स्वतंत्रता आंदोलन और महिलाओं का योगदान

जब स्वतंत्रता संघर्ष में गांधी जी का ,आविर्भाव हुआ  उनके साथ उनकी पत्नी कस्तूरबा ने उनका आदर्श पत्नी,बन कर भरपूर साथ निभाया ही  और उनके साथ आजादी की जंग में भी कदम से कदम मिलाकर चलीं ,एक घरेलू सीधी सादी महिला कस्तूरबा ने गांधी जी के सत्य और अहिंसा ,सादगी,सत्य-व्रत को ह्रदय से अपनाया

Nov 7, 2023 - 17:17
Nov 7, 2023 - 17:21
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स्वतंत्रता आंदोलन और महिलाओं का योगदान
Independence movement and women's contribution

भारतीय राजनीतिक परिस्थितियों में  महिलाओं ने ही आगे बढ़कर क्रांति की पताका थामी  है,युगों पूर्व भी भारतीय राजनीति,समाज  एवं धर्म के केंद्र में महिलाएं ही रही,महाभारत एवं रामायण,जैसे बड़े युद्ध ,तथा अन्तःपुर के षड्यंत्रों के दांव-पेंच रहे हों ,आपसी अंतर्कलह,हो या राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बेबाक राय देनी हो सभी क्षेत्रों में महिलाओं ने ही अग्रणी रहकर बड़े बड़े न्यायायिक फैसलों को समर्थन दिया है ,द्रौपदी -सीता ,का उदहारण दृष्टव्य है,कारन भले ही अलग रहे हों पर वे ही सत्ता,राजनीति व् धर्म के केंद्र में रह कर बड़े व् विशाल राज्यों -शक्तियों के आमूलचूल परिवर्तन की अगुआ बनी हैं. 
वर्त्तमान संदर्भों में भी महिलाओं ने अपना परचम लहराया है ,राजनीति के कीचड़ में कमल की तरह खिल कर एक नये आदर्श की स्थापना भी की है,अपना घर-परिवार सँभालते हुए ,जीवन के संघर्षों में विजय पाई है -कदम कदम पर मुश्किलों का सामना करते हुए ऊंचाइयों को छुआ है,-अनेक उपलब्धियां  प्राप्त की हैं,

अंग्रेजों की क्रूर कूटनीति का जवाब बौद्धिक चतुराई एवं समझदारी के साथ दिया था रानी ने और अपने घर परिवार-राज्य की भी रक्षा की थी,भारत के स्व्तंत्रता संग्राम की प्रमुख रहकर रानी लक्ष्मीबाई,दुर्गावती,ने अंगर्जों से लोहा लेकर देश की रक्षा की पर अपनी आन नहीं गंवाई,जब प्रश्न देश व् राज्य के सम्मान का था ,उन्होंने प्राण देना ही उचित समझा,,,,,सन 1857 के संग्राम का व्यूह-भेदन भी उन्होंने ही किया था ,,यह लड़ाई निरंतर चलती रही ,,,इतिहास कहता है - -क्रांतिकारियों की मदद करने में अगर्णी दुर्गा भाभी ने अनेक कष्ट सहे ,अंग्रेजों की प्रतारणा का शिकार बनीं लेकिन देश-हित के लिए क्रांति-वीरों का साथ नहीं छोड़ा ,दुर्गावती देवी यानि दुर्गा भाभी एक प्रसिद्द क्रन्तिकारी और स्व्तंत्रता सेनानी थीं उन्होंने अंग्रेज शासकों के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति में कुछ महिलाओं के साथ भाग लिया था,,,उनका जन्म 7 अक्टूबर 1907 में हुआ था, और 1999 में गाजियाबाद में उनकी मृत्यु हो गई थी,उनके पति भगवती चरण वोरा सवयम एक देशभक्त क्रन्तिकारी थे,सौंडर्स की मृत्यु के बाद भगत सिंह कि पत्नी बन उन्हें भागने में दोनों पति पत्नी ने सहयोग दिया था,

जब स्वतंत्रता संघर्ष में गांधी जी का ,आविर्भाव हुआ  उनके साथ उनकी पत्नी कस्तूरबा ने उनका आदर्श पत्नी,बन कर भरपूर साथ निभाया ही  और उनके साथ आजादी की जंग में भी कदम से कदम मिलाकर चलीं ,एक घरेलू सीधी सादी महिला कस्तूरबा ने गांधी जी के सत्य और अहिंसा ,सादगी,सत्य-व्रत को ह्रदय से अपनाया , जेल गईं,सत्याग्रहियों के लिए बा [माँ ]बनकर उनकी सेवा की,चरखाचलाती -और उसके सूत से बुने खादी  के वस्त्रों को  पहनती थीं,सद्यः विवाहिता होने पर भी अपने सारे आभूषण देश के लिए दान कर दिए ,अपने साथ स्त्रियों को भी जोड़ा और देश-हित में स्वराज आंदोलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई -उस समय भारत की राजनीति में कस्तूरबा का नाम आदर -सम्मान का पर्याय बन गया था,बापू ने एक बार परिहसवश कहा भी था कि --''बा के बिना तो मैं केवल 'पु'ही रह जाउंगा ''कस्तूरबा गांधी की मृत्यु पर पूरा देश रोया था ,

उसी दौरान एक और नाम भी चर्चित हो रहा था वह था -''लक्ष्मी सहगल --सुभाष चन्द्र बोस कि महिला ब्रिगेड की  नेता लक्ष्मी सहगल ने कम उम्र में ही देश के प्रति समर्पित होने की भावना से क्रांति की मशाल को थाम लिया था,युवा महिलाओं की कमान का सशक्त और मजबूत नेतृत्व  किया था उन्होंने और एक प्रेरणा व् आदर्श बन गई थीपुरे देश के लिए  ,,,
भारत की राजनीति में सम्पूर्ण विश्व की अपेक्षा महिलाओं का योगदान अभूतपूर्व रहा है, उन्होंने न केवल समाज को दिशा दी बल्कि अनथक श्रम और सेवा  करते हुए अपने घर परिवार को भी सम्भाला है ,इस संदर्भ में सबसे चर्चित नाम है ''तत्कालीन राजनीति में शिखर पर रहे नेहरू परिवार की बहू और जवाहर लाल नेहरू की धर्मपत्नी 'कमला नेहरू ''एवं माँ स्वरुप रानी नेहरू 'का ,जब मोतीलाल नेहरू और जवाहर लाल  जेल में रहते या स्वराज आंदोलन में व्यस्त होते ये दोनों महिलाएं आनंद भवन की सारी व्यवस्था संभालती,कार्यकर्ताओं को निर्देश देतीं और सक्रीय आंदोलन में भी भाग लेती थीं -जेल भी गईं --उनके विचारों में जो सादगी और सच्चाई तथा समर्पण कि  भावनाएं थीं उन्होंने देश की राजनीति पर अपनी अमित छाप छोड़ी थी ,अतयधिक अस्वस्थ होने पर शीघ्र ही उनका देहांत हो गया,,,

किसी भी देश की पहचान ,उसकी संस्कृति और उसके मूल्य ही होते हैं ,इसे सम्मान ओर्गौरव प्रदान कर विश्व में उसे प्रतिष्ठित करने के लिए नारी ही संस्कृति और नैतिक मूल्यों का ध्वज उठाये आगे बढ़ती रही है. कभी प्रसिद्द  कवी  जयशंकर प्रसाद ने कहा था --
'नारी तुम केवल श्रद्धा हो,
विश्वास रजत पग नभ ताल में.
पीयूष स्रोत सी बहा करो,
जीवन के सुन्दर समतल में.

सचमुच जीवन के अरण्य में पीयूष स्रोत सी प्रवाहिता नारी सदैव अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं सामजिक एवं नैतिक मूल्यों की रक्षा में एक प्रहरी की भांति सन्नद्ध रही है. वैदिक युग से लेकर आधुनिक युग तक का इतिहास इस बात का साक्षी रहा है.
हमारी भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी धरोहर है उसकी ,पारिवारिकता,उसकी मर्यादाएं,जो हमें एक दुसरे से जोड़े रखती हैं जिसकी धुरी में नारी ही रहती है, चाहे माँ  के रूप में ,पत्नी, बहू या बेटी के रूप में. ये सारे  रिश्ते उसने खुद ही स्वीकार किये हैं, उसे सजाया है, संवारा है, ओर निभाया भी है.परिवार को सर्वोत्तम पाठशाला मन गया है जहाँ एक कुशल अध्यापिका की तरह नारी ही उनका चरित्र निर्माण करती है.क्योंको परिवार के बीच रहकर वह सबकी आदतों, रुचियों मनोभावों से पूर्णत; परिचित होती है. और  उन्हें समझती है गोस्वामी तुलसीदास जी ने नारी ओरपुरुष दोनों को एक दूसरे  का समकक्ष मान करएक दूसरे का पूरक बताया है. --

''जिय बिनु देह नदी बिनु नारी,
तैसी नाथ पुरुष बिनु नारी''

इधर कुछ वर्षों से भौतिकता वादी युग ने पश्चिम की बुराईयों को भी जगह दी है.जो हमारे नैतिक व् सांस्कृतिक पतन का कारण भी बन रही है.परिवार टूट रहे हैं ,एकल परिवारों की संख्या बड़ी है.फलस्वरूप जो अपसंस्कृति पनप रही है वह युवा पीढी के लिए घातक  सिद्ध हो रही है.अपने नैतिक मूल्यों की अवहेलना करना ये सारी बातें भारतीय नारी के लिए गर्व का कारण नहीं हैं.घर-परिवार,समाज के प्रति निष्ठां कीपवित्र भावनाएं ही उसे समाज में उचित स्थानदिला सकती हैं क्योंकि एक संस्कृति विहीन समाज अधिक दिनों तक पनप नहीं सकता. हमारा परिवार समाज की एक इकाई है तो समाज सुधारने से पहले परिवार को सुधारें तभी सुसंस्कृत परिवारों का एक अनुशासित समाज बन सकेगा.मानस में कौशल्या ने राम वन गमन के समय संबंधों की मर्यादा का सुन्दर पाठ राम को पढ़ाया था-''जो केवल पितु आयसुताता 
तो जनि जाहू जनि बड़ी  माता
जो पितु मातु आयसु यह दीना,
तो कानन शत अवध समाना''

किसी विचारक ने कहा था की ''यदि अमेरिका के पास डालर की शक्ति है, रूस ओउर चीन के पास सैन्य शक्ति तो भारत के पास परिवार की शक्ति है.'' और इस शक्ति की नियंता रही है नारी. जावन के संघर्षों में आज भी भारतीय नारी ने हार नहीं मानी है. अपनी प्रगति के रस्ते खुद तलाशे हैं, भारतीय नारी ने सपने भी देखें हैं तो अपने नीद की सुख छाँव में ,अपनों के बीच न की उसे तोड़ कर, विच्छिन्न कर ,वही हमारी संस्कृति की पहचान है. यदि वही पुन्य सलिला नारी हमारे समाज में पद दलित होती है तो यह लज्जाजनक और हमारी संस्कृति का अपमान है. और एक पददलित संस्कृति कभी किसी समाज को विकास का मार्ग नहीं दिखा सकती. हमें अपनी सोच को उदार बनाना होगा.,दहेज़,हत्या, भ्रूण ह्त्या जैसी बुराईयों को जड़ से मिटा कर एक नया आसमान बनाना होगा. जो हमें सुख की छाँह दे सके. आज की भौतिकतावादी नारियों को भी परखना होगा  की नारी मुक्ति या आजादी का तात्पर्य सामाजिक बंधनों से मुक्ति है या पारिवारिक बंधनों से?'यह जानना होगा. 'नारी गुणों की खान है, जयशंकर प्रसाद जी ने कामायनी में कहा था कि -


''दया, माया, ममता लो आज,
मधुरिमा लो अगाध विशवास,
हमारा ह्रदय रत्न निधि स्वच्छ 
तुम्हारे लिए खुला है पास''

हम नारी के सम्मान की रक्षा करें तभी हमारी विश्व प्रसिद्द संस्कृति जीवित रह पायेगी. -
आज देश का भविष्य अनिश्चय की स्थिति में है - राजनीति एक करवट ले रही है ,सब कुछ उथल पुथल हो रहा है,ऐसे समय में महिलाओं की भूमिका भी जरुरी हो गई है कि वे देश की राजनीति में भी होना सक्रिय योगदान दें-लेकिन राजनीति में महिलाओं का योगदान आज दिखाई नहीं देता -बहुत कम महिलाएं संसद में पहुँच पाती  हैं फलस्वरूप उनके हित में बनाये जाने वाले कानून, संवैधानिक धाराओं ,और नियमो कि अनदेखी होती रहती है,क्योंकि उन्हें सशक्त आवाज नहीं मिल पाती ,,,आज संसद में बैठी मीरा कुमार ,सुषमा स्वराज , मायावती जैसे कुछ ही गिने चुने नाम हैं जिनका प्रभाव कायम है, पर उनकी आवाज भी नहीं सुनी गई -और महिला आरक्षण बिल या महिलाओं को संसद में तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने का कानूनी प्रावधान -दम तोड़ गया.

पर बदलती वैश्विक और राष्ट्रीय परिस्थितियों के दौरान बहुत कुछ बदला है,-समाज की सोच और दिशा में आये बदलाव ने नैतिक मूल्यों और संस्कारों को हानि पहुंचाई है,सबसे बढ़कर महिलाओं के सम्मान के प्रति पुरे समाज के कदम भटकने लगे हैं -,भारत की नारी आज भी अपने जीवन संघर्षों की लड़ाई लड़ रही है --सदियों की गुलामी से उत्पीडित -प्रताड़ित ,रुढियों की श्रृंखलाओं में बंदी -उसकी आँखों ने एक -सपना जरुर देखा था --- जब देश आजाद होगा-अपनी धरती ,अपना आकाश  अपने सामाजिक  दायरों  में वह  भी सम्मानित होगी,-उसके भी सपनों ,उम्मीदों को नए पंख मिलेंगे,पर उनका  यह सपना कभी साकार नहीं हो पाया,-अपने अधूरे सपनो के सच होने की उम्मीद लिए महिलाएं देश की स्वतंत्रता के संघर्ष में भी भागीदार  बन जूझती रहीं-सामाजिक ,राजनीतिक ,चुनौतियों से ,-अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए -बलिवेदी पर चढ़ मृत्यु को भी गले लगाया पर हतभाग्य !--देश को  आजादी  तो मिली  पर ''राजनीतिक आजादी'' ,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भी मिला ,पर अधूरा ,--नियमो -कानूनों,में लिपटा हुआ - -हजारों लाखों सपनो के बीच नारी मुक्ति का सपना भी सच होने की आशा जागी थी ,शांति घोष ,दुर्गा भाभी ,अजीजन बाई ,इंदिरा ,कमला नेहरु ,जैसे अनगिनत नाम जिनमे शामिल थे ---पर नारी मुक्ति के सपने कभी साकार नहीं हो पाए ,-उनकी स्थिति  में कोई  परिवर्तन  नहीं आया  ,वे पहले भी सामाजिक , वर्जनाओं के भंवर में कैद थीं -आज भी हैं  ,कभी महिलाओंने सोचा था की जब उन्हें  आजादी मिलेगी उनकी भी आवाज सुनी  जाएगी  ,वे भी विकास की मुख्य धारा में शामिल होकर अपनी मंजिल प्राप्त कर पाएंगीं ,पर आज वे अपने ही देश में सुरक्षित नहीं हैं ,--पहले भी घर व् समाज की चार दीवारों  में आकुल -व्याकुल छटपटाती थी, और आज भी स्वतंत्रता के 66 वर्षों के बाद भी --वे चार दीवारों में बंदी रहने  को विवश हैं क्योंकि  बाहर  की दुनियां उनके लिए निरापद नहीं है , यह कैसी बिडम्बना है ! कैसी स्वतंत्रता है ! जो मिल  कर भी  कभी  फलीभूत नहीं हो सकी?

कितने ही बलिदानों  , संघर्षों ,से प्राप्त आजादी को हमने कुछ सत्ता लोलुपों के हाथ का खिलौना बना दिया ,वे देश के भविष्य से खेलते रहे -संविधानो -कानूनों ,न्याय और प्रगति के नाम पर एक प्रभुत्व संपन्न गणराज्य के  भाग्य का  फैसला सुनाते  रहे ,परदे के पीछे से घिनौना खेल खेलते रहे ---पूरा देश  देखता रह गया ..आजादी मिले वर्षों बीत गए -समय बदला-युग बदले -कामना तो यही की थी मनुष्यता के पक्षधरों से --उनकी सोच .विवेक ,बुद्धि का विकास होगा --मानवता के नये आयाम स्थापित होंगे ..शिक्षा होगी तो अन्तश्चेतना का भी उत्कर्ष होगा. पर कितना दुःख होता है ये पंक्तियाँ लिखते हुए की परिवर्तनों के दौर से गुजर कर भी -शिक्षित होते हुए भी हमने क्रूरता -संवेदना और नृशंसता  की सारी  वर्जनाएं --सीमाएं तोड़ दी हैं - हम आवाज उठाते रहे -जुल्म के खिलाफ -नारी अस्मिता के लिए --पर कहाँ  खो हो जाती हैं वे आवाजें ?..सत्ता बहरी है या समाज ?पहले विदेशियों ,अंग्रेजों से संघर्ष था ,,पर आज अपनों से है,--अपनों से- अपनों का यह युद्ध ज्यादा कठिन है,,,हमारी आधी आबादी यानि आज की भारतीय नारी को अपनी गरिमा ,अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए  समाज की मुख्य धारा से जुड़कर राजनीति के गलियारों में अपने कदम जमाने के लिए -सर्व प्रथम अपनी एकता आपसी सामंजस्य को बनाये रखना होगा ,क्योंकि उनकी एकता ही वह मजबूत हथियार है जिससे उन्हें अपने विलुप्त होते अस्तित्व को बचा पाने में मदद मिलेगी,राजनीति की धार पैनी है,सम्भल सम्भल कर चलना होगा,,,उन्हें  कीचड़ में खिले कमल की तरह उभरकर सामने आना होगा ,अपने हक़ कि लड़ाई में बिना किसी डर -भय या पूर्वाग्रह के अपनी आवाज उठानी होगी , चाहे वे किसी भी पार्टी या दल की हो - आपसी मतभेद - को भुलाकर केवल स्त्री के संघर्ष के लिएअपनी लड़ाई,को जारी रखें  ताकि उनकी आवाज गली -सड़कों से निकलकर संसद के गलियारों की आवाज बन सके-महिलाओं का राजनीति में आना ईमानदारी,निष्ठां और  अधिकारों के प्रति बदलाव का  सुखद संदेश भी हो सकता है,वे ममतामयी होती हैं अतः अपने ममत्व के दायरे को बढ़ाकर देश हित में निर्भीक हो विकास-कार्य कर सकती हैं, जब महिलाएं खुद  अपने लिए क़ानून बनाएंगी,उसका पालन भी पूर्णतः सक्षम हो ,किया या करवाया जा सकेगा,अपने हक के कानूनो की जानकारी किसी महिला के प्रति अन्याय नहीं होने देगी, बस अपनी एकजुटता का मजबूत प्रदर्शन उन्हें आत्मबल ,कर्त्तव्य-निष्ठां और अधिकारों के प्रति सजग भी बनाएगा -तैंतीस प्रतिशत महिला आरक्षण का संसद में  बिखर जाना हम  सबने देखा है,क्योंकि उनकी आवाज को दबा देना आसान हो गया था,उन्हें आने दें राजनीतिमें ,देश के लिए ...

पद्मा मिश्रा -साहित्यकार - जमशेदपुर

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