Classic litterateur Kamleshwar : कालजयी साहित्यकार कमलेश्वर

प्रख्यात कथाकार, उपन्यासकार,और नाटककार कमलेश्वर के बहुआयामी और जिन्दादिल  व्यक्तितव के बारे में से•  रा• यात्री• ने लिखा है कि कमलेश्वर में आखिर वह कौन -सी ऐसी दुर्दम शक्ति थी जो वह अनथक रहकर सार्थक और सृजनशील  बने रहते थे। गंभीर से गंभीर परिस्थिति में भी अपनी  सूझ-बूझ,धैर्य और  ' विट ' अपने हाथ से जाने नहीं देते थे ।हंसी-मजाक का शायद ही कोई अवसर हाथ से जाने देते थे ।किसी भी अवसर पर तुरत बुद्धि का परिचय देकर गम और गंभीरता के बादलों से प्रमोद, विनोद  की किरणें  छिटकाकर वातावरण को उद्भासित कर देते थे।

Nov 19, 2023 - 16:32
Nov 19, 2023 - 19:07
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Classic litterateur Kamleshwar : कालजयी साहित्यकार कमलेश्वर
Classic litterateur Kamleshwar

Classic litterateur Kamleshwar : प्रख्यात लेखक प्रदीप पंत ने  विराट प्रभामंडल वाले कालजयी साहित्यकार कमलेश्वर के जीवंत और सक्रिय व्यक्तितव के बारे में लिखा है कि उनकी सक्रियता के इतने रूप धे जितने कि हिन्दी तो क्या किसी भारतीय भाषा के रचनाकार के  भी नहीं रहे हैं ।निःसंदेह कहा जा सकता है कि इस माने में वे अपने आप में अकेले और अद्वितीय थे ।

प्रख्यात कथाकार, उपन्यासकार,और नाटककार कमलेश्वर के बहुआयामी और जिन्दादिल  व्यक्तितव के बारे में से•  रा• यात्री• ने लिखा है कि कमलेश्वर में आखिर वह कौन -सी ऐसी दुर्दम शक्ति थी जो वह अनथक रहकर सार्थक और सृजनशील  बने रहते थे। गंभीर से गंभीर परिस्थिति में भी अपनी  सूझ-बूझ,धैर्य और  ' विट ' अपने हाथ से जाने नहीं देते थे ।हंसी-मजाक का शायद ही कोई अवसर हाथ से जाने देते थे ।किसी भी अवसर पर तुरत बुद्धि का परिचय देकर गम और गंभीरता के बादलों से प्रमोद, विनोद  की किरणें  छिटकाकर वातावरण को उद्भासित कर देते थे।

संपादक सुभाष सेतिया कमलेश्वर को साहित्यिक जगत के जीवंत नायक  बताते हुए लिखते हैं कि वे  विचारधारा, साहित्यिक- गुटबंदी या व्यक्तिगत राग-द्वेष से ऊपर उठकर हर तरह के साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेने को उत्सुक रहते थे ।उनकी शिरकत का एक ही  मापदंड था कि समारोह से हिन्दी  भाषा, साहित्य और संस्कृति के विकास में रचनात्मक योगदान होना चाहिए ।

यह एक  संयोग ही है कि कमलेश्वर का जन्म और  मृत्यु दोनों ही जनवरी में हुए ।पैदा वे उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में हुए, तारीख थी 6जनवरी 1932और निधन की  तारीख  थी 27 जनवरी 2007।पूरा नाम-कमलेश्व प्रसाद सक्सेना।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एम• ए•तक की  शिक्षा ।बीसवीं  शती के सबसे सशक्त लेखकों  में से एक ।इन्होंने अनेक हिन्दी फिल्मों के लिए पटकथाएं लिखी तथा  भारतीय  दूरदर्शन श्रृंखलाओं के लिए दर्पण, चन्द्रकान्ता,बेताल पच्चीसी,विराट युग आदि  लिखे।भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर आधारित पहली प्रमाणिक और इतिहासपरक जन- मंचीय  कथा  ' हिन्दुस्तां हमारा ' का भी  लेखन  किया। 

कश्मीर और अयोध्या आदि पर वृत्तचित्रों तथा  दूरदर्शन के लिए 'बन्द फाइल 'और 'जलता सवाल ' जैसे सामाजिक सरोकारों के वृत्तचित्रों का भी  लेखन-निर्देशन और  निर्माण किया । उन्होंने हिन्दी साहित्य में रचनात्मकता लाने के लिए  'नई कहानी ' के रूप में आन्दोलन चलाया और1972 में उसी हिन्दी साहित्य के पतन को देखते हुए समरसता कहानी आन्दोलन की  शुरुआत की ।
राजेंद्र यादव हंस पत्रिका में लिखते हैं, 'नई कहानी ' आन्दोलन के प्रारंभिक पैरोकारों  में सबसे अधिक जुझारू व्यक्तितव कमलेश्वर का था ।हलांकि मुझे, मोहन राकेश और कमलेश्वर-तीनों को नई कहानी आन्दोलन के नेतृत्व करने वाले के रूप में देखा-जाना  जाता है, पर नई कहानी आन्दोलन को हिन्दी साहित्य में स्थापित करने में कमलेश्वर की भूमिका अहम थी।स्थापित साहित्यकारों की और से सबसे अधिक हमले उनपर ही हुए और आगे  बढकर हमले  का जवाब भी उन्होंने ही  दिया ।"

300 से अधिक कहानियां और 13 उपन्यास लिखने वाले इस मानवीय  लेखक  का इस दुनिया से चला  जाना देश में  कट्टरता और  असहिष्णुता के खिलाफ संघर्षों  के लिए एक  झटका है-ऐसा  कहना है लेखक शुभम सिंह का। कुमार अतुल  लिखते हैं कि कमलेश्वर जी स्टार लेखक, संपादक होने के साथ ही ताउम्र बेहद मानवीय, बेहद संवेदनशील, बेहद आत्मीय और  नई पीढ़ी के लेखक पत्रकारों के लिए संरक्षक और  बङे भाई की  भूमिका  निभाते रहे ।

' सारिका ' में उनका संपादकीय जो ' मेरा पन्ना 'नाम से  छपता था, एक  तरह से फासिस्ट ताकतों और साम्प्रदायिक शक्तियों के खिलाफ हथियार से कहीं ज्यादा काम करने लगा था । कमलेश्वर की कहानियों की प्रविधि और संरचना को समझने के लिए उनके जीवन और संघर्ष को समझना होगा। ऐसा किए बिना उनकी कहानियों की तह तक नहीं  पहुँचा जा सकता है ।
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक महेश दर्पण लिखते हैं- 'कमलेश्वर की कहानियों में हमें वायवीय पात्र कम ही  नजर आते हैं । उनके पात्र अपने समय, समाज, इतिहास और जीवन की  जद्दोजहद से निकलकर अथवा  उसमें  जूझते-भिङते,लङते-हारते नजर आते हैं ।दिमागी  ऐय्याशी के लिए कहानी लिखना उन्हें कतई पसंद नहीं था ।वह कहानी के अच्छे या  बुरे होने से कहीं ज्यादा तरजीह उसकी  सार्थकता या  निरर्थकता के  प्रश्न को देते थे।  

प्रायः वह कहानियां एक सिटिंग में लिख डालते थे,लेकिन यह प्रक्रिया इतनी  सहज थी नहीं। एक प्रतिबद्ध लेखक के रूप में उनकी कलम हर स्थति और परिवेश के चित्रण में जीवंत यथार्थ को साहसिक संस्पर्श देने  में  सफल थे । कस्बाई जीवन से  महानगरीय जीवन तक दृष्टिपात करते थे। उनकी कहानी का प्रवाह एक तरह से विकासशील रहा है, जिसमें परिस्थितियों के साथ परिवर्तन भी आए हैं ।

वे नयेपन के आकर्षण से हमेशा आकर्षित रहे उन्होंने जीवन को जिस तरह से भोगा उसी रूप रूप में उसे चित्रित भी किया। एक प्रसिद्ध समालोचक का मानना है -' कितने पाकिस्तान 'लिखकर कमलेश्वर ने सभी कथाकारों के सम्मुख एक चुनौती पेश की है ।भाषा के स्तर पर भी कमलेश्वर ने जो प्रयोग किया है उस स्तर को छू पाना किसी भी कथाकार के लिए बहुत दुःसाध्य कार्य है ।एक ओर इतिहास को साधना है और दूसरी ओर वर्तमान को भी अपनी लेखनी द्वारा बांधना है और यह कार्य कमलेश्वर जैसा सिद्धहस्त लेखक ही कर सकते हैं ।"

उन्हें 2005 में पद्मभूषण, 2003 में साहित्य अकादमी पुरस्कार ( कितनेे पाकिस्तान ) से सम्मानित किया गया ।उपन्यासकार के रूप में 'कितने पाकिस्तान ' ने इन्हें सर्वाधिक ख्याति प्रदान की और इन्हें एक कालजयी साहित्यकार बना दिया । इनकी अन्य प्रसिद्ध रचनाओं में- 'जार्ज पंचम की नाक ', 'मांस का दरिया ',   'इतने अच्छे दिन ',  'कोहरा ',  'कथा-प्रस्थान,' ' मेरी  प्रिय  कहानियां 'आदि  हैं ।

नई कहानियों के अलावे 'सारिका ',  'कथा- यात्रा ' , 'गंगा 'आदि पत्रिकाओं का संपादन तो वे किए ही दैनिक भास्कर के राजस्थान अलंकरणोंके प्रधान संपादक भी रहे ।कमलेश्वर जी अपने संघर्ष के दिनों में घोर विपन्नता देखी तो बाद में अमीरी का ठाठ भी भोगा।वे साहसी ,निडर और स्वाभिमानी लेखक थे भी थे जिनकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ी थी ।न्यायपालिकाको वेश्या से भी गयी गुजरी लिखने के आरोप में कंटेप्ट आफ कोर्ट भी झेला।लेकिन मांफी  नहीं  मांगी । 

मशहूर शख्सियत के बावजूद कमलेश्वर के चरित्र के स्याह पक्ष भी  रहे, जिनकी  चर्चा अनावश्यक नहीं कही जा सकती है। इस संबंध में प्रसिद्ध लेखिका मन्नू भंडारी ने अपने आलेख 'कितने कमलेश्वर  ' में विस्तार से चर्चा की है और  अन्त  में निष्कर्ष के तौर पर लिखती है-"कमलेश्वर के देखे-सुने कितने ही रूप एक-दूसरे से कितने अलग कितने भिन्न।"

अरुण कुमार यादव

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