पटरियाँ

'तुम्हारे पिता ने तो मुंबई में फ्लैट देने का वायदा किया था !’ पिता जी से सारी बात बता भी नहीं सकती थी। एकबार जब प्रतिवाद करने की कोशिश की तो गुस्से में रमेश उसका गला दबाने लगा था। बात कुछ यूँ हुई। बार-बार पिता के लिए अपमान सूचक शब्दों को सुनते - सुनते वह बिफर गई थी । आप हमेशा पापा के लिए ऐसे क्यों बोलते रहते हैं ?’ 'क्या कोई लुच्चा-लफंगा है मेरे पापा ?’ हां, तुम्हारा बाप लुच्चा-लफंगा ही है ।

Apr 16, 2024 - 15:05
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पटरियाँ
tracks
ठक.. ठक.... ठक....।
रात के दस बजे रहे थे। रमेश के दरवाजे खटखटाने की आवाज सुनकर श्वेता थपकी से सुलाते बच्चे को छोड़ दरवाजे की ओर लपक पड़ी। दरवाजे खुलने के साथ ही रमेश साइड टेबुल पर ऑफिस बैग रखकर वह हाथ-मुंह धोने चला गया । मां की  सुखद गर्माहट से विलग बच्चा कुनमुनाने के साथ  अब ठुनकना भी शुरू कर दिया।  मां के वापस आते -आते वह सप्तम सुर के उच्चतम शिखर पर पहुंच चुका था।
एंऽऽऽऽ
एंऽऽऽऽ
एंऽऽऽऽ.....
आनन-फानन में बच्चे को गोद में लेकर कंधों पर सिर टिकाये थपथपाहट के साथ  दुलराते  चुप कराने में ही लगी थी कि रमेश झटके से बच्चे को अपने हाथों में लेते हुए विकृत चेहरे के साथ झिड़की  की कड़वी घूँट पिलाते हुए बोल पड़ा,
दिनभर क्या करती हो ?’
'एक बच्चा भी नहीं संभलता है ।’
'घर में सभी जगह खिलौने-कपड़े बिखरे पड़े हैं ।’
'सोफे पर भी बैठने की  जगह नहीं है।’
'घर को कबाड़ बनाकर रख छोड़ती है ।’
वह  सोफे पर  कुक्कू को लेकर टीवी दिखा-दिखा कर खिलाने की कोशिश कर रही थी तो सारे खिलौने इधर-उधर, अस्त-व्यस्त बिखरे हुए थे । खुद वह भी अस्त-व्यस्त ही रहती ।
नई गृहस्थी, छोटे बच्चे के साथ  वह भाग-दौड़ वाली स्थिति में ही रहती ।
अपने बनाव-शृंगार से  भी बेहद उदासीन !
उसके बोलने का क्रम जारी था।
'घर में घुसते ही रोना सुनो..... ।'
'दिमाग खराब हो जाता है!'
और इसतरह बड़बड़ाते हुए ही बच्चे पर ध्यान केंद्रित करने लगा।
यह तो लगभग प्रत्येक दिन की बात थी। पिता का प्यार-भरा स्पर्श से बच्चा चुप हो गया। रमेश अपने बच्चे को अत्यधिक प्यार करता था । कुक्कू था भी बहुत ही प्यारा ।
बिल्कुल रमेश की शक्ल-सूरत वाला नन्हा रमेश !
श्वेता रसोई में जाकर सब्जी गर्मकर रोटियां सेंक कर थाली सजाकर ले आई तो उसने देखा कि सज-धज कर रमेश अपने बालों को अंतिम टच दे रहा था।
उधर पलंग  के बीचों-बीच बच्चा  हाथ-पांव मारते, किलकारी भरते हुए हाथी को पटक-पटक कर खेल रहा खेल रहा था। पटकने के साथ ही प्रतिध्वनि सुनकर किलक उठता। परफ्यूम की खुशबू से सारा कमरा महमहा रहा था। टाई की नॉट ठीक करते हुए उखड़े अंदाज में उसने सूचित करते हुए कहा,
'बास की शादी की सालगिरह है।'    
'वहीं जा रहा हूं।’
'आने में देर हो जाएगी ।’
अपनी बातों को पूरा करते-करते  कुक्कू के गालों को थपथपाते बाहर निकल चुका था ।
दरवाजे बंद कर जहाजनुमा पलंग पर बैठते हुए गाड़ी के गेट से निकलने की  साँय-सी आवाज सुनाई  पड़ी। भरभरा आई आँखों के आँसू घुटकने के संभवतः प्रयास में कुक्कू को संभालने लगी । बच्चे पर खीज उतारती हुई बड़बड़ाने लगी,
'दिन में अपनी नींद पूरी कर लेता है।’
'रात में  इसे खेल चाहिए ।’
जोर-जोर से थपकी देती उसे सुलाने के लिए प्रयास करने लगी।
उधर स्टीयरिंग पर हाथ घुमाते हुए रमेश के विचार उसे कोफ्त देने लगे,  
'क्या करूं ?’
'कैसी गले पड़ गई है ?’
'न बोलने का ढंग है और रहन-सहन का सलीका।’
'उसके तौर -तरीके  से अपने दोस्तों के बीच कितनी शर्मिंदगी उठानी पड़ती है।’
'मां-पिताजी ने भी कैसी लड़की के साथ उसे बांध दिया है ।’
'नीरु कितनी अच्छी थी।’
'ऑफिस में काम  भी करती थी ।’
'पर मां- पापा को क्या सूझी जो मेरी शादी इससे करवा दी ।’
'क्या घर-खानदान देखकर ऐसी ही शादियाँ होती हैं..... भगवान जाने !'
और इस तरह अपने मन में सोचते-सोचते चला जा रहा था।
इधर श्वेता रोज की तरह उमड़े आंसुओं को घुटकती सोचने लगी, 'आखिर उसकी क्या गलती है ?
वह तो हर प्रकार से रमेश को खुश रखने की कोशिश करती है ।’
'पिताजी ने बहुत देखभाल कर प्रतिष्ठित घर के इंजीनियर लड़के से उसकी शादी कराई ।’
'अपने खानदान की परंपरा को निभाते हुए पिताजी ने चार बेटियों में सबसे बड़ी श्वेता की शादी पूर्व में हुई शादियों के अनुसार ही किया ।’
'सारे दामाद इंजीनियर, डॉक्टर बहुत ही प्रतिष्ठित पद पर सुशोभित हैं ।’
'पिताजी ने किसी तरह काफी खर्च कर धूमधाम से शानो-शौकत से विवाह कार्य संपन्न कर उसे विदा किया।’
'हां, अब पहले वाली बात तो रही नहीं ।’
'पहले काफी जमीन- जायदाद थी ।’
'अपनी जमींदारी थी ।’
'लेकिन कालक्रम में वक्त के थपेड़ों ने संपदा का रुख सिकुड़न की ओर कर दिया और भी तीन बहने हैं। चार बहनों के बाद सबसे छोटकू प्रतीक को भी इंजीनियर बनाना है जो दसवीं पासकर कोटा में प्रतियोगिता की तैयारी कर रहा है।’
प्रतीक का प्यारा चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम गया जब उसके विवाह में दौड़-दौड़कर सारे काम निबटा रहा था । बारात दरवाजे पर लगने के समय चाँदी के गिलास में दुल्हे को दूध पिलाकर निर्देशानुसार सहबाला को ग्लास  पकड़ाकर दौड़ा-हाँफता उसके पास आया ,
'दीदी, जीजाजी खूब सुंदर है, खूब अच्छे दिख रहे हैं ।’
वह तो बस टुकुर-टुकुर सभी को देख रही थी ।
पिताजी ने उसे बड़े शहर के लड़कियों के छात्रावास में पढ़ने के लिए अवश्य भेजा था । लेकिन वहां का खाना-रहना उसे पसंद नहीं आया तो वापस रोती-धोती घर चली आई ।
घर में तो काम करने के लिए नौकरों-चाकरों  की फौज थी। दाईयां भी आगे-पीछे मँडराती रहती थीं । राजकुमारियों-सा  पालन-पोषण  उसका था।
और यहां झाड़ू-पोछा, बर्तन-कपड़ा, खाना-बच्चा सभी कुछ करती-सँभालती वह हाँफने  लगती । उसपर रमेश का हर-हमेशा झिड़की से भरा  व्यवहार झेलना पड़ता है,
' तुम्हारे पिता ने तो मुंबई में फ्लैट देने का वायदा किया था !’
पिता जी से सारी बात बता भी नहीं सकती थी। एकबार जब प्रतिवाद करने की कोशिश की तो गुस्से में रमेश उसका गला  दबाने लगा था। बात कुछ यूँ हुई । बार-बार पिता के लिए अपमान सूचक शब्दों  को सुनते - सुनते वह बिफर गई थी ।
आप हमेशा पापा के लिए ऐसे क्यों बोलते रहते  हैं ?’
'क्या कोई लुच्चा-लफंगा है मेरे पापा ?’
हाँ, तुम्हारा बाप लुच्चा-लफंगा ही है ।’
'शादी के पहले तो बड़ी-बड़ी बातें करता था।’
'बहुत शेखी बघारता था ।’
'और दिया कुछ भी नहीं ।’
बिफर पड़ी श्वेता,
'आपके ही  पिता लुच्चे-लफंगे  होंगे ।’
मुँह से शब्द  तीर के समान निकला ही था ।
आव न देखा ताव  रमेश ! उसके दाहिने हाथ को बेरहमी से मरोड़ते चेहरे पर घूँसा जड़कर अब गला दबाने का प्रयत्न करने लगा ।
कुक्कू पेट में था । चीखती- चिल्लाती
उसे धकेलती धड़ाम से जमीन पर बैठकर बुक्का फाड़कर रो पड़ी,
‘क्यों पापा,  आपने  मेरी ऐसी शादी की ?’
'क्या बिगाड़ा था मैंने आपका ?’
आवाज़ फ्लैट के कमरे में ही घुटकर रह गई ।
दिलासा देने के लिए कमरे का सूनापन था ।
अपमान के घूँट  पीती एक अनिश्चितता की अवस्था से वह गुजर रही थी ।
एक अलिखित समझौते के उल्लंघन का प्रत्यक्ष दंड उसे  प्रत्येक क्षण भोगना पड़ रहा था ।
उधर रमेश गाड़ी चलाता सोचता जा रहा था ,
'कहां लेकर जाऊं उसे ?’
'एकदम गँवार लगती है।’
'इसके बाप ने तो फ्लैट के लिए बोला था ।’
'यदि वह मिलता तो अवश्य दोस्तों के बीच सीना चौड़ा होता।’
'उसे  न तो माया मिली और  न राम......।'
दोनों अपनी-अपनी दुनिया में खोए रेल की पटरियों की तरह समानांतर चले जा रहे थे।
'मीनूछाया'

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