बोलेगी ना पापा
यह भावुक हिंदी कहानी रमेश और अस्पताल में उनकी देखभाल करने वाली नर्स स्नेह के बीच बने अनोखे रिश्ते की कहानी है। दुर्घटना के बाद अस्पताल में भर्ती रमेश को स्नेह की सेवा, आत्मीयता और अपनापन इतना प्रभावित करता है कि वे उसे अपनी बेटी मानने लगते हैं। स्नेह भी उनके प्रति बेटी जैसा स्नेह दिखाती है और उनकी विवाह वर्षगाँठ मनाकर पूरे परिवार को भावुक कर देती है। रक्षाबंधन के अवसर पर जब स्नेह रमेश के बेटों को राखी बाँधती है, तो परिवार में बेटी की कमी भी पूरी होती दिखाई देती है। अंत में रमेश उससे उन्हें अंकल के बजाय पापा कहने का आग्रह करते हैं और स्नेह इस रिश्ते को सहर्ष स्वीकार कर लेती है। कहानी का संदेश है कि रिश्ते केवल खून से नहीं बनते; प्रेम, सेवा, विश्वास और अपनापन भी अजनबियों को परिवार बना सकते हैं।
मैं कहाँ हूँ, यहाँ मैं कैसे आ गया, बेटा बताओ तो मुझे क्या हुआ है?
नाक पर ऑक्सीजन का मास्क, शरीर हिलने-डुलने जैसा भी नहीं, कमर पर, हाथ पर बेल्ट, सब कुछ असामान्य-सा, पर धीरे-धीरे मस्तिष्क काम करने लगा। कुछ हुआ तो है, पर क्या और कैसे, कुछ याद नहीं। मास्क चढ़े मुँह से भरभरी आवाज़ में उक्त प्रश्न रमेश अपने सिरहाने एक स्टूल पर बैठी नर्स से पूछ रहा था। नर्स बहुत ही स्नेह से मेरे बालों में हाथ फिराते हुए बोली, ठअंकल, आपका एक्सीडेंट हो गया था। अब आप जल्द ठीक हो जाएँगे, आप बिल्कुल न सोचें।ठ
तीन दिन रमेश आई.सी.यू. में रहा और कभी दिन में तो कभी रात्रि में उस नर्स की ड्यूटी उसके बेड पर ही रही। दोनों का एक दिन में ही काफी लगाव हो गया था। रमेश बोला, ठएक बात बताओ, सिस्टर, क्या मैं तुम्हें बिटिया बोला करूँ, तुम्हें कोई ऐतराज तो नहीं?ठ अरे अंकल, मैं आपकी बिटिया ही तो हूँ। फिर आँखों में आँसू भरकर बोली, ठअंकल, आप पहले हैं, जो रिश्ते में बाँधने चले हैं, नहीं तो हम तो अंकल, रूटीन की सिस्टर बनकर रह गए हैं। रिश्ता तो बस मरीज और नर्स का है हमारा। सच कहूँ अंकल, बिटिया कहकर आपने मुझे रुला ही दिया।ठ
रमेश ने धीरे से उसका हाथ दबा दिया। उस स्नेह-रूपा नर्स का नाम भी स्नेह ही था। शाम को जब रमेश की पत्नी मिलने आई तो रमेश बोला, ठसुनती हो, देखो, तुम कहती थी ना कि हमारी कोई बेटी नहीं है, देखो, यहाँ हॉस्पिटल में पड़े-पड़े मैं तुम्हें हमारी बिटिया से मिलवा रहा हूँ। यह है हमारी बिटिया स्नेह।ठ
स्नेह भी रमेश की पत्नी के गले से लग गई। तीन दिन बाद रमेश को एक कमरे में शिफ्ट कर दिया गया।
रमेश हॉस्पिटल में पंद्रह दिन और रहा। इस बीच स्नेह की ड्यूटी जैसे ही समाप्त होती, सीधे रमेश के कमरे में आ जाती और सारी व्यवस्थाओं को देखती। वहाँ के स्टाफ को बड़े ही अधिकार से कहती, ठदेखो, ये मेरे अंकल हैं, इनको कोई भी तकलीफ नहीं होनी चाहिए।ठ फिर दो-दो घंटे वो मेरे और मेरी पत्नी के पास बैठी रहती।
और एक दिन तो गजब ही हो गया। स्नेह पूरे स्टाफ के साथ एक ट्रॉली में केक सजाए रमेश के कमरे में प्रवेश करती है और दरवाजे से ही तालियाँ बजाकर, ठहैप्पी मैरिज एनिवर्सरी,ठ बोली। हम एकदम चौंक गए। ध्यान आया, हाँ, आज तो वाकई हमारी विवाह वर्षगाँठ है। आश्चर्य से रमेश व उसकी पत्नी स्नेह की ओर देख रहे थे कि उसे इस दिन का पता कैसे चला? तभी मेरे दोनों बेटे भी कमरे में आ गए। बोले, ठपापा, ताज्जुब मत करो, तारीख हमने बताई, पर सब करा-धरा स्नेह ने ही।ठ
रमेश की आँखों में आँसू थे। उसने स्नेह को अपनी ओर खींचकर गले से लगा लिया। रमेश की पत्नी और बेटे भी हमारे इस स्नेह-मिलन से भावुक हो रहे थे। तभी ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजने लगीं। डॉक्टर भी आ गए और सबने रमेश और उसकी पत्नी से केक कटवाया और उन्हें उपहार दिए। लग ही नहीं रहा था कि वो हॉस्पिटल में हैं।
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रमेश हॉस्पिटल से अपने घर आ गया था। स्नेह अब कभी भी घर आ जाती थी। उस दिन रमेश के घर उत्सव जैसा वातावरण रहता। रक्षाबंधन पर स्नेह ने रमेश के बेटों को राखी बाँधी। तब रमेश को लग रहा था, परिवार तो पूरा हो गया। बेटे तो थे और अब बेटी भी मिल गई, पर कुछ टीस-सी मन में थी।
राखी बाँध स्नेह बोली, ठअच्छा अंकल, अब मैं चलती हूँ।ठ
रमेश एकदम चौंका और सकुचा कर बोला, ठसुन स्नेह, मेरे पास आ। देख, तूने हमें बिटिया तो दे दी, आज हमें पापा-मम्मी का दर्जा भी दे दे बेटी। मत बुलाकर अंकल, बुलाकर पापा। बोलेगी ना पापा?ठ और स्नेह रोती हुई लिपट गई अपने पापा से।
बालेश्वर गुप्ता
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