सेवानिवृत्ति नई पारी
यह प्रेरणादायक हिंदी कहानी अविनाश जी के सेवानिवृत्ति के बाद के जीवन की यात्रा को दर्शाती है। वर्षों तक नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियों में व्यस्त रहने के बाद वे जीवन में एक खालीपन महसूस करते हैं। पुरानी डायरियों में लिखी अधूरी कविताओं और कहानियों से उनका पुनः जुड़ाव उन्हें लेखन की ओर प्रेरित करता है। धीरे-धीरे वे अपनी रचनात्मक प्रतिभा को पहचानते हैं और एक नए रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं। कहानी संदेश देती है कि सेवानिवृत्ति जीवन का अंत नहीं, बल्कि अपनी रुचियों, सपनों और आत्म-पहचान को साकार करने की नई शुरुआत है।
ऑफिस में भव्य सेवानिवृत्तिऔर भावभीनी विदाई समारोह के बाद जब अविनाश जी फूल-मालाओं से लदे-फदे घर पहुँचे, तो परिजनों और शुभचिंतकों ने उनका दिल खोलकर स्वागत किया। हँसी-मज़ाक, तस्वीरें, शुभकामनाएँ-सब कुछ जैसे एक उत्सव की तरह था।
देर रात जब सब सो गए, थकान के बावजूद उनकी आँखों से नींद कोसों दूर थी।
मन के भीतर एक चलचित्र चल रहा था-नियुक्ति-पत्र का मिलना, पहली बार दफ्तर पहुँचना, पहला प्रमोशन, फिर जिम्मेदारियों के साथ चार और पदोन्नतियाँ, और अंततः सेवानिवृत्ति।
इन वर्षों में कितना कुछ बदल गया था-परिवार बढ़ा, सुविधाएँ बढ़ीं, सामाजिक दायरा विस्तृत हुआ; पर साथ ही तनाव भी बढ़ा, बीमारियाँ भी बढ़ीं। पत्नी आशा के सतत सहयोग ने उन्हें हर कठिन मोड़ पर सँभाला। उपलब्धियों को उन्होंने जी-भरकर जिया और चुनौतियों का सामना सजगता से किया।
यादों की धारा में बहते-बहते कब वह ख्वाबों की दुनिया में चले गए, उन्हें पता ही न चला।
सुबह छह बजे, वर्षों से बनी आदत के अनुसार उनकी नींद खुल गई।
आशा मुस्कुराते हुए बोली-
ङ्खआज आपकी नई सुबह है, अविनाश। कुछ देर और आँखें बंद कर पिछली सौग़ातों को महसूस कीजिए, फिर नई ऊर्जा के साथ जीवन की नई पारी शुरू कीजिए।ङ्ग
अविनाश ने मुस्कुराकर आँखें मूँद लीं।
पहला दिन बेहद खुशनुमा रहा-शुभचिंतकों की बधाइयाँ, दोस्तों की चुहल, रात का डिनर।
अगले कई दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा।
पंद्रह दिन बाद वे परिवार सहित दक्षिण भारत की यात्रा पर निकल गए-प्रकृति की आग़ोश में। समुद्र, मंदिर, नई जगहें, नई अनुभूतियाँ।
समय जैसे उड़ता जा रहा था।
पर दो-तीन महीने बाद धीरे-धीरे एकरसता ने दस्तक दी।
दिनचर्या तय हो गई थी-
सुबह पाँच बजे उठना, टहलना, योग, नाश्ता, बगीचे की देखभाल, दोपहर का भोजन, शाम को मित्रों के साथ गपशप, और रात दस बजे तक नींद।
सब कुछ व्यवस्थित था, पर भीतर कहीं न कहीं एक रिक्तता बनी रहती।
वे दिनचर्या बदलने के बारे में सबकी सलाह लेते, उसे आज़माते, पर मन का एक कोना रिक्त ही रहता।
समाज सेवा से आत्मिक संतोष मिला, पर भीतर कुछ अब भी अधूरा था-जैसे मन किसी अनजानी तलाश में भटक रहा हो।
एक दिन आशा ने अलमारी से कागज़ों का ढेर निकालकर उनके सामने रख दिया-
ङ्खज़रूरी कागज़ अलग कर लीजिए, बाकी रद्दी में दे देंगे।ङ्ग
अनमने मन से कागज़ उलटते-पलटते अचानक उन्हें दो पुरानी डायरियाँ मिलीं।
बीस वर्ष पुरानी-पीले पड़ चुके पन्ने, पर अक्षर अब भी जीवंत।
उत्सुकतावश उन्होंने पन्ने पलटने शुरू किए। अधूरी कविताएँष्ठ अधूरी कहानियाँष्ठ अधूरे विचारष्ठ। पहले वह मन की किसी भी कल्पना को डायरी में उड़ेल देते थे। पर समयाभाव में दुबारा उसे पलटकर नहीं देखते थे। कहानी पूरी करने का विचार तत्कालीन समय में मूर्त रूप नहीं ले सका था। पिछले कुछ वर्षों में उनका यह क्रम अत्यधिक व्यस्तता, ज़िम्मेदारियों एवं तनाव के बाद छूट ही गया था।
एक अधूरी कहानी पर उनकी नज़र ठहर गई।
लगभग छह सौ शब्द-पर भावनाओं से भरी। उसे वह सायं तक पता नहीं, कितनी बार पढ़ गए। रात को सोते वक्त वही कहानी उनके मन में घूमती रही।
नींद नहीं आई, तो वे चुपचाप उठे और डायरी लेकर बैठ गए।
ङ्खअविनाश, इतनी रात तक क्या कर रहे हैं?ङ्ग
ङ्खइतनी रात! क्या समय हो गया?ङ्ग
ङ्खरात के दो बज रहे हैं। आखिर चल क्या रहा है?ङ्ग
अविनाश हल्के-से चौंके, फिर मुस्कुराए-
ङ्खमन में दबी कामनाओं को साकार रूप दे रहा हूँ, आशा। बीस साल पहले छोड़ी कहानी पूरी कर ली।ङ्ग
आशा की आँखों में विस्मय था-
ङ्खतो यही बेचैनी थी इन महीनों कीष्ठ अब आपके समय को उसका रास्ता मिल गया।ङ्ग
अगली सुबह अविनाश के लिए एक नई सुबह थी, जिसमें मन मयूर कभी अंतरिक्ष की ऊँचाइयों में खो जाता, कभी सागर की गहराइयों में गोता लगाता।
अगले दिन से लिखना उनकी दिनचर्या बन गया। डायरी के अधूरे पन्नों के अतिरिक्त, सुबह की सैर में उन्हें कथानक मिलने लगा—बगीचे के फूल, उगता सूरज, चहलक़दमी करती सड़कें, चाय की चुस्कियों के मध्य आने वाली बुज़ुर्गों की समस्याएँ।
उन्होंने १५ कहानियों को संकलित कर छपने के लिए प्रकाशन केंद्र में भेज दिया।
कुछ सप्ताह बाद स्वीकृति का मेल आ गया। कहानियों को किताब में सिमटना कुछ दिनों की बात थी।
मेल खोलकर वे देर तक चुपचाप बैठे रहे। उन्हें वही आनंद मिला, जो पहली नियुक्ति-पत्र के समय मिला था। पर इसमें उत्तेजना का ज्वार-भाटा न था, बल्कि संतोष व संयम की गहराई थी।
अब उनके मन का खालीपन, कविताओं व कहानियों के शब्दों से भरने लगा था।
वे लिखते, पढ़ते, साहित्यिक गोष्ठियों में निमंत्रित होते, और धीरे-धीरे उनकी एक नई पहचान बनने लगी-अविनाश (सेवानिवृत्त अधिकारी), सुप्रसिद्ध रचनाकार।
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एक शाम चाय पीते हुए आशा ने पूछा-
ङ्खअब कैसा लग रहा है रिटायरमेंट?ङ्ग
अविनाश मुस्कुराए-
ङ्खपहले लगता था, रिटायरमेंट अंत है। अब लगता है-यह एक नई शुरुआत है।ङ्ग
आशा ने कहा-ङ्खनई पारी की बधाई।ङ्ग
उस रात उन्होंने डायरी में लिखा-
पहली पारी जिम्मेदारियों की थी, दूसरी पारी आत्म-पहचान की है। पहले समय से दौड़ता रहा, अब समय के साथ चल रहा हूँ।
गोपाल कृष्ण श्रीवास्तव
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