कांटों बीच खिलता गुलाब
यह कहानी सलोनी की है, जो विवाह के बाद मानसिक प्रताड़ना, अपमान और दोहरी जिम्मेदारियों के बावजूद अपने करियर में सफलता हासिल करती है। प्रमोशन के दिन पति अखिल के कटु शब्द उसके भीतर वर्षों से दबे आत्मसम्मान को जगा देते हैं और वह अपनी घुटन भरी जिंदगी से बाहर निकलकर मां के पास जाने का फैसला करती है। मां का स्नेह और सहारा उसे नई ताकत देता है। अंततः अखिल को सलोनी की अहमियत और अपनी गलतियों का एहसास होता है और वह उसे वापस लेने पहुंचता है। कहानी आत्मसम्मान, नारी सशक्तिकरण, रिश्तों में सम्मान और जीवन में नई शुरुआत का संदेश देती है।
आज आइने में अपना प्रतिबिंब देखते हुए सलोनी मुस्कुराने लगी। आज उसका प्रमोशन होना था, मन ही मन अनगिनत सपनों के ताने-बाने बुनते हुए उसके चेहरे पर आत्मविश्वास जगमगा रहा था। चेहरे पर चाहे जितनी ही लिपापोती कर लो, पर असली खूबसूरती तो अंदर की खुशी से ही आती है। जिस प्रोजेक्ट के लिए उसने दिन-रात मेहनत की, आखिर वह सफलतापूर्वक पूरा हो गया, जिससे कंपनी को बड़ा मुनाफा होना था। इसी वजह से वह भीतर ही भीतर एक सुकून महसूस कर रही थी।
ठअखिल से तो दुख-दर्द में सहानुभूति मिलना भी दुर्लभ था, तो प्रमोशन की खुशी साझा करने का कोई सवाल ही नहीं था।ठ यही सब सोचते हुए अतीत का एक-एक पन्ना उसके मानस-पटल पर अंकित होने लगा। बचपन भी अभावों में ही बीता। पिता कैंसर के मरीज थे, वह चाहते थे कि उनके जीते-जी उसका विवाह कर एक बड़ी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएं। फिर आनन-फानन में उसकी शादी कर दी गई। वह मानसिक रूप से इस विवाह के लिए तैयार तो नहीं थी, पर परिस्थितियों ने उसके मुंह पर ताला लगा दिया था।
अखिल का परिवार केवल दिखने में ही आधुनिक था, किंतु ऐसे भावना-शून्य परिवार की तो उसने कल्पना तक नहीं की थी। वह इस घर में सारे काम भी स्वयं करे, नौकरी कर रुपया भी कमाए और अखिल की ज्यादती भी सहे-यही उसकी दिनचर्या हो गई थी। कभी-कभी बीमार पड़ने पर भी जरा-सा आराम उसे नसीब नहीं होता। इन सब के चलते वह मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुकी थी, पर अपना दर्द बताए भी तो किसे? पीहर में केवल मां थीं, जो स्वयं दुखी और अकेलेपन की शिकार थीं; उन्हें कुछ बताकर वह और दुखी नहीं करना चाहती थी। मां को निमोनिया हुआ तब सलोनी ने अखिल से कहा भी, ठकुछ दिनों के लिए मां को अपने घर बुला लेती हूं।ठ पर उसने साफ इंकार कर दिया। वह खून के घूंट पीकर रह गई।
वह तो अच्छा हुआ कि बचपन से ही मां सरस्वती की विशेष कृपा रही, जो आज मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत है। विचारों का मंथन थमने का नाम ही नहीं ले रहा था। सागर की लहरों की भांति उनकी आवाजाही अनवरत जारी थी।
तभी अखिल की कर्कश वाणी ने उसकी तंद्रा भंग की, ठवाह! क्या बात है मैडम, वहां बाबूजी नाश्ते का इंतजार कर रहे हैं और तुम्हें सजने-संवरने से फुर्सत नहीं।ठ
ठअखिल, नाश्ता टेबल पर रख दिया था। आज मेरा प्रमोशन है, मैं लंबे समय से जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी वह पूरा हो गया है। उस सिलसिले में ऑफिस में पार्टी रखी है, आज ऑफिस जल्दी पहुंचना जरूरी है।ठ
ठअरे वाह! लगता है तुम्हारा बॉस तुम पर बहुत फिदा है जो इतने कम समय में प्रमोशन भी दे दिया, क्या-क्या करती हो उसके लिए?ठ
ठशटअप अखिल, इतनी गंदी सोच है तुम्हारी! मैं यह नौकरी इस घर के लिए ही कर रही हूं। मेरी आधी इनकम तो तुम्हारे परिवार द्वारा लिए हुए हाउस लोन की ई.एम.आई. चुकता करने में ही निकल जाती है।ठ
यह सुनते ही अखिल आगबबूला हो उठा। उसकी आंखें अंगार उगलने लगीं, ठतुम्हारी ज़ुबान बहुत चलने लगी है। हद में रहो तुम वरना...ठ
ठरुक क्यों गए अखिल? बोलो, क्या कर लोगे? इस वक्त मुझे ऑफिस जाना है, वरना आज हम फैसला कर ही लेते।ठ
उसके सीने में दबी आग ने आज प्रचंड ज्वाला का रूप ले लिया था। नारी में जहां असीम सहनशक्ति है, वहीं जब वह विद्रोह पर उतर आए तो काली का रूप लेने में भी नहीं चूकती। शारीरिक और मानसिक त्रासदी को सहने की तो उसे आदत हो चुकी थी, किंतु उसके आत्म-सम्मान पर प्रहार उसके बर्दाश्त से बाहर था। आज तक वह यही सोचती रही कि समय के साथ-साथ परिस्थितियां सामान्य होने लगेंगी, किंतु जिसका हृदय ही पाषाण और स्वार्थ से भरा हो, वहां से उम्मीद की किरण रोशन होगी-यह अपेक्षा ही बेमानी है। यहां तो केवल अंधेरे बादल ही नजर आने हैं। मन-मस्तिष्क में जोरदार बिजली कौंधने लगी।
सावन की रिमझिम फुहार से उसके आर्द्र मन को अखिल के व्यंग्य-बाणों ने सुखाकर छलनी कर दिया। कुछ ही पल में खुशी, गर्मी में सूखे पेड़-सी मुरझा गई। मजबूरी भी ऐसी थी कि आंखों के जरिए अपना दर्द बहा भी न पाई, वरना ऑफिस में सब से क्या कहती।
ऑफिस पहुंचते ही उसने कहा, ठसॉरी सर, कुछ इमरजेंसी आ गई थी।ठ उसकी आंखों में छिपे दर्द को उसके कुछ कलीग्स पहचान गए। सभी से उसे अच्छे रिव्यू मिले, जिससे प्रमोशन और इंक्रीमेंट दोनों आसानी से हो गए।
आज पूरा दिन अखिल के कहे शब्द चिंगारी बन उसके ज़हन को सुलगा रहे थे। उसने निर्णय लिया कि ऑफिस से घर न जाकर वह सीधे मां के पास चली जाएगी। वैसे भी शादी के बाद मां के साथ रहना हुआ ही नहीं। मां बुलाती रहतीं, पर घर-ऑफिस के बीच जिंदगी यंत्रवत हो गई थी। अखिल के लिए पूरी तरह समर्पित रहने पर भी अगर वह यह सोचता है, तो क्यों न अपनी इस घुटन भरी जिंदगी से छुटकारा पाए?
विचारों का द्वंद्व छिड़ गया-जहां एक तरफ समाज, परिवार, लोगों की नजरें थीं; वहीं दूसरी ओर इस मुकाम पर पहुंचने के लिए किया हुआ संघर्ष, स्वयं का आत्म-सम्मान, खुशी और बेसहारा मां के प्रति एक बेटी का दायित्व उसे पुकार रहा था।
ठसमाज, परिवार इन सबके लिए पूरी जिंदगी को नर्क के अग्निकुंड में स्वाहा भी कर दूं तो क्या कोई मुझे इसका प्रमाण-पत्र देगा? नहीं-नहीं, तो क्यों न अब मैं अपने लिए जीना सीखूं।ठ आज विचारों के तराजू का पलड़ा उसके पक्ष में था। आंखों पर पट्टी बंधी न्याय की देवी जैसे स्वयं उसके हृदय में प्रवेश कर उसे इंसाफ दिलाना चाह रही हो। आज वह खुद ही अपनी वकील बनी और खुद ही न्यायाधीश।
ऑफिस से निकल उसने मां के घर के लिए कैब बुक की। वह तो अच्छा था जो मायका इसी शहर में था। आज मन में न कोई डर था, न कोई ऊहापोह।
बेटी को यूं अचानक देख मां को आश्चर्य हुआ। बिना पूर्व सूचना के आज यह कैसे आई होगी? उसके ससुराल वालों की मानसिकता उनसे छिपी नहीं थी। अपनी भावनाओं को उन्होंने संयत कर बेटी से कहा, ठतू जाकर हाथ-मुंह धो ले, तब तक मैं रसोई में खाने के लिए कुछ बनाती हूं। ऑफिस से एक फोन ही कर देती तो तेरे पसंद का भोजन तैयार रखती। तुझे भूख लगी होगी।ठ
सलोनी ने कहा, ठनहीं मां, इस समय आप कुछ मत बनाओ, मैं हम दोनों के लिए कुछ ऑर्डर कर देती हूं।ठ कहते हुए उसने मां का हाथ पकड़कर बिठा दिया और उनकी गोद में लेट गई। लंबे समय बाद आज इतना सुकून मिल रहा था।
मां का मन तरह-तरह की आशंकाओं से घिरा था, किंतु उन्हें अपने दिए गए संस्कारों पर पूरा भरोसा था।
सलोनी अपने प्रमोशन की बात मां को बताने लगी तो उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया। वह भावुक होकर कहने लगीं, ठबेटी, मुझे तुम पर गर्व है। बचपन से लेकर आज तक हमेशा तुमने हमारा मान बढ़ाया है। तुमने अपने दम पर ऊंचाइयां हासिल की हैं। तुम्हारे जैसी बेटी की मां होना मेरे लिए सौभाग्य की बात है।ठ कहते हुए उन्होंने सलोनी का माथा चूम लिया।
सलोनी कितना हल्का महसूस कर रही थी! मां के आंचल में मन की पीड़ा निश्चित ही कम हो जाती है। मन ही मन सोचने लगी—एक तरफ नारी को देवी रूप में पूजा जाता है और दूसरी ओर ढेरों दायित्वों का बोझ उस पर लादकर उसे अपमानित किया जाता है।
रात ग्यारह बजे तक जब वह घर नहीं पहुंची तो अखिल के तेवर सातवें आसमान पर पहुंच गए। उसने सलोनी को फोन किया। फोन रिसीव करने का तो उसका मन नहीं था, लेकिन फिर भी बेमन से ही उसने ठहेलोठ कहा। उस पर अखिल बिफर कर बोला, ठघड़ी देखी है? रात के ग्यारह बज रहे हैं और तुम अब तक घर नहीं आई। घर-गृहस्थी की कोई चिंता भी है या नहीं?
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मां के सामने बहस न हो, इसलिए वह बाहर आकर बात करने लगी, ठअखिल, गृहस्थी का मतलब समझ आता है तुम्हें? गृहस्थी उसे कहते हैं जहां एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान हो, दया-भाव हो, अपनों की खुशी में खुश और दुख में जो दुखी होता हो, जहां पति-पत्नी के बीच प्रेम का अहसास और एक-दूसरे के प्रति समर्पित भाव हो—वह होती है गृहस्थी।ठ
उसने दृढ़ता से कहा, ठमैंने आज से तुम्हारे घर की नौकरी छोड़ दी है। गलती हो गई मुझसे, जो स्वयं कठपुतली बन आपके हाथों अपने जीवन की डोर सौंप दी थी। पर अब ऐसा नहीं होगा।ठ कहते हुए उसने मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया।
अखिल स्वार्थवश पहले तो मन ही मन खीझ उठा, लेकिन धीरे-धीरे उसे सलोनी की अनुपस्थिति में सारे घर की हालत खस्ता होते दिख रही थी। उसने कभी उसके काम में हाथ नहीं बंटाया था। घर-बाहर दोहरी भूमिका वह बखूबी निभा रही थी। उसका पुरुषत्व उसे अपराध-बोध महसूस नहीं करने दे रहा था, पर आज उसे सलोनी की अहमियत समझ आ रही थी।
मां ने सलोनी की मनःस्थिति भांप ली। उन्होंने खुद ही कहा, ठबेटी, उस वक्त परिस्थितियों के आगे हम मजबूर थे। भावनाओं में बहकर और रिश्तेदारों के कहने पर जल्दबाजी में तुम्हारे जीवन का निर्णय कर बैठे। पर जब से तुम्हारी शादी हुई है, तुम्हारे चेहरे से मुस्कान नदारद है। इस तरह अकेले जिंदगी कैसे कटेगी बेटी? तुम चाहो तो जिंदगी की नई शुरुआत हो सकती है। जब तक तुम्हें खुशी से जिंदगी जीते नहीं देख लूं, मैं स्वयं अपराध-बोध में घिरी रहूंगी।ठ
ठमां, कैसी बातें कर रही हैं आप! किसी और के बारे में तो मैं सोच भी नहीं सकती। मैंने सच और ईमान का साथ कभी नहीं छोड़ा। माना कि झूठ और बेईमानी से खुशियां आसानी से मिल जाती हैं, लेकिन इन रास्तों से आने वाली खुशियों की उम्र अधिक नहीं रह पाती। रास्ते सब के अपने-अपने होते हैं मां, लेकिन मैं अपने आत्म-सम्मान के साथ समझौता कभी नहीं कर सकती। सीता मां और द्रौपदी भी इस चक्रव्यूह से नहीं बच पाईं, लेकिन अंत में जीत तो उन्हीं की हुई।ठ
तभी कॉल-बेल बजी। घर में प्रवेश करते हुए अखिल ने कहा, ठजब तक तुम पास थीं, तुम्हारी अहमियत नहीं समझ सका। हो सके तो मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हें और मां को लेने आया हूं।ठ
कुछ पल की खामोशी से आंखों के रास्ते सारे गिले-शिकवे धुल गए। लगा जीवन का नया सूर्योदय हुआ है। कांटों के बीच खिले गुलाब की सौरभ की तरह उसके जीवन में भी महक भर गई।
राजश्री राठी
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