टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना

यह बाल-कहानी प्रोफेसर योगेश, उनकी टाइम मशीन और रोबोट रोबू के साथ आरव और अनाया की रोमांचक समय-यात्रा पर आधारित है। अतीत में बच्चे सीमित संसाधनों के बावजूद सीखने के प्रति विद्यार्थियों का उत्साह देखते हैं, जबकि भविष्य में चंद्रमा पर रोबोट शिक्षकों और आधुनिक तकनीक से युक्त शिक्षा-व्यवस्था का अनुभव करते हैं। इन यात्राओं से उन्हें समझ आता है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल आधुनिक सुविधाएँ जुटाना नहीं, बल्कि ज्ञान प्राप्त करना, जिज्ञासा विकसित करना और समाज के लिए उपयोगी कार्य करना है। अंततः बच्चे अपने शहर में ‘भविष्य का वाचनालय’ स्थापित करने में योगदान देते हैं। यह कहानी विज्ञान, कल्पनाशीलता, शिक्षा, तकनीक, पुस्तक-पठन और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रेरक संदेश देती है।

Oct 9, 2026 - 15:23
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टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना
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पहाड़ों से घिरे शहर बुद्धिग्राम में प्रोफेसर योगेश रहते थे। उनके सफेद बाल, बड़ी-बड़ी आंखों पर मोटा चश्मा और जेब में हमेशा कोई न कोई अजीब गैजेट रहता। लोग उन्हें सवालों वाले प्रोफेसर कहते थे, क्योंकि वे हर चीज का 'क्यों' पूछते थे।
प्रोफेसर के घर के पीछे वाले कमरे में हमेशा धुएं जैसी गंध आती। पड़ोस में रहने वाले बच्चे आरव और अनाया को बहुत जिज्ञासा थी। एक दिन वे चुपके से अंदर झांकने गए, तो देखा-कमरे के बीच में लोहे और तारों से बनी कमरेनुमा एक अजीब-सी मशीन खड़ी थी। उसके पास एक गोल-मटोल रोबोट खड़ा था, जिसकी आंखें एलईडी की तरह चमक रही थीं। 'अरे! तुम यहां?' प्रोफेसर ने पीछे से आवाज दी। दोनों बच्चे डर गए। 'प्रोफेसर साहब, ये क्या है?' आरव ने हिम्मत करके पूछा। प्रोफेसर हंस पड़े। 'ये है मेरी टाइम मशीन। और ये है मेरा प्यारा रोबोट रोबू, मेरा सहायक। पिछले पंद्रह वर्ष से मैं इसी पर काम कर रहा हूं।' अनाया आश्चर्यचकित रह गई। 'टाइम मशीन! सच में? क्या हम अतीत में जा सकते हैं?' 'जा सकते हैं, लेकिन एक शर्त पर,' प्रोफेसर गंभीर होते हुए बोले, 'टाइम मशीन सिर्फ ज्ञान लेने के लिए चलती है, मनोरंजन करने के लिए नहीं। तुम्हारी सुरक्षा के लिए रोबू तुम्हारे साथ जाएगा।'
आरव और अनाया ने तुरंत 'हां' कर दी। रोबू आगे बढ़ा और टिन-टिन आवाज करते हुए बोला, 'नमस्ते मित्रों! मैं रोबू हूं। मेरा काम बच्चों को सुरक्षित रखना एवं बोरिंग होने से बचाना है।' टाइम मशीन के अंदर तीन कुर्सियां लगी थीं। बीच में एक बड़ा लीवर दिखाई दे रहा था। प्रोफेसर योगेश ने कहा, 'तुम कहां जाना चाहोगे?' आरव बोला, 'मैं हमारे गांव का पुराना स्कूल देखना चाहता हूं। दादाजी कहते हैं, सौ वर्ष पहले यहां सिर्फ एक बरगद के नीचे पढ़ाई होती थी।' अनाया बोली, 'और मैं जानना चाहती हूं कि दो सौ वर्ष बाद पढ़ाई कैसे होगी?' प्रोफेसर ने दोनों को आवश्यक निर्देश दिए और रोबू के साथ उन्हें मशीन में लगी कुर्सी पर बिठा दिया, फिर लीवर खींचा। मशीन में गर्र-गर्र की आवाज हुई। चारों तरफ नीली रोशनी घूम गई। रोबू ने दोनों का हाथ पकड़ लिया। तीन... दो... एक... और उड़ान शुरू! आंख खुली, तो वे एक बड़े बरगद के नीचे थे। न स्कूल की बिल्डिंग थी, न बेंच। जमीन पर बोरे बिछे थे। पंद्रह-बीस बच्चे स्लेट-पट्टी लेकर बैठे थे। एक बूढ़े गुरुजी लाठी के सहारे पढ़ा रहे थे।
'नमस्कार बच्चों!' गुरुजी बोले, 'आज हम 'सच्चाई' पर कविता सीखेंगे।' एक लड़की उठी। उसके कपड़े पुराने थे, पर आंखों में उत्साह था। उसने कविता सुनाई, 'सच बोले तो डर नहीं, झूठ बोले तो घर नहीं।' आरव और अनाया को अजीब लगा। न बिजली, न पंखा, न किताबें, न बैठने के लिए बेंच। फिर भी बच्चे इतने ध्यान से सुन और पढ़ रहे थे।
रोबू फुसफुसाया, 'देखो, इनके पास साधन कम है, पर पढ़ने का उत्साह बहुत है।' तभी एक लड़का आया और गुरुजी के पैर छुए, 'गुरुजी, आज मैं स्कूल नहीं आ पाऊंगा। खेत में काम है।'
गुरुजी ने उसकी पीठ थपथपाई और कहा, 'कोई बात नहीं बेटा। शाम को आकर मुझसे पढ़ लेना। ज्ञान के लिए समय निकालना पड़ता है।' अनाया की आंखें भर आईं। उसने धीरे से कहा, 'आज हमारे पास सब कुछ है, मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट, स्मार्ट क्लास। फिर भी हम बहाने बनाते रहते हैं।' 


तभी 'पिंग... पिंग...' की आवाज सुनाई दी। रोबू बोला, 'अलर्ट! टाइम मशीन का चार्ज बीस मिनट और बचा है। अब हमें वापस चलना होगा।' वापस आने पर प्रोफेसर ने पूछा, 'इस यात्रा से क्या सीखा?' आरव बोला, 'कि पढ़ाई के लिए बड़ी बिल्डिंग नहीं, बड़ा मन चाहिए।' प्रोफेसर खुश हुए, 'शाबाश! अब हम टाइम मशीन को चार्ज कर फिर दूसरी यात्रा पर चलेंगे।' 'हां! बहुत मजा आएगा,' दोनों एक साथ बोले।
दूसरी बार वे दो सौ वर्ष आगे की शिक्षण व्यवस्था देखने गए। यह वर्ष था दो हजार दो सौ छब्बीस। यह कॉलेज चांद पर था। यहां कॉलेज व हर घर की छत पर सोलर पैनल लगे हुए थे। स्कूल जाने-आने के लिए अंतरिक्षयान और उड़ने वाली कारें थीं। कॉलेज में पढ़ाने के लिए इंसानों की जगह शिक्षक के रूप में रोबोट थे। हर छात्र के पास अपना कंप्यूटर था। अब न किताबें थीं, न स्कूल बैग, न पेन और नोटबुक।
उन्होंने देखा, कक्षा में एक रोबोट आया, जिसका नाम 'इतिहास डॉट कॉम' था। वह छात्रों को अपने पूर्वजों के बारे में बता रहा था। उसने बताया कि सन १९६९ में नील आर्मस्ट्रांग नामक एक इंसान पहली बार चांद पर आया था। फिर उसने बताया कि कैसे सन १९९५ में छात्र नोट्स लिखने के लिए कागज व कलम का प्रयोग करते थे।
उसके बाद भूगोल के टीचर 'भूगोल डॉट कॉम' ने बताया, 'धरती की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट है। मंगल के एक ज्वालामुखी पर्वत ओलिंपस मॉन्स के आगे माउंट एवरेस्ट भी पिद्दी-सा लगता है।'
धरती के बच्चे चांद पर बने कॉलेज में पढ़ने जाते हैं। उन्होंने देखा कि वहां कॉलेज में कई रोबोट बच्चों के दोस्त हैं। वे सब साथ में खेलने के साथ बातें भी कर रहे हैं।
थोड़ी देर में कसरत के शिक्षक 'पी.टी.आई. डॉट कॉम' की कक्षा थी। सब छात्र मैदान में आ गए। यहां ढेर सारे क्रेटर हैं। उन्हें देख आरव ने कहा, 'इनके कारण नील आर्मस्ट्रांग भी जरूर गिरे होंगे। मैं भी अभी स्पेसबॉल से खेल रहा था, तो क्रेटर में गिर पड़ा था। लेकिन इन छोटी-छोटी बातों को छोड़ दें, तो यहां घूमना-फिरना काफी आनंददायक है, क्योंकि यहां गुरुत्वाकर्षण शक्ति इतनी कम है कि लोग लगभग हवा में उड़ते रहते हैं।'

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अनाया ने एक छात्र से पूछा, 'तुम्हें टीचर डांटते नहीं?' एक डॉट कॉम टीचर ने यह सुन लिया। वह अनाया के पास आया और मुस्कराते हुए बोला, 'यहां किसी को डांट नहीं पड़ती। यहां सीखने के सौ तरीके हैं। सब अपने तरीके से सीखते हैं।' रोबू बोला, 'अब भविष्य काल से वापस लौटने का समय हो गया है।' सब आकर टाइम मशीन में बैठ गए। कुछ देर बाद प्रोफेसर ने टाइम मशीन बंद कर दी। मशीन से बाहर आने पर प्रोफेसर ने पूछा, 'बच्चों, अब आखिरी सवाल। तुम अपने शहर के लिए क्या करोगे?' आरव और अनाया ने एक-दूसरे को देखा और मन में आए विचार प्रोफेसर को बताए। वे बहुत खुश हुए। अगले ही हफ्ते शहर के खाली पड़े सामुदायिक भवन में 'भविष्य का वाचनालय' खुल गया। इसके लिए प्रोफेसर ने पूरी मदद की। वाचनालय के दरवाजे के ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था, 'कल से सीखो, आज को संवारो।' एक तरफ ज्ञान-विज्ञान की किताबें, दूसरी तरफ दो कंप्यूटर, जो प्रोफेसर ने दान किए। बीच में पढ़ने के लिए टेबल व कुर्सियां। हर शाम रोबू वहां जाता और बच्चों को कहानियां सुनाता। कभी सौ साल पहले वाले गुरुजी की, कभी दो सौ साल बाद चंद्रमा पर पढ़ाई की।
एक दिन जिलाधीश उनके शहर आए। वाचनालय देखकर बोले, 'ये आइडिया कहां से आया?' आरव ने रोबू की तरफ इशारा किया। रोबू ने टिन-टिन करते हुए कहा, 'टाइम मशीन से, सर। पर असली मशीन तो बच्चों का दिमाग है।' सब हंस पड़े। प्रोफेसर ने दूर खड़े होकर देखा और बुदबुदाए, 'मेरी टाइम मशीन सफल हो गई!' रात को सोने से पहले अनाया ने डायरी में लिखा, 'समय आगे भी जाता है, पीछे भी। पर सबसे जरूरी है-आज। आज हम क्या कर रहे हैं, इसी से कल बनेगा।' और रोबू? वो तो सबका पक्का दोस्त बन गया था और अब भी वाचनालय में है। उसकी छाती पर एक स्टीकर लगा है-'ज्ञान बांटने से बढ़ता है।' 

राजकुमार जैन राजन

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