माँ की थाली
यह भावनात्मक और सांस्कृतिक लेख मिथिला की पारंपरिक भोजन-परंपरा, माँ के स्नेह और बचपन की स्मृतियों को जीवंत करता है। शहर की भागदौड़ में सुबह का नाश्ता छोड़ने वाले लेखक को माँ की एक सहज सीख अपने गाँव के पुराने दिनों में पहुँचा देती है, जहाँ भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि परिवार, स्वास्थ्य और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा था। भात, दाल, साग, भुजिया, चटनी, अचार, दही और मौसमी सब्ज़ियों से सजी मिथिला की थाली में स्थानीय खेती, ऋतुओं और पीढ़ियों के अनुभव की झलक मिलती है। समस्तीपुर, लहेरियासराय और अन्य स्थानों के पारंपरिक भोजनालयों की यादों से लेख भोजन को जीवित सांस्कृतिक विरासत के रूप में प्रस्तुत करता है। रचना का मूल संदेश है कि संतुलित और विविधतापूर्ण भोजन के साथ माँ का प्रेम तथा अपनी जड़ों से जुड़ाव जीवन को समृद्ध बनाते हैं।
इन दिनों माँ स्वास्थ्य कारण से पटना आयी हुई हैं। अक्सर तो पूरा परिवार गाँव में रहता है और मैं अकेला रोज़ी-रोटी की दौड़ में शहर-दर-शहर पिछले डेढ़-दो दशक से भटकता रहा हूँ। शहर की जिंदगी ने मुझे ऐसा बना दिया है कि सुबह का अलार्म, भागदौड़, ट्रैफिक और सुबह का भोजन मिस होना मेरी दिनचर्या बन गयी है। लेकिन माँ के आते ही सुबह की हवा थोड़ी बदल गयी है। जैसे ही मैं जल्दी-जल्दी जूते पहनकर दरवाज़े की ओर बढ़ता हूँ, पीछे से माँ की पुकार सुनाई देती है-
ङ्खखाली पेट कियै जै छी? पेट खाली रहतै त दिमाग केना चलतै?
और मैं आधी मुस्कान और आधी लाचारी के साथ एक रोटी और थोड़ा भुजिया-सब्जी, जो भी रसोई की दीदी बना दे, दबाकर निकल जाता हूँ, मन ही मन कहते हुए-
ङ्खदुनिया के भागम-भाग में अनेक चीज़ें छूट गई हैं माँष्ठङ्ग
कल शाम ऑफिस से लौटकर माँ के साथ बैठा था। बातचीत के दौरान उन्होंने अचानक कहा-
ङ्खयाद छै ने? बच्चा में गाँव में केकरो खाली पेट बाहर जाएत देख लहि रे?
बस, यही एक वाक्य मुझे सीधे अपने बचपन के गाँव के आँगन में वापस ले गया। आँखें बंद करते ही-सुबह की हल्की धूप, रसोई से उठती दाल की भाप और चाची का वह मार पसाते हुए चावल बनाना-सब कुछ फिर से आँखों के सामने तैर गया। और याद आए बड़ा बाबूजी एवं छोट्टा बाबूजी और पिताजी-जो काम पर जाने से पहले थाली के सामने ऐसे बैठते जैसे पूजा हो।
हमारी थाली में हमेशा-भात, दाल, कम से कम एक हरी सब्ज़ी, भुजिया, साग, चटनी, अचार, नींबू और दही होता। शाम में अक्सर भुंजा, रात में रोटी-दाल-सब्जी-दूध और सप्ताह में एक-दो बार मछली (मांसाहारियों के लिए)।
हम बच्चों के लिए बथुआ, तोरी, गेन्हरी, चौराई, सनई का साग दवाई जैसा नहीं, खेल जैसा होता-जो ज्यादा खाएगा वही जीतेगा। बथुआ या गेन्हरी का साग खा लेना वैसा ही होता था जैसे आजकल बच्चे चिप्स या चॉकलेट खाकर खुश होते हैं। और अगर किसी ने थोड़ा कटोरी ज़्यादा खा लिया-तो उस दिन वह पूरे घर का चैंपियन बन जाता था।
तब कभी सोचा ही नहीं था कि यह विविधता केवल समझदारी नहीं, बल्कि विज्ञान थी। न कोई किताब, न शोध-पत्र-सिर्फ सहज बुद्धि और पीढ़ियों की समझ।
कुछ दिन पहले समस्तीपुर जाना हुआ। रजिस्ट्री ऑफिस के पास वही पुराना होटल दिख गया, जहाँ बचपन में पिताजी और चाचा के साथ खाया करता था। वहाँ आधा प्लेट भात लेने पर दाल, दो सब्ज़ी, भुजिया, साग, चटनी, तिलौरी, तरुआ, पापड़ और नींबू मिलता था-और चावल का दाम, दाल-सब्ज़ी निःशुल्क।
उस दिन भीड़ कम थी, पर थाली की आत्मा अब भी वैसी ही थी।
ऐसी ही थाली मैंने लहेरियासराय टॉवर के लगभग सौ वर्ष पुराने एक होटल में भी खाई है, जिसका ज़िक्र १९३० में लिखी हरिमोहन झा की किताब में भी मिलता है। मधुबनी स्टेशन और सहरसा कोसी निवास के बगल वाले होटल में भी वही स्वाद, वही अपनापन, वही संस्कृति महसूस होती है। तब लगा-यह सब सिर्फ भोजन नहीं, इतिहास की जीवित प्रतियाँ हैं।
लोग कहते हैं कि बारातियों के स्वागत की अपनी अलग परंपरा तो मिथिला में ही देखने को मिलती है। विवाह के अवसर पर रंग-बिरंगे व्यंजन परोसे जाते हैं। सिर्फ मिठाई या मांस ही नहीं-तरुआ, तिलौरी, तिलकोर, साग-सब्ज़ी, दही, दूध से बने पदार्थ जैसे शकरौरी, चटनी और मछली-सब कुछ परोसा जाता है। जिसने कभी मिथिला का बारात भोज खाया है, वह जानता है कि वहाँ भोजन की विविधता केवल व्यंजनों की संख्या नहीं होती; ङङपूरी खाद्य विविधता एक साथ थाली में उतर आती है-मानो हमारी थाली में भोजन का पूरा विज्ञान सिमट आया हो।
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और सोचिए-भगवान का भोग भी हमारे यहाँ छप्पन भोग है। जैसे हमारी संस्कृति ने आहार की विविधता को भी उत्सव का रूप दे दिया हो। यह केवल आस्था नहीं-स्वास्थ्य, स्वाद और प्रेम, तीनों का संगम है।
ङ्खशायद यही मिथिला की खासियत है-यहाँ थाली में केवल भोजन नहीं सजता, मिट्टी, मौसम, खेती और पीढ़ियों की समझ भी साथ परोसी जाती है।
रात में माँ ने फिर कहा-
ङ्खखाली पेट ई सुखल भोजन कतेक चलतौ?ङ्ग
और इस बार यह डाँट नहीं, आशीर्वाद जैसा लगा।
माँ ने थाली मेरी ओर सरका दी।
उस दिन पहली बार लगा-मिथिला की थाली केवल पेट भरने की चीज़ नहीं है। उसमें खेत हैं, ऋतुएँ हैं, रिश्ते हैं और पीढ़ियों की स्मृति है।
और शायद माँ ठीक ही कहती थीं-
ङ्खपेट खाली रहतै त दिमाग केना चलतै?
डॉ. राकेश कुमार झा
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