झिझक

यह मार्मिक कहानी एक बेटे की उस झिझक और भावनात्मक दूरी को सामने लाती है, जिसके कारण वह जीवन रहते अपने पिता से खुलकर प्रेम व्यक्त नहीं कर पाया। पिता की मृत्यु के बाद उसे अपनी अधूरी भावनाओं और उन अनकहे शब्दों का गहरा पछतावा होता है। दिल्ली के कर्तव्य पथ पर एक असमय गिरे पत्ते को देखकर उसे अपने पिता की याद आती है और वह तय करता है कि अब वह अपने परिवार, मित्रों और आसपास के लोगों के प्रति प्रेम और संवेदनाओं को व्यक्त करने में कभी संकोच नहीं करेगा। कहानी का संदेश है कि प्यार जताने के लिए कल का इंतजार नहीं करना चाहिए।

Oct 8, 2026 - 13:02
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झिझक
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केन्द्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर एक से निकलकर वह अपने कार्यालय ठकर्तव्य भवनठ की ओर चल पड़ा। सेंट्रल विस्टा योजना के तहत इस पूरे इलाके का सौंदर्यीकरण किया जा रहा था। बहुत कुछ हो चुका था और बहुत कुछ होना शेष था। लाल पत्थरों से निर्मित समतल रास्ते के दोनों तरफ कई तरह के पेड़ और दो पेड़ों के मध्य पैन्सी, गेंदा, डैफोडिल फूलों की छोटी-छोटी क्यारियां रास्ते को और खूबसूरत बना रही थीं।
उधर इंडिया गेट जाने वाले कर्तव्य पथ पर गणतंत्र दिवस समारोह की तैयारी में जगह-जगह लगाए गए लाउडस्पीकर पर बजते गाने ठतेरी मिट्टी में मिल जावांठ का आनंद लेते हुए वह बढ़ा जा रहा था कि तभी सामने पड़े एक पत्ते को फुटबॉल की तरह पैरों से मारते हुए आगे बढ़ने लगा। अभी वह दो-चार कदम ही आगे बढ़ा था कि सहसा उसे लगा कि वह पत्ता असमय ही अपनी शाख से आ गिरा है। पर कैसे? आंधी ने, बंदरों ने या यह भी किसी आदमी की ही करतूत है? होते हैं कुछ लोग, जो चलते हुए अगल-बगल झाड़ियों और पौधों के पत्ते नोच लेते हैं। आजकल फिर कुछ असमय न हो जाए, इस आशंका से वह सदा घिरा रहता है। उसने पत्ते को एक किनारे कर, उसे ध्यान से देखना शुरू किया। हरे पत्ते पर गुलाबी-मैरून धारियां। तभी उसे अल्बर्ट कामू की पंक्तियां पत्ते पर जैसे उभरती जान पड़ीं-ठपतझड़ दूसरा वसंत है जहां हर एक पत्ता एक फूल-सा दिखता है।ठ पर अभी तो दिल्ली में वसंत का आगाज हुआ है।
वह पत्ते से ध्यान हटा आसपास के पेड़ों को देखने लगा कि किस अभागे पेड़ का यह पत्ता हो सकता है। यह पत्ता कुछ विशेष था। जहां तक उसका अनुमान था, यह निश्चित ही भारतीय मूल का नहीं था; पर जो कुछ सत्य, शिव, सुंदर है, उसे अपना मान लेने में एक अद्भुत गौरव है। आखिर हम सब तो एक ही पृथ्वी के बाशिंदे हैं। उसे उस पेड़ को पहचानने में देर नहीं लगी। वह उस पेड़ को स्पर्श कर उसके साथ सहानुभूति और समानुभूति दोनों जताना चाहता था, पर वह ऐसा नहीं कर सका। उसी के कार्यालय में कार्यरत लोग लगातार मेट्रो स्टेशन से निकल-निकलकर इस रास्ते बढ़े जा रहे थे। वे उसे उस पेड़ को ऐसे स्पर्श करते देखते तो क्या सोचते? वह झिझक और शर्म के मारे पेड़ को गलबाहीं करने का साहस नहीं कर पाया। हां, कार्यालय बढ़ने से पहले उसने पत्ते को रास्ते से उठाकर झाड़ियों के ऊपर रख दिया कि वह पैरों से कुचला न जाए।
पिता की मृत्यु के बाद उनके पार्थिव शरीर को आईसीयू से निकालकर ऐसे ही एक कोने में रख दिया गया था। पिता की अकाल मृत्यु का ध्यान आते ही उसकी चाल मंद पड़ गई। शनैः-शनैः बढ़ते हुए उसने स्वयं से जैसे प्रश्न किया कि उम्र के इस मोड़ पर इतना शील, संकोच, लज्जा, झिझक भी क्या? आम भारतीय लड़कों की तरह वह भी कभी पिता से उनके प्रति अपनी सुकुमार भावनाओं को व्यक्त करने से सदा झिझकता रहा। पढ़ाई के दौरान या नौकरी के बाद जब कभी अपने गृहनगर आना होता, तो पिता के चरण स्पर्श कर एक तरफ खड़ा हो जाता, जबकि वह पिता से लिपट जाना चाहता था। बचपन से ही पिता का अर्थ वह मात्र अनुशासन जानता था। उनके सम्मुख रहने पर 'सावधान' की मुद्रा में खड़ा होना है; 'विश्राम' भी नहीं। पिता जहां होते, वहां वह मजबूरीवश ही रहता, अन्यथा दूर ही रहता। हां, तो वह आता और पिता के चरण स्पर्श कर खड़ा हो जाता।

ठखुश रहो, खूब जियो! कैसे हो, अनु?ठ

ठठीक हूं।ठ

ठकमजोर-से हो गए हो।ठ
ठनहीं तो, ऐसे तो पहले से ही हूं।ठ 

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बस यही कुछ बातें और फिर वह भीतर चला जाता। और मां? आज अधेड़ होने को आया, पर अभी भी वह मां की गोद में लिपटकर सोता था। बेड पर लेटी मां के पेट पर सिर रखकर मोबाइल या टीवी देखता, पर कमरे में पिता के आते ही सलीके से बैठ जाता। पर अब तो उसकी दूरी मां से भी बन आई है। पिता की गंभीरता अब जैसे वह संभालने लगा है।
हाय रे, झिझक! वह आईसीयू में लाचार, बेबस पड़े पिता से लिपट न सका; बस आंसू बहाता, मन ही मन ठआई लव यू पापाठ बुदबुदाता रहा। मन ही मन ईश्वर से गिड़गिड़ाता रहा कि कोई चमत्कार कर दो... अगर उसके पापा बच गए तो वह हर दिन सुबह उठकर पूजा करेगा और बिना पूजा किए कभी भोजन नहीं करेगा... भीष्म प्रतिज्ञा! उसने अपनी सारी नास्तिकता, अविश्वास को क्षमा कर देने के लिए गिड़गिड़ाना जारी रखा। सच ही तो कहा था कभी उसके पिता ने कि लोग हारकर ही भगवान की शरण में जाते हैं। जब डॉक्टर ने कहा कि इनकी सांस गिरती जा रही है, मुश्किल है... तब भी पापा से लिपट न सका था; बस पापा के चरणों को स्पर्श कर इतना ही कह पाया था, ठजाओ पापा! जाओ निर्मोही!ठ पोस्टमार्टम के लिए भेजे जाने से पहले पुलिस जब अस्पताल में आकर शव से कपड़े हटाकर कुछ जांच-पड़ताल कर रही थी, तब भी वह अपने पिता से लिपटना चाहता था। और वहां पोस्टमार्टम वाले आदमी को हजार रुपया धीरे से पकड़ाते हुए गिड़गिड़ाया था, ठभैया! ज्यादा चीर-फाड़ मत करना।ठ दानापुर से बनारस एम्बुलेंस पर पार्थिव शरीर लाते हुए भी वह उस संज्ञा-शून्य पड़े शरीर को स्पर्श कर-करके रोना चाहता था, पर ऐसा न कर सका कि साथ में बैठे बहनोई यह न समझें कि भैया नौटंकी कर रहे हैं। फिर घर पर तो वह मां-बहनों को संभालने में ही लग गया और वहां से कैसे झट हरिश्चंद्र घाट पहुंचा; और फिर अग्नि ने तो लिपटने का अवसर ही नहीं दिया। चिता के सम्मुख उसने बस एक ही वादा किया था-ठपापा! खुद के मरने से पहले तुम्हें मरने नहीं दूंगा।ठ
स्मृतियों में डोलते-डोलते वह नेशनल आर्काइव के पास स्थित बस स्टैंड के पास पहुंच गया। यहां से उसे सावधानीपूर्वक सड़क पार कर कर्तव्य भवन के गेट संख्या एक से प्रवेश लेना था। सड़क पार करने का उपक्रम छोड़ वह जैसे वहीं ठिठका रह गया। आखिर कब तक वह झिझक-लाज के चंगुल में पड़ा रहेगा? जिंदगी धीरे-धीरे उसके भी हाथ से फिसलती जा रही है। अब जितना भी उसके पास समय शेष है, वह अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करेगा-चाहे उसके परिवार के सदस्य हों, मित्र हों या फिर सहकर्मी या फिर कोई अपरिचित। उसने निश्चय किया कि कार्यालय जाने में देरी हो तो हो... लोग उसे उस पेड़ को दोनों हाथों से पकड़े देखें तो देखें, वह उस पेड़ को दोनों हाथों से स्पर्श करके कहेगा, ठवह पत्ता मिट्टी से होते हुए फिर तुम्हारी शाख पर लौटेगा, बंधु!ठ ऐसा निश्चय कर वह उस पेड़ की ओर बढ़ चला, जिस पेड़ से वह पत्ता असमय आ गिरा था। उधर बढ़ते हुए उसे ऐसा लग रहा था मानो वह किसी पेड़ से नहीं, बल्कि अपने पिता से गले लगकर कहने जा रहा हो-ठमैं आपसे बहुत प्यार करता हूं पापा, बहुत... बहुत... बहुत।ठ 

अवेद्य आलोक

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