उफ यह गर्मी

यह मार्मिक कहानी उमीदा के संघर्ष और विदर्भ की भीषण गर्मी के बीच गरीब मजदूर वर्ग की कठिन जिंदगी को सामने लाती है। मामूली पारिश्रमिक के लिए दिनभर तपती धूप में काम करने वाली उमीदा अपने बीमार भाई को खो चुकी है, फिर भी जीवन की जिम्मेदारियों से हार नहीं मानती। पानी की कमी, लू, भूख, झुग्गी का असुरक्षित जीवन और रोज़गार की मजबूरी के बावजूद वह अपने पशु-पक्षियों की देखभाल करती है और अगले दिन फिर काम पर निकल पड़ती है। कहानी गरीबी, श्रम, जल संकट, पर्यावरण और विपरीत परिस्थितियों में इंसानी जिजीविषा को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है।

Oct 8, 2026 - 13:13
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उफ यह गर्मी
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उमीदा कल जल्दी नहीं उठ पाई थी। परसों सिर्फ साठ रुपये के मिलने वाले पारिश्रमिक के लिए सुबह आठ बजे से ही प्रखर हुई धूप, जबकि शरीर का पानी सोखने लगी थी, कुल बारह जगह जाकर काम किया था उसने। ज्यादातर पैदल, एकाध जगह ही ऑटो और रिक्शा...। अँधेरा होने पर भी लू के थपेड़े वैसे ही पड़ते रहे थे। सुबह के लंच में रखी सब्जी दोपहर होने तक ख़राब हो गई थी। नाश्ते में रात का बचा मसाला चावल खा लिया था उसने। गनीमत थी कि उस दिन रात को लाइट नहीं गई थी, पर रोटियाँ सूखी ही खाई गईं प्याज-नमक के साथ। कई बार उसने बैग में रखी प्याज भी सूँघी चलते हुए, ताकि लू न लग जाए। जहाँ कहीं मीठा शर्बत बँटता देखा, रुक कर पिया भी और बॉटल में भी भर लिया। हर जगह सिर पर सफ़ेद कपड़ा बाँधे, कैप-स्कॉर्फ़ पहने, बचते-टूट पड़ते स्त्री-पुरुषों-बच्चों की मक्खियों की तरह भिनभिनाती भीड़! 


उफ़, घमौरियों से पटी उसकी पीठ, गर्दन, छाती पॉलिस्टर के कपड़ों से और घर से छिड़के पाउडर के बावजूद भी बीच-बीच में ऐसे चिलचिलाती रही जैसे कोई करेंट मार रहा हो। पूरे विदर्भ ने जैसे कलाई की सी गर्मी की प्रचंडता के आगे हथियार ही डाल दिए थे। रात करीब आठ बजे उसको झुग्गी बस्ती के लिए ऑटो वाले ने, गर्मी में लौटने में उस सुनसान से न मिलने वाली सवारियों के कारण, जाने से साफ़ मना कर दिया। एक किलोमीटर का ही अंतर था, पर उस समय भी चलती लू के थपेड़ों ने उसकी रही-सही शक्ति को भी पछाड़ दिया था। झुग्गी में नौ बजे तक प्रवेश करते-करते वह टूटे-मुरझाए पत्ते सी हो गई थी। कोने में बंधी बकरी मिमिया उठी, बैठा मोती भौंका और चुपचाप खड़ा मुर्गा रात में भी बाँग दे-देकर अपने भूखे-प्यासे पेटों का हवाला देने लगे। किसी तरह ख़ुद को साधकर उसने उनकी ज़रूरतों को पूरा किया।
पिछले हफ्ते उसका आठवीं क्लास में पढ़ता भाई आज ही के दिन उसे अकेला कर चल बसा था। उसका सुबह-सुबह बनाकर रखा खाना उससे खाया न जाता; यहाँ-वहाँ खाना तलाशता रहता-कभी भंडारा, तो कहीं दयावश दिया हुआ और कभी यूँ ही बँटता हुआ। बस, माँग-माँगकर खाता और काम चलाता रहता। रात वह आई तो देखा-उल्टी-दस्त से बदहाल हुआ, झोपड़ी में वह चेतना-शून्य सा पड़ा कराहा रहा था। अस्पताल ले गई, तो आधे फ़र्श पर बिछे रोगियों के साथ उसे भी लिटा दिया। एक साथ ही एकदम टाइफ़ाइड और पीलिया का प्रकोप ऐसा बढ़ा कि उसी रात उसने आँखें मूँद लीं। दुनिया में अकेला कर गया निर्मोही उसे!  

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सुबह आँख खुलने पर जब उमीदा ख़ाली कंटेनर लेकर पहुँची, तो जनविहीन नगर निगम का नल उसे मुँह चिढ़ा रहा था। पास लगे हैंडपंप पर उसने लाज-शर्म को तिलांजलि दे पानी डाल तपते शरीर को ठंडा किया और तीन-चार कंटेनर भर झोपड़ी में पहुँचा दिए। पशु-पक्षियों के आगे कुछ खाना-पानी रखा। रात आई तूफ़ानी आँधी से अस्त-व्यस्त हुए छप्पर के फूँस और प्लास्टिक से ढके टप्पर को बिखर गए पत्थरों और ईंटों से ठीक किया। कल के ही उतरे कपड़े पहने और सफ़ेद कपड़ा सिर पर बाँध निकल गई काम पर। पास खड़े घूरे के ढेर से सड़े आमों के छिलकों, गुठलियों और खाने की तीव्र दुर्गन्ध के गर्म हवा के साथ आए भभके ने वहाँ से निकलते वक्त साँस लेना दूभर कर दिया।
दूर-दूर तक चिथड़े बने गंदे ख़ाली पॉलीथीन, सूखे काले ख़ून से भीगे पैड और उड़े पत्तों के बीच चढ़ी मुरझाई उलझी फूल-मालाओं से रात आई आँधी अपना वर्चस्व सिद्ध कर रही थी। आँधी-रात शायद पानी भी लेकर आई थी। जोहड़ पर कपड़े धोती औरतें, नंग-धड़ंग कूदते-बदन ठंडा करते बच्चे और पानी पीतीं इक्का-दुक्का गाय-भैंस दिखाई दीं। उसने सोचा, सचमुच ही भीषण गर्मी से तो टक्कर पानी ही ले सकती है, फिर चाहे वह नालों, नहरों, तालाबों, कुओं का ही नीचे गिरते स्तर के साथ प्रदूषणों से घिरता ही क्यों न हो! 

किरन भण्डारी

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