देवउठनी एकादशी और मांगलिक महत्व

एकादशी व्रत से मन और आत्मा की शुद्धि होती है जिससे आध्यात्मिक लाभ भी मिलता है। सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है।आत्म अनुशासन और संयम में वृद्धि होती है। सोच स्पष्ट होने लगती है।तुलसी का औषधीय पौधा पूजित होने के साथ पर्यावरण एवं प्रकृति सुरक्षा का संदेश देता है। सभी हरियाली एवं स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें। मनु वाशिष्ठ, कोटा जंक्शन राजस्थान

Mar 19, 2025 - 18:38
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देवउठनी एकादशी और मांगलिक महत्व
Devuthani Ekadashi and auspicious significance
  हिंदू धर्म में कार्तिक माह का बहुत महत्व है इस महीने कई त्यौहार पड़ते हैं, इन्हीं में से एक है तुलसी विवाह। इस दिन पवित्र मन से तुलसी जी की पूजा करने से जीवन में किसी चीज की कमी नहीं रहती। हिंदू धर्म में मान्यता है कि, चार माह के लिए चातुर्मास में भगवान विष्णु क्षीर सागर में विश्राम (शयन) करते हैं। इस बीच सारे शुभ कार्य कृषि को छोड़कर (विवाह, उपनयन, गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार, आदि) नहीं किए जाते हैं। यह समय आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष एकादशी (देवशयनी एकादशी या पद्मा एकादशी ) से कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी एकादशी) तक चातुर्मास पूर्ण होता है। इस दिन भगवान विष्णु इंतजार बाद लंबी नींद से जागते हैं, तथा पुनः भक्तों की पुकार सुनते हैं। इस वर्ष यह पर्व १२ नवंबर २०२४ को है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु व जलंधर के बीच युद्ध होता है जालंधर की पत्नी तुलसी पतिव्रता स्त्री हैं उसके कारण विष्णु जालंधर को पराजित नहीं कर पाए। जलंधर को पराजित करने के लिए भगवान विष्णु एक युक्ति अनुसार, जलंधर का रूप धरकर उनका सतीत्व भंग करने पहुंचे। और इस तरह सतीत्व भंग होने के पश्चात भगवान विष्णु विजयी होते हैं, और युद्ध में जलंधर मारा जाता है। सब कुछ जानने के बाद मां तुलसी भगवान विष्णु को काले पत्थर में परिवर्तित होने का श्राप देती हैं। तब श्राप मुक्ति के लिए भगवान विष्णु शालिग्राम रूप में तुलसी से विवाह करते हैं और साथ ही पूजित होने का वरदान देते हैं। तब से ही तुलसी विवाह की परंपरा चली आ रही है। तुलसी विवाह ईश्वर से जुड़ने, स्मरण करने का माध्यम है। शास्त्रों में भी लिखा गया है कि जिनकी पुत्रियां नहीं हैं वे भी तुलसी विवाह कर पुण्यभागी होते हैं। 
      इस दिन देवों को जगाया जाता है, गांवों में घरों को गोबर मिट्टी से लीपपोत कर उस पर गेरू, खड़िया ( सफेद चॉक जैसा ) रंगों से आंगन, दीवारों, पूजा स्थल पर मांडने मांडे (राजस्थानी भाषा में) जाते हैं। चौक पूरे ( ब्रज भाषा में ) जाते हैं। जिसमें रसोई में देव, चकला, बेलन, मटका, गृहिणी, बच्चों की स्लेट पट्टी, तीर धनुष, घर के सदस्यों की पगथली, पशुओं के खुर, देव आगमन के लिए चौक आदि पूरे जाते हैं। सांय काल में मिठाई पकवान बनाए जाते हैं, तथा भगवान के आगे सभी सामग्री यथा  पकवान, मूली गाजर, बेर, सिंघाड़े, आंवला, शकरकंदी आदि रख कर एक डलिया (बांस की टोकरी) से ढंक दिया जाता है। माना जाता है इस तरह भगवान को भोग अर्पण करने घर में धन धान्य समृद्धि होती है, एवं सब्जियां स्वास्थ्य की प्रतीक हैं, हिंदू संस्कृति में एक बात विशेष है कि पूजा, भोग, अर्चना सभी ऋतु अनुसार एवं आरोग्य वर्धक हैं। इसके उपरांत भगवान की स्तुति की जाती है, बधाए गाए जाते हैं। 
 इस मंत्र को बोलते हुए भी देवों को जगाया जा सकता है
   
 उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पतये।
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्त भवेदिदम।।
उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव।
गतामेघा वियच्चैव निर्मलं निर्मलादिश:।।
शारदानि च पुष्पाणि गृहाण मम केशव।
 पूजा समाप्त होने पर चौकी या पट्टे को उठाकर झुलाते हुए या ऐसे ही घंटी, शंख ताली बजाकर गाते भगवान से उठने का आह्वान करें
उठो देवा! जागो देवा!
चार हू मास खूबही सोए 
अब तो कुंवारे ब्याहे देवा
शुभ काम कराओ देवा
उठो देवा! जागो देवा! 
अक्सर मंत्र ज्ञात नहीं होते हैं, या उनका उच्चारण शुद्ध नहीं कर पाते हैं तो घरों में महिलाएं इसी तरह श्री भगवान को उठाती हैं।
 
उठो देव सांवरा, भाजी बेर आंवला।
गन्ना की झोंपड़ी में शंकर जी की यात्रा।
इस आह्वान का सीधा सा अर्थ है कि, हे! सलोने देव प्रभु (विष्णु जी) बेर, भाजी, आंवला, पकवान अर्पित करते हुए हम चाहते हैं कि आप जाग्रत हों, अपनी सृष्टि के कार्यों को संभालें तथा शंकर जी को पुनः अपनी यात्रा की अनुमति दें। माना जाता है चातुर्मास में इस समय शंकर जी सृष्टि को संभालते हैं।
तुलसी जी की दीपक जला कर आरती कर परिक्रमा करें 
तुलसी महारानी नमो नमो।
हरि की पटरानी नमो नमो।।
धन तुलसी पूरण तप कीन्हों 
शालिग्राम महा पटरानी 
जाके पत्र मंजरी कोमल
श्रीपति चरणकमल लिपटानी 
धूप दीप नैवेद्य आरती,
पुष्पन की वर्षा बरसानी 
छप्पन भोग छत्तीसों व्यंजन 
बिन तुलसी हरि एक न मानी 
सभी सखि मैया तेरौ गुण गावें 
भक्तिदान दीजै महारानी 
तुलसी महारानी नमो नमो
हरि की पटरानी नमो नमो...
इस विशेष अवसर देवउठनी एकादशी पर गन्ने से मंडप सजाकर, तुलसी विवाह करने की परंपरा है। एकादशी से पूर्णिमा तक पांच दिन नियम पूर्वक पूजा, सूर्योदय से पूर्व स्नान, दीपदान, व्रत या एक समय भोजन आदि करते हैं, पूरे कार्तिक माह का फल प्राप्त होता है, इसे पचबीगा स्नान भी कहते हैं। तुलसी विवाह को बहुत महत्व पूर्ण माना जाता है क्योंकि, हिंदू धर्म में मान्यता है कि तुलसी विवाह के दिन मां तुलसी जी और भगवान शालिग्राम की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख समृद्धि, मधुरता बढ़ती है तथा भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस व्रत का वैज्ञानिक महत्व भी कम नहीं है। एकादशी व्रत शरीर को डिटॉक्स करने में सहायक है। पाचन तंत्र को आराम देकर पाचन और चयापचय में सुधार करता है। सही तरीके से एकादशी व्रत करना, वजन कम करने में सहायक हो सकता है। शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होती है। एकादशी व्रत से मन और आत्मा की शुद्धि होती है जिससे आध्यात्मिक लाभ भी मिलता है। सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है।आत्म अनुशासन और संयम में वृद्धि होती है। सोच स्पष्ट होने लगती है।तुलसी का औषधीय पौधा पूजित होने के साथ पर्यावरण एवं प्रकृति सुरक्षा का संदेश देता है। सभी हरियाली एवं स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें।
  मनु वाशिष्ठ, कोटा जंक्शन राजस्थान

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