सॉरी बेटी
यह भावनात्मक कहानी एक तनावग्रस्त और थकी हुई माँ की मनःस्थिति को दर्शाती है, जो दिनभर बच्चों और घर की जिम्मेदारियों के बीच खुद के लिए समय नहीं निकाल पाती। अत्यधिक थकान और चिड़चिड़ाहट में वह अपनी छोटी बेटी पर गुस्सा कर बैठती है और बाद में उसे अपनी गलती का गहरा पछतावा होता है। माँ जब बेटी से माफी माँगती है, तो चार साल की मासूम बच्ची अपनी समझदारी भरी बातों से माँ को भावुक कर देती है। कहानी सिखाती है कि बच्चों से अवास्तविक अपेक्षाएँ रखने के बजाय धैर्य, प्रेम और समझदारी जरूरी है तथा माता-पिता का अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
तनावग्रस्त जीवन में हम खूबसूरत पलों को गँवा देते हैं। तनाव हमारी आँखों पर एक ऐसा पर्दा डाल देता है, जिससे जीवन का आनंद सामने होते हुए भी हमें दिखाई नहीं देता। ऐसे ही हम जीते जा रहे हैं और जो भी कर रहे हैं, उसका आनंद नहीं ले पा रहे हैं।
रोज़ सुबह की तरह ही आज की सुबह थी-बच्चे को स्कूल भेजना, नाश्ता करना, पति को ऑफिस भेजना आदि। अपने दैनिक कामों से फ्री हुई तो पता चला कि रुद्र को तो बुखार है। चलो, हो गई आज पूरे दिन की छुट्टी। यह सोचकर सिर का दर्द और बढ़ गया। लग गई अपने एक साल के बेटे की सेवा में और कब बेटी के स्कूल से आने का समय हो गया, पता ही नहीं चला। दौड़-भाग के उसको ले आई, तब तक बेटे ने पूरे घर को सिर पर उठा रखा था। उसको चुप कराने लगी तो बेटी को रोना आ गया।
ठमम्मा, मेरे कपड़े तो बदल दो।ठ
उसकी बात भी सही थी। मम्मा के दो ही हाथ, एक को संभालूँ तो दूसरा रोए। जैसे-तैसे लंच करवाया, खुद भी किया। सोचा, थोड़ा सो लूँ और इन दोनों को भी सुला दूँ, ताकि मुझे थोड़ा आराम मिले।
अभी मैं ये सोच ही रही थी कि बेटी पड़ोसी आंटी के बाल सँवारने चली गई, जो धूप बैठकर खुद को सुखा रही थी और इधर रुद्र को नींद आ रही थी। मेरे लाख आवाज़ देने के बाद भी बेटी नहीं आ रही थी। जैसे-जैसे वो आंटी के बाल सँवारे, वैसे-वैसे मेरा पारा बढ़ता जाए। आखिरकार मुझे गुस्सा आ ही गया। मैं उठी, उसको खींचते हुए लेके आई और जबरदस्ती सुला दिया। उसकी आँखों में नींद कहाँ? रुद्र को अब झपकी आने लगी थी। मैंने सोचा, ये दोनों सोएँ, फिर मैं भी सो जाऊँ, पर मेरे ऐसे भाग्य कहाँ।
नींद आने ही वाली थी कि बेटी की आवाज़ आई-ठमम्मा, प्यास लगी है, पानी दो।ठ
बस! अब तो मेरा पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया और मैंने एक जोरदार तमाचा उसके गालों पर जड़ दिया, साथ में डाँट भी लगाई-ठकब से बुला रही थी, आई क्यों नहीं? जब मुझे नींद आ रही है, तब तुम्हें पानी चाहिए। अगर दुबारा माँगी तो और पिटाई करूँगी!ठ
इतना सुनते ही बेचारी कंबल में मुँह डालकर सोने का प्रयास करने लगी। पर मेरी नींद तो उड़ गई। मन में पछतावा होने लगा कि ऐसा भी उसने क्या माँग लिया, जो मैं नहीं दे सकती थी? और ऐसा भी नहीं कि मैं उसको हमेशा मारती-डाँटती हूँ, बस थोड़ा डराने के लिए करती हूँ, पर आज कुछ ज़्यादा ही हो गया। वो तो सो गई, पर मेरे मन में संघर्ष जारी था। जब वो सोकर उठी तो मुझे देखकर कभी हँसे तो कभी गुस्से-सा मुँह बनाए। मैंने बोला, ठक्या हुआ?ठ तब बोली-ठआपने मुझे मारा।ठ
मैंने बोला-ठआप भी तो मुझे तंग करती हो न, बेटी?ठ
फिर बात खत्म हो गई। पर मेरा मन रोने को हो रहा था कि मैंने उसे क्यों मारा? मुझे अपने ऊपर नियंत्रण रखना चाहिए। वो तो बच्ची है। मेरे पास धैर्य नहीं है? क्या मैं इतना थक जा रही हूँ कि अपना गुस्सा अपने बच्चों पर निकाल रही हूँ? आखिर ये बच्चे हैं, कोई बड़े तो नहीं, जो मैं उनसे उम्मीद कर रही हूँ कि समय पर सोएँ, समय पर जागें, हर काम बड़ों की तरह ही करें। अभी तो उसकी चौथी वर्षगाँठ ही थी। मेरी उम्मीद ही गलत है। इतनी अपेक्षाएँ क्यों? एक चार साल की लड़की से?
इसी तरह सोचते-सोचते रात हो गई और जब मैं उसको सुलाने लगी तो मेरी आँखों में आँसू आ गए। मैंने बोला-ठबेटी, सॉरी!ठ
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पहले तो हँसी, फिर जब दूसरी बार बोला तो गंभीर हो गई और जब तीसरी बार बोला तो बोली-
ठमम्मा, आप सॉरी मत बोलो, क्योंकि आप मेरी मम्मा हो और मुझसे बड़ी हो। मुझे सॉरी बोलने की ज़रूरत नहीं है। आपका अधिकार है मेरे ऊपर। आपने कुछ गलत नहीं किया। आपने जो किया होगा, मेरी भलाई के लिए ही किया होगा। हर माँ ऐसे ही करती है। आपने भी किया है। अब आप सो जाओ।ठ
यह कहकर मुझसे लिपटकर निश्चिंत होकर सो गई। उसकी बातें सुनकर मुझे भी गिल्टी महसूस होने लगी कि इतनी छोटी होकर भी कितनी समझदारी की बातें कर रही है और एक मैं हूँ कि क्या कर रही हूँ। मेरे पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं थे उस छोटी-सी बच्ची के सामने।
अर्चना राय
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