अमृतसर का स्वर्ण मंदिर

यह मंदिर भारत के पंजाब प्रांत के अमृतसर शहर मे स्थित है।यह गुरुद्वारा सिख धर्मावलंबियों का सबसे पावन धार्मिक स्थान है।यह प्रमुख गुरुद्वारा हरमंदिर साहिब, दरबार साहिब,सुबरन मंदिर और स्वर्ण मंदिर के नाम से जाना जाता है।अमृतसर शहर स्वर्ण मंदिर के चारो ओर बसा हुआ है।स्वर्ण मंदिर में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु अरदास के लिए आते हैं।अमृतसर शहर का नाम वास्तव में उस सरोवर के नाम पर रखा गया है जिसका निर्माण स्वयं सिख गुरु रामदास जी ने अपने हाथों से किया था।

Jun 21, 2024 - 13:42
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अमृतसर का स्वर्ण मंदिर
Golden Temple of Amritsar

कुछ वर्ष पूर्व आदमपुर, जालंधर जाने का अवसर प्राप्त हुआ तो एक दिन निकल पड़े वहाँ से अमृतसर ,स्वर्ण मंदिर को देखने व अकाल तख्त पर माथा टेकने।
यह मंदिर भारत के पंजाब प्रांत के अमृतसर शहर मे स्थित है।यह गुरुद्वारा सिख धर्मावलंबियों का सबसे पावन धार्मिक स्थान है।यह प्रमुख गुरुद्वारा हरमंदिर साहिब, दरबार साहिब,सुबरन मंदिर और स्वर्ण मंदिर के नाम से जाना जाता है।अमृतसर शहर स्वर्ण मंदिर के चारो ओर बसा हुआ है।स्वर्ण मंदिर में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु अरदास के लिए आते हैं।अमृतसर शहर का नाम वास्तव में उस सरोवर के नाम पर रखा गया है जिसका निर्माण स्वयं सिख गुरु रामदास जी ने अपने हाथों से किया था।यह गुरुद्वारा इसी सरोवर के बीच मे स्थित है जिसकी बाहरी दीवार सोने से बनी है, इसलिए इसे "स्वर्ण मंदिर" के नाम से भी जाना जाता है।
इतिहास  -
सिखों के चौथे गुरु रामदास जी ने इसकी निर्माण की नींव 1577 ई.में रखी थी।कुछ लोगों के अनुसार गुरु जी ने लाहौर के एक सूफी संत मियां मीर से गुरुद्वारे की नींव रखवाई थी।गुरुद्वारे का निर्माण 15 दिसम्बर 1588 से प्रारंभ होकर 16 अगस्त 1604 मे पूर्ण हूआ। 400 वर्ष पुराने इस गुरुद्वारे का नक्शा स्वयं भवन के वास्तुकार  सिक्खों के पांचवें गुरू अर्जुनदेव जी ने तैयार किया था। यह गुरुद्वारा शिल्प और सौंदर्य की दृष्टि से एक अनुपम कृति है। इसकी बाहरी सुंदरता व मनमोहक नक्काशी बरबस ही ध्यान आकर्षित कर लेती है।
स्वर्ण मंदिर को अक्रांताओं द्वारा कई बार लूटा व नष्ट किया गया परन्तु  भक्ति एवं आस्था के इस प्रतीक को हिंदुओं और सिखों ने दुबारा बना दिया। 17वीं शताब्दी में महाराज सरदार जस्स सिंह अहुलवालिया द्वारा इसका पुनः निर्माण कराया गया था।इस मंदिर को जितनी बार नष्ट किया गया है उसका विस्तृत विवरण मंदिर में दर्शाया गया है।17वीं शताब्दी में अफगान हमलावरों द्वारा इसे पूर्ण रूप से तोड़ कर नष्ट कर दिया गया था तब तत्कालीन महराजा रणजीतसिंह ने इसे दुबारा बनवाकर इसकी बाहरी दीवारों व गुम्बदों पर सोने की परत चढ़वाया था।
स्वर्ण मंदिर सिक्ख धर्मावलंबियों के लिए आध्यात्मिक रूप से सबसे बड़ा ध्यान व आस्था  का मंदिर है।यह 1947 और 1966 के बीच पंजाबी सूबे आंदोलन का केन्द्र बन गया।1980के दशक के प्रारंभ में ये गुरुद्वारा भारत सरकार और जनरैल सिंह भिंडरावाले के नेतृत्व वाले कट्टरपंथी आंदोलन के बीच संघर्ष का केन्द्र बन गया था।
आपरेशन ब्लूस्टार - 
सन 1984 में हिन्दुस्तान के टुकड़े कर स्वतंत्र खालिस्तान बनाने के इरादे से, सैकड़ों निर्दोष हिन्दू-सिखों के हत्या करने वाले आतंकी भिंडरावाले ने आस्था के इस केन्द्र हरमिंदर साहिब को अपने कब्जे में लेकर अपने ठिकाने के रुप में प्रयोग किया था। प्रारंभ में आस्था का सम्मान करते हुये सुरक्षा एजेंसियों ने मंदिर परिसर में घुसने से परहेज किया व मंदिर को बाहर से घेरकर आतंकीयो से आत्मसमर्पण करने के लिए कहते रहे परन्तु अंदर से गोलाबारी किए जाने पर यह संघर्ष 10 दिन तक चला और अंततः परिसर को आतंकियों से मुक्त कराने हेतु प्रधानमंत्री के आदेश के पश्चात सेना ने स्वर्ण मंदिर के हाते मे प्रवेश कर 3 से 8 जून 1984 को खलिस्तान समर्थक जनरैल सिंह भिंडरावाले और उनके समर्थकों से मुक्त कराने के लिए चलाया गया अभियान था।पंजाब में भिंडरावाले के नेतृत्व में अलगाववादी ताकतें सशक्त हो रहीं थीं जिन्हें पाकिस्तान का समर्थन मिल रहा था।इस कार्यवाही मे आंतकीयो को मुठभेड़ में मार गिराया गया जिसमें उनका प्रमुख भिंडरावाले भी मारा गया।परिसर में इनके पास से पाकिस्तान व विदेशों मे निर्मित बहुत से भारी हथियार तथा गोलाबारूद बरामद हुये।सन 2017 मे प्रस्तावित ' शहीद गैलरी' मे " AGPC" ने भिंडरावाले को एक शहीद के रुप में पहचान देकर सबको चौंका दिया और भारत की अखंडता को चोट पहुंचाई जिसके कारण सभी धर्मों के राष्ट्रवादी लोगों को उनके इस निर्णय से आघात लगा।
अक्टूबर 1984 में ब्लूस्टार कार्यवाही के विरुद्ध प्रतिक्रिया में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के सुरक्षा में लगे सिख सुरक्षा कर्मियों ने उनकी हत्या कर दी।
परिसर -
गुरुद्वारे के चारों दिशाओं(पूर्व, पश्चिम,उत्तर और दक्षिण)में चार दरवाजे खुलते हैं ।पुराने जमाने में समाज मुख्यतः चार जातियों में विभाजित था और कई जातियों को मंदिर परिसर में प्रवेश वर्जित था।गुरुद्वारा के यह चारो दरवाजे उन चारों जातियों के लिए खुले हुए थे।यह मंदिर हर धर्म,जाति, राष्ट्र के अनुयायी के लिए खुला है और उनका स्वागत करता है।यहाँ प्रवेश निशुल्क है,बस हर आगुंतक को अपना सर ढ़कना और जूता उतारना अनिवार्य है।आप मोबाइल म्यूट करके ले जा सकते हैं।फोटोग्राफी और वीडीयोग्राफी ,नशीले पदार्थ तथा धूप का चश्मा प्रतिबंधित है।
स्वर्ण मंदिर परिसर में दो बड़े हाल और कई छोटे2 तीर्थस्थल हैं।सरोवर के चारो तरफ ये तीर्थस्थल बने हुए हैं।इस जलकुंड/जलाशय को अमृतझील और अमृतसर अमृत सरोवर के नाम से भी जाना जाता है।स्वर्ण मंदिर सफेद संगमरमर पत्थरों से से बना हुआ है जिसकी दीवारों पर सोने के पत्तियों से नक्काशी की गई है।भारत के सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीतसिंहने(1799-1849)
ने गुरुद्वारे के उपरी तल 750 किलो शुद्ध सोने से मढ़वाया था। जीर्णोद्धार की एक श्रृंखला के बाद गुंबद को 162 किग्रा 24 कैरेट सोने से लेपित किया गया था फिर 90 के दशक में नवीनीकरण के एक और प्रयास से वर्तमान संरचना का निर्माण हुआ जहाँ बाहरी हिस्से से पूरी संरचना को चढ़ाने के लिए लगभग 500 किग्रा असली सोने का उपयोग किया गया।हरमंदिर साहिब गुरुद्वारा में चौबीसों घंटे गुरुवाणी का पाठ होता रहता है।यह संगीतमय स्वरलहरी वातावरण को आन्नदित करते हुए आये हुए भक्तों का ईश्वर के दरबार में स्वागत करती है।सिख समुदाय गुरु को ईश्वर के समकक्ष मानते हैं।स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने पर हर भक्त मंदिर के तरफ मुख करके पहले शीश झुकाते हैं फिर पैर धोकर सीढियां चढ़कर मुख्य मंदिर में प्रवेश करते हैं।सीढियों के साथ2 स्वर्ण मंदिर से जुड़ी हुई सारी घटनाओं का इतिहास यहाँ अंकित है।इस इमारत में सुंदर रोशनी की व्यवस्था इसके सुंदरता में चार चांद लगा देती है।मंदिर परिसर में एक स्मारक जावांज सिक्ख सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए बनाया गया है।
द्वार -
स्वर्ण मंदिर का एक द्वार पर गुरु रामदास सराय बना हुआ है।इस सराय में अनेक विश्राम स्थल हैं ।इस सराय का निर्माण सन 1784 मे किया गया था।यहाँ 228 कमरे और 28 बड़े हाल हैं।यहाँ पर एक व्यक्ति 3 दिन तक रुक सकता है।उसे यहाँ पर बिस्तर गद्दे व चादरें उपलब्ध करा दी जाती हैं।यहाँ अनेक तीर्थस्थल हैं, इनमें बेरी बृक्ष को भी तीर्थस्थान माना गया है जिसे बेरी बाबा बुढ्ढा के नाम से जाना जाता है।माना जाता है कि स्वर्ण मंदिर के निर्माण के समय बेरी बाबा इसी बृक्ष के नीचे बैठकर निर्माण कार्य पर नजर रखते थे।
सरोवर -
स्वर्ण मंदिर जलाशय के बीच में मानव निर्मित द्वीप पर बना हुआ है।ये मंदिर एक पुल द्वारा किनारे से जुड़ा हुआ है।श्रद्धालु भक्त दर्शन करने से पहले सरोवर में स्नान करते हैं।यह झील रंग बिरंगी मछलियों से भरी हुई है।
अकाल तख्त -
मंदिर से 100 मीटर की दूरी पर स्वर्ण जड़ित "अकाल तख्त"है जो छठे गुरु का सिंहासन कहा जाता है।छठे गुरु  हरगोविंद द्वारा इसे बनवाया गया था ।यह सिक्खों की पांच सीटों में से एक है।अकाल तख्त राजनीतिक संप्रभुता का प्रतीक है और इस स्थान पर सिक्ख समुदाय के लोगों के आध्यात्मिक और लौकिक सराकारों को संबोधित किया जाता है।इसमें एक भूमिगत तल के साथ अन्य 5 तल हैं।यहाँ पर एक संग्रहालय और एक सभागार भी बना हुआ है जहाँ पर सरबत खालसा पंथ की बैठकें होती हैं। सिक्ख पंथ से जुड़ी हुई हर समस्या या मसले का समाधान इसी सभागार में किया जाता है।
स्वर्ण मंदिर परिसर मे स्थित सभी पवित्र स्थानों की पूजा भक्तगण अमृतसरोवर के चारो ओर बने गलियारों में परिक्रमा करके करते हैं।इसके उपरांत वे "अकाल तख्त"का दर्शन करते हैं।अकाल तख्त के दर्शन के पश्चात श्रद्धालु पंक्तियों में खड़े होकर स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करते हैं।
लंगर -
गुरुद्वारे मे आने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए गुरु के लंगर में खाने पीने की पूरी व्यवस्था रहती है।यह लंगर 24 घंटों खुला रहता है।खाने पीने की व्यवस्था गुरुद्वारे मे आने वाले चढ़ावे व अन्य दूसरे कोषों से की जाती है।लंगर मे खाने पीने की व्यवस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा नियुक्त सेवादार करते हैं।वे यहाँ आने वाले लोगों(संगत)की सेवा में हर तरह से योगदान देते हैं।एक अनुमान के अनुसार लगभग 40 से 50 हजार श्रद्धालु यहाँ प्रतिदिन लंगर का प्रसाद ग्रहण करते हैं।
प्रकाशोत्सव -
मंदिर में प्रकाशोत्सव सुबह के ढ़ाई बजे से आरम्भ होती है जब गुरुग्रंथ साहिब जी को उनके कक्ष से गुरुद्वारे में लाया जाता है।संगतों की टोली भजन कीर्तन करते हुए ग्रंथ साहिब को पालकी में सजाकर गुरुद्वारे में लाती हैं।रात के समय सुखासन के लिए गुरुग्रंथ को कक्ष में वापस भी इसी तरह लाया जाता है।कड़ाह प्रसाद,(हलवा)की व्यवस्था 24 घंटे रहती है।
वैसे तो गुरुद्वारे में रोज ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है लेकिन गर्मियों की छुट्टियों में भीड़ ज्यादा होती है।बैसाखी, लोहड़ी, गुरुनानक पर्व, शहीदी दिवस संगराद(संक्रांति) जैसे त्योहारों पर पैर रखने की जगह भी नही मिलती।इसके अलावा सुखासन व प्रकाशोत्सव का नजारा नयनाभिराम होता है।मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से अरदास करने से व्यक्ति की सारी इच्छायें पूर्ण होती है।
स्वर्ण मंदिर पूज्यनीय क्यों है?:-
इसके निर्माण के बाद गुरु अर्जुन ने सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ आदि ग्रंथ को स्थापित किया।आदि ग्रंथ सिखों द्वारा दस मानव गुरुओं के वंश के बाद अंतिम, संप्रभु और अनंत जीवित गुरु का रुप माना जाता है।इसमें 1430 पृष्ठ हैं जिनमें से अधिकांश का 31 रागों मे विभाजित किया गया है।
गुरुद्वारा -
गुरुद्वारा का शाब्दिक अर्थ "गुरु का द्वार "जहां सभी धर्मों के लोगों का स्वागत होता है और वहाँ पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब एक ऊंचे सिंहासन पर रखा जाता है।
सभी गुरुद्वारे मे एक लंगर हाल होता है जहाँ लोग मुफ्त में शाकाहारी भोजन कर सकते हैं।गुरुद्वारे की पहचान दूर से इसके खास झंडे को देखकर की जा सकती है जहाँ निशान साहिब का सिख ध्वज होता है।
स्वर्ण मंदिर पहुंचने के लिएः-
वायुमार्ग-अमृतसर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
सड़क मार्ग-दिल्ली से लगभग 500 किमी राष्ट्रीय राजमार्ग पर।
रेल मार्ग-अमृतसर रेल मार्ग भारत के  सभी प्रमुख नगरों से जुड़ा हुआ है।

इन्जी सुभाष चन्द्रा

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