हन लग रही हैं।ङ्ग
जब वह साड़ी बहुत पुरानी हो गई और उसके सितारे टूटने लगे, तब भी माँ ने उसे फेंका नहीं। उसकी लेस निकालकर मेरी गुड़िया के लिए लहंगा-चोली सिल दी और बचे हुए कपड़े से गुड्डे का साफ़ा बना दिया।
मैंने बड़े चाव से गुड्डे-गुड़िया की शादी रचाई। माँ हँसते हुए बोलीं, ठदेख, तेरी गुड़िया भी माँ की तरह सितारों वाली दुल्हन बन गई।ठ उस दिन सचमुच लगा था कि माँ के हाथों में जादू है।
मुझे आज भी वह दिन याद है, जब मुझे पहली बार माहवारी हुई थी। मैं बहुत डर गई थी। कुछ समझ नहीं आ रहा था। माँ ने मुझे देखा, पास बुलाया और गले से लगा लिया। बोलीं, ठबेटा, घबराना नहीं। यह हर लड़की के जीवन का स्वाभाविक पड़ाव है। इसमें शर्माने जैसी कोई बात नहीं।ङ्ग
फिर उन्होंने अलमारी खोली और अपनी एक पुरानी मलमल की साड़ी निकालकर छोटे-छोटे टुकड़ों में काटी। उन्हीं से मेरे लिए कपड़े के पैड बनाए और कुछ टुकड़े मेरे स्कूल बैग में भी रख दिए। मुस्कुराकर बोलीं, ठज़रूरत पड़े तो काम आएँगे। मेरी बेटी अब बड़ी हो गई है।
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उस रात मेरे पेट में बहुत दर्द था। मैं कराह रही थी। दादी ने कहा, ठरुक, तेरी माँ की साड़ी की गोदड़ी लाती हूँ।ङ्ग
वह गोदड़ी माँ की पाँच पुरानी सूती साड़ियों को जोड़कर बनाई गई थी। दादी ने उसे मेरे ऊपर ओढ़ा दिया और साथ में एक रज़ाई भी दी, जिस पर माँ की पुरानी साड़ी की खोल चढ़ी थी।
उस रात माँ के स्नेह और उस साड़ी की गर्माहट ने मेरे दर्द को जैसे अपने भीतर समेट लिया। नींद में भी माँ का हाथ मेरे सिर पर था।
समय पंख लगाकर उड़ गया। मैं बड़ी हुई, मेरी शादी हो गई। दादा-दादी इस दुनिया से विदा हो गए। बुआ भी अपने ससुराल चली गईं।
एक दिन मैं अपने बच्चे को लेकर मायके आई। अब घर की स्थिति पहले से बेहतर थी। माँ अब अच्छी और महँगी साड़ियाँ पहनने लगी थीं।
जब मेरे बेटे का जन्म हुआ, तब भी माँ ने अपनी पुरानी सूती साड़ियों से उसके लिए छोटी-छोटी गोदड़ियाँ, नैपकिन और खिलौने बना दिए। मुस्कुराकर बोलीं, ठनवासे के लिए नानी का आशीर्वाद है। पुराने सूती कपड़े सबसे मुलायम होते हैं।ङ्ग
माँ ने मेरी पहली फ्रॉक भी अपनी पुरानी साड़ी से ही बनवाई थी। वही फ्रॉक मैंने अपने दोनों भाइयों के यज्ञोपवीत संस्कार में पहनी थी। सबने कहा था, ठकितनी प्यारी लग रही है!ठ पर मैं जानती थी, वह केवल कपड़ा नहीं था-वह माँ का आशीर्वाद था।
आज मेरी अलमारी में दस-दस हज़ार रुपये की डिज़ाइनर साड़ियाँ हैं। लेकिन जब भी पुरानी अलमारी खोलती हूँ, नेफ़्थलीन की हल्की-सी खुशबू के साथ माँ की यादें बाहर चली आती हैं। वह महक किसी भी महँगे इत्र से कहीं अधिक अनमोल लगती है।
आज सोचती हूँ-माँ की वह सौ रुपये की जोड़ वाली साड़ी केवल एक साड़ी नहीं थी।
वही साड़ी मेरी पहली माहवारी का सहारा बनी।
वही साड़ी मेरी गुड़िया का लहंगा बनी।
वही साड़ी मेरी गोदड़ी बनी।
वही साड़ी मेरे बच्चे की गोदड़ी बनी।
वही साड़ी मेरी पहली फ्रॉक बनी।
वही साड़ी घर के पर्दे बनी।
वही साड़ी रज़ाई की खोल बनी।
वही साड़ी गद्दे का कवर बनी।
वही साड़ी टीवी का कवर बनी।
और अंत में वही साड़ी पोछे का कपड़ा भी बनी।
घर के हर कोने में माँ की साड़ी थी, और उसके हर धागे में माँ का प्रेम।
आज की महँगी साड़ियाँ केवल शरीर ढकती हैं,
लेकिन माँ की साड़ी पूरी ज़िंदगी सँभालती थी।
वह महँगी नहीं थी,
पर मेरे लिए दुनिया की सबसे अमीर साड़ी थी...
क्योंकि उसमें मेरी माँ रहती थी।
वंदना जानी
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