कुलदेवता
यह भावनात्मक कहानी एक परिवार की पीपल के पेड़ और कुलदेवता के प्रति गहरी आस्था, परंपरा और भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाती है। सड़क निर्माण के लिए जब पीपल के पेड़ को हटाने का आदेश आता है, तो 87 वर्षीय दादी अम्मा का मन टूट जाता है। परिवार विकास के रास्ते में बाधा नहीं बनना चाहता, लेकिन रमेश अपनी मां की भावनाओं को समझते हुए बिना मुआवजे के अपनी कृषि भूमि सड़क के लिए देने का प्रस्ताव जिलाधिकारी के सामने रखता है। संयोग से पता चलता है कि सड़क वास्तव में उसी खेत से बनाई जा सकती थी और पीपल का पेड़ बच जाता है। कहानी आस्था, पारिवारिक परंपरा, प्रकृति प्रेम और भावनाओं के सम्मान का सुंदर संदेश देती है।
आज दादी अम्मा की आंखों में अलग ही चमक दिखाई दे रही थी। नम होती आंखों को बार-बार पोंछती और सामने लगे पीपल के वृक्ष पर कलावा बांधते-बांधते दादी अम्मा भावुक हो उठतीं। मम्मी शायद दादी की भावनाओं को समझ रही थीं, तभी तो बार-बार वे दादी अम्मा को सहारा भी देतीं और उनका सहयोग भी कर रही थीं।
पता नहीं कब, कुछ किसी को कुछ याद तक नहीं कि घर के सामने हमारे ही किस पीढ़ी के पूर्वज ने एक पीपल का पेड़ लगाया था और वहीं एक बहुत छोटा-सा त्रिकोण-सा ईंटों का एक मंदिर-नुमा ढांचा बनवा दिया था। सब कहते कि वहां हमारे कुलदेवता निवास करते हैं और पीपल का वृक्ष उन पर छाया रखता है। यूं तो हमारे घर से कोई न कोई प्रतिदिन कुलदेवता के घर में दीपक जलाता ही था, पर यदि घर में कोई बीमार पड़ जाता या कोई परेशानी खड़ी हो जाती तो कुलदेवता को खूब याद किया जाता और तब वहां वह संकट टलने तक दादी अम्मा स्वयं ही रोज दीपक जलातीं और पीपल पर कलावा बांधतीं। उनका विश्वास था कि हमारे कुलदेवता जरूर हमारी सहायता करेंगे। मेरे पापा ने तो कुलदेवता के उस घर को टाइल्स से सजवा दिया था तथा पीपल के उस वृक्ष के चारों ओर चबूतरा बनवा दिया था। उस चबूतरे पर गांव के लोग भी रोज बैठकर अपनी महफिल देर रात तक जमाते थे, मेरे पापा भी उनके साथ ही बैठते। पीपल का वह पेड़ असल में मेरे परिवार की भावनाओं से तो जुड़ा ही था, वह गांव की पहचान भी बन गया था।
रामकृपाल जी की अपनी पैतृक हवेली गांव में जहां स्थित थी, उसी के पीछे उनकी कई एकड़ कृषि-भूमि भी थी और सामने था पीपल का पेड़। रामकृपाल जी तो स्वर्ग सिधार गए थे, पर पीपल के पेड़ के नीचे बने कुलदेवता पर दीपक जलाने और पीपल पर कलावा बांधने की परंपरा जो परिवार में चली आ रही थी, उसे उन्होंने बड़ी ही श्रद्धा से चालू रखा था। उसी परंपरा का निर्वहन अब उनका पुत्र रमेश और उसकी पत्नी कर रहे थे। इनका एकमात्र पुत्र मुन्ना, जो मुश्किल से ७-८ वर्ष का ही था, वह भी यह सब कौतूहलपूर्वक देखता था या यूं कह लें वह भी भविष्य के लिए इस परंपरा को चलाने की ट्रेनिंग ले रहा था। रामकृपाल जी की पत्नी यानी रमेश की माता जी यानी मुन्ना की दादी यशोदा ८७ वर्ष की अवस्था में भी कुलदेवता पर दीपक जलाना और पीपल के वृक्ष पर कलावा बांधना नहीं भूलतीं। कोई न हो तो भी वे मुन्ना का हाथ पकड़कर पीपल के पेड़ के नीचे चली आतीं।
एक दिन वज्रपात हो गया। सरकार का फरमान आ गया कि इधर से एक सड़क निकलेगी और वह पीपल का वृक्ष वहां से उखाड़ दिया जाएगा। पूरे घर में मातम छा गया। क्या हमारे कुलदेवता को हटा दिया जाएगा? हमारी पहचान बन चुके पीपल के पेड़ को भी हटा दिया जाएगा? सोचकर ही घर के पूरे सदस्य सदमे में आ जाते। रमेश जी खुद अंदर से दुखी थे, पर असहाय अवस्था में मां को समझाते, ठमां, तू ही बता, कुलदेवता तो हमारे मन में बसे हैं। गांव का विकास हो रहा है, शहर के लिए सड़क बन रही है तो क्या हम रोड़ा बन जाएं?ठ मां कुछ न बोल पातीं, पता नहीं विकास की बात वह समझ भी रही हैं या नहीं, बस उनकी आंखों से आंसू ढलक पड़ते। असल बात तो यह थी कि सब दुखी थे, पर आत्मसंतुष्टि का कोई न कोई तर्क गढ़ते, पर सफल कोई नहीं हो रहा था; सब एक-दूसरे से आंख बचा रहे थे।
बेचैन-से रमेश जी को एक उपाय सूझा और वे अगले दिन शहर में जिलाधिकारी महोदय से अकेले ही मिलने पहुंच गए। जिलाधिकारी महोदय को उन्होंने अपनी ८७ वर्षीय मां की भावनाओं का हवाला देते हुए प्रस्ताव रखा कि निर्माण होने वाली सड़क के लिए वे बिना किसी मुआवजे के अपने खेत की भूमि देने को तैयार हैं, बस हमारे पीपल के वृक्ष को सुरक्षित छोड़ दिया जाए।
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जिलाधिकारी महोदय आश्चर्य से रमेश के चेहरे को देख रहे थे। एक पीपल के वृक्ष के लिए, जिससे किसी फल तक की प्राप्ति नहीं होती, यह व्यक्ति अपनी कृषि-भूमि भी देने को तैयार है; बस इसलिए कि उस पीपल के पेड़ के नीचे उनके कुलदेवता वास करते हैं।
जिलाधिकारी महोदय यह भी सोच रहे थे कि काश आज भारत में हर पेड़ के नीचे किसी न किसी के कुलदेवता का वास होता, तो कोई पेड़ कटता ही नहीं, पर्यावरण की समस्या से जूझना ही नहीं पड़ता। उन्होंने पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों को बुलाकर रमेश जी के प्रस्ताव पर विचार करने के निर्देश दिए। पीडब्ल्यूडी अधिकारी बोले, ठसाहब, वह सड़क वास्तव में सुविधानुसार रमेश जी के खेत से ही निर्मित होनी थी, पर कृषि-भूमि होने के कारण उसकी उपलब्धता न होने की दशा में परियोजना विलंबित होती, इसलिए ही सड़क के निर्माण के लिए पीपल के वृक्ष वाली राह को चुना गया था। विभाग तो रमेश जी को उचित मुआवजा भी देने को तत्पर है।ठ रमेश जी तो हतप्रभ रह गए। उनके प्रस्ताव को इतनी सहजता से स्वीकार कर लिया जाएगा, इसकी तो उन्होंने कल्पना तक नहीं की थी।
घर वापस आकर रमेश जी अतिरेक में दरवाजे से चिल्ला रहे थे, ठमां! ओ मां! देख तो अपने कुलदेवता की महिमा! री मां, अब हमारे भगवान कहीं नहीं जाएंगे, हमारा पीपल यूं ही फैलता रहेगा।ठ
मां की आंखों में आंसू तो आज भी थे, पर ये आंसू उनकी श्रद्धा और विश्वास की जीत के थे।
बालेश्वर गुप्ता
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