लोपामुद्रा -अजन्मी ब्रह्मवादिनी

वैदिक स्त्रियों में कुछ अत्यंत प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण नाम हैं - घोषा, मैत्रेयी, गार्गी। ये सभी तपस्विनी, ब्रह्मवादिनी, दर्शन शास्त्री, संत, कल्याणकारी तथा अत्यंत विदुषी स्त्रियों में गिनी जाती हैं। इन्होने अपनी प्रखर बुद्धि से वेद, पुराण एवं उपनिषद रचना में भी सहयोग दिया। इन्हीं नामों में एक नाम है लोपामुद्रा का।

Apr 25, 2024 - 12:53
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लोपामुद्रा -अजन्मी ब्रह्मवादिनी
NAARI

वैदिक युग में नारी के भली भांति शिक्षित होने के साथ ही समाज में उनके समान अधिकार और पूर्ण  सम्मान के बारे में लगभग सभी वेद कहते हैं। यहाँ तक कि वेदों के निर्माण में भी महिलाओं का पुरुषों की तरह ही एक समान योगदान होने के बारे में उल्लेख मिलता है। हालाँकि, इसके साथ ही समाज में स्त्री की एक सीमित भूमिका का भी संदर्भ मिलता है। हाँ, सभ्यताओं के दो विपरीत किनारों पर खड़ी स्त्री समाज के लिए सदैव उपयोगी रही है, इसमें कोई संदेह नहीं। उपनिषदों, शास्त्रों तथा पुराणों में नारी को एक सूक्ष्म एवं  तेजस्वी शक्ति के रूप में उपासना किये जाने का संदर्भ मिलता है। इन शास्त्रों में से कुछ प्रमुख नाम हैं: देवी उपनिषद, देवी महात्म्य एवं देवी भागवत पुराण।  इसके अलावा ऋग्वेद का देवी सूक्त कहता है कि ब्रह्मांड के सृजन के मूल में स्त्री शक्ति है तथा शाश्वत, अविनाशी स्वरुप में यह शक्ति सर्वत्र व्याप्त है, स्वयं ब्रह्म, आत्म एवं अनुभूति में भी इसी स्त्री तत्त्व की उपस्थिति कही गई है। 

वैदिक स्त्रियों में कुछ अत्यंत प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण नाम हैं - घोषा, मैत्रेयी, गार्गी। ये सभी तपस्विनी, ब्रह्मवादिनी, दर्शन शास्त्री, संत, कल्याणकारी तथा अत्यंत विदुषी स्त्रियों में गिनी जाती हैं। इन्होने अपनी प्रखर बुद्धि से वेद, पुराण एवं उपनिषद रचना में भी सहयोग दिया। इन्हीं नामों में एक नाम है लोपामुद्रा का।
 
पूर्वीरहं शरद: शश्रमाणा दोषा वस्तोरुषसो जरयन्तीः। 
मिनाति श्रियं जरिमा तनूनामप्यू नु पत्नीर्वृष॑णो जगम्युः ॥ १ ॥​ 
ऋग्वेद 1.179.1 
भावार्थ:
जैसे बाल्यावस्था को लेकर विदुषी स्त्रियों ने प्रतिदिन प्रभात समय से घर के कार्य और पति की सेवा आदि कर्म किये हैं, वैसे किया है ब्रह्मचर्य जिन्होंने, उन स्त्री-पुरुषों को समस्त कार्यों का अनुष्ठान करना चाहिये॥ (स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद, संदर्भ वेद डॉट कॉम - https://xn--j2b3a4c.com/rigveda/1/179/1) 

लोपामुद्रा ने ऋग्वेद में उपरोक्त सूक्त एवं गृहस्थ जीवन के बारे में कुछ अन्य सूत्र लिखे हैं। इन सूत्रों में रति कर्म एवं गृहस्थ पुरुष के अपनी पत्नी के प्रति कर्तव्य के बारे में उल्लेख आता है।  लोपामुद्रा की कहानी जानने एवं उसके द्वारा लिखित ऋग्वेद के सूत्रों का मर्म जानने के बारे में मुझे जिज्ञासा हुई तो कुछ छानबीन करने के पश्चात् जो कहानी हासिल हुई, वह कहानी और कुछ प्रश्न, कुछ अवलोकन लेकर मैंने यह आलेख लिखने का प्रयास किया है। 

लोपामुद्रा को  प्राचीन भारतीय वैदिक साहित्य में तत्वज्ञानी के रूप में वर्णित किया गया है।  इन्हें अन्य नामों से भी जाना जाता है, कावेरी, कौशितकी एवं वरप्रदा। एक महत्वपूर्ण बात जो उनके बारे में कही जाती है कि वे एक प्रसिद्ध ब्रह्मवादिनी के रूप में पहचानी जाती हैं। आपकी जानकारी के लिए बताना चाहूंगी कि ब्रह्मवादिनी उपाधि उस स्त्री को दी जाती है जो इस विश्व के रहस्य, तत्वज्ञान एवं ब्रह्म सत्य की तलाश में सम्पूर्ण प्रयास तथा परिश्रम करके ज्ञान प्राप्त करती है तथा उस प्राप्त ज्ञान के कारण वेद व्याख्याता भी कही जाती है। 

शास्त्रों में जिन तीन महत्वपूर्ण ग्रंथों में लोपामुद्रा का आख्यान आता है, वे हैं: ऋग्वेद, महाभारत का वनपर्व तथा गिरिधर रामायण। 

कहा जाता है कि ऋषि अगस्त्य (सप्तऋषियों में से एक) अपने पुरखों की शांति हेतु श्रेष्ठ संतान पाने की इच्छा से अपने लिए एक सर्वगुण संपन्न पत्नी चाहते थे। अतः उन्होंने संसार के विभिन्न प्राणियों के सर्वश्रेष्ठ अंग अथवा गुण लेकर एक बालिका का सृजन किया। इस सृजन से प्राणियों के विशेष गुणों अथवा अंगों का ह्रास होने के कारण ऋषि द्वारा सृजित कन्या का नामकरण लोपामुद्रा हुआ। बाद में ऋषि अगस्त्य ने उसे विदर्भ देश के राजा को सौंप दिया, जो कि संतान प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या कर रहे थे। राजा ने उस नन्ही शिशु को अपनी पुत्री मानकर उसका पालन पोषण किया।  जब वह विदर्भ राजकुमारी विवाह योग्य हो गई तब ऋषि अगस्त्य राजा के पास उस कन्या से विवाह की कामना से पहुंचे और लोपामुद्रा द्वारा विवाह की स्वीकृति मिलने से वह उनकी पत्नी बन गई। विवाहोपरांत लोपामुद्रा ने राजमहल तथा राजसी वस्त्राभूषणों का त्याग कर दिया और ऋषितुल्य वस्त्रों में अपने पति के आश्रम में रहने चली गई।  किन्तु जल्दी ही वह अपने पति के संयमित व्यवहार एवं तपस्या से उकता गई और इस उकताहट को उन्होंने ऋग्वेद में स्वयं के प्रति ध्यान दिए जाने तथा पत्नी को प्रेम दिए जाने के बारे में लिखा। यह छंद देख कर ऋषि को अपने पति धर्म निभाने का ज्ञान हुआ और तब उन्होंने अपनी पत्नी पर ध्यान देकर गृहस्थ धर्म निभाया। यह साडी कथा महाभारत के अरण्य पर्व में वर्णित है। 

ऋग्वेद में लोपामुद्रा ने श्रेष्ठ संतान पाने हेतु दम्पति के आदर्श परस्पर व्यवहार को निर्देशित करते हुए सूक्त लिखे हैं। इन्हें दंपत्ति को समर्पित सूक्तों की श्रेणी में रखा गया है। जैसे: 
अगस्त्य: खनमानः खनित्रै: प्रजामपत्यं बलमिच्छमानः। 
उभौ वर्णावृषिरुग्रः पुपोष सत्या देवेष्वाशिषो जगाम ॥
(ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:179» मन्त्र:6 | अष्टक:2» अध्याय:4» वर्ग:22» मन्त्र:6) 
भावार्थ-
जैसे कृषि करनेवाले अच्छे खेतों में उत्तम बीजों को बोय कर फलवान होते हैं और जैसे धार्मिक विद्वान् जन सत्य कामों को प्राप्त होते हैं वैसे ब्रह्मचर्य से युवावस्था को प्राप्त होकर अपनी इच्छा से विवाह करें वे अच्छे खेत में उत्तम बीज सम्बन्धी के समान फलवान् होते हैं ॥ ६ ॥ (स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद) 

लोपामुद्रा के बारे में पढ़ते हुए यह ज्ञात होता है कि - 

1 - पूर्व में ऋषियों के पास संभवतः कोई ऐसी विधि थी अथवा कोई ऐसा ज्ञान था जिस से बिना गर्भ धारण के संतानोत्पत्ति संभव थी।  जैसे इस आख्यान में ऋषि अगस्त्य इस संसार से विभिन्न अवयव एकत्र करके एक सुंदरतम विदुषी कन्या की कल्पना करते हुए एक पिंड बना कर उसे कन्या रूप में परिवर्तित कर देते हैं। यदि इस कहानी को केवल एक कपोल कल्पना भी माना जाए तो लोपामुद्रा के जन्म लेने का अन्यत्र कहीं सन्दर्भ मिलना चाहिए, जो कि अब तक कहीं नहीं मिलता।  

2  - जब ऋषि उस से विवाह का प्रस्ताव लेकर आते हैं तब विदर्भराज अपनी पुत्री का विवाह एक ऋषि से नहीं करवाना चाहते और वे अपनी पत्नी के सामने इस विषय पर वार्तालाप करते हैं। साथ ही राजा को ऋषि द्वारा शापित होने का भी भय है। इस दुविधा के समय में अपने पिता को आश्वस्त करते हुए लोपामुद्रा ऋषि से अपने विवाह का निर्णय स्वयं ही लेती है। राजा द्वारा अपनी पुत्री का यह निर्णय स्वीकार्य होता है, जिसका अर्थ यह हुआ कि उस काल में स्त्री का स्वेच्छा से विवाह करना अत्यंत सहज सामाजिक प्रक्रिया के अंतर्गत होना चाहिए। जहाँ स्त्री के चुनाव को सहमति दिए जाने में हिचकिचाहट नहीं होती होगी। यदि ऐसा न होता तो लोपामुद्रा के निर्णय का विरोध किया जाता तथा उसे पिता द्वारा चुने हुए वर से विवाह के लिए बलपूर्वक राजी किया जाता। इसी अंश में राजा अपनी पत्नी से विमर्श करते हैं, जो कि इस बात का सूचक है कि उस काल में पत्नी का उचित मान हुआ करता था और अपनी पत्नी से विचार विमर्श करने में स्वयं राजा भी आगे बढ़कर अपनी दुविधा के बारे में बात करते थे। 

3- विवाह के पश्चात आश्रम में जब ऋषि तपस्या में लीन थे और लोपामुद्रा ने स्वयं को अकेला पाकर पति के साथ की चाह में कुछ सूक्त रचे तो ऋषि ने न केवल उन सूत्रों को वेद वचन की भांति सम्मान दिया अपितु उन सूत्रों को वेदों में सम्मिलित भी किया। यही नहीं, पत्नी की इच्छा का सम्मान करते हुए उन्होंने कुछ समय के लिए ऋषि कर्म से मुक्त होकर पति धर्म निभाते हुए एक गृहस्थ के समान पत्नी समागम भी किया। और जिस श्रेष्ठ पुत्र की चाह में उन्होंने यह विवाह किया था, इस से उन्हें वह पुत्र भी प्राप्त हुआ। आख्यान के इस अंश से मैं यह समझती हूँ कि उस काल में एक स्त्री पति संसर्ग के लिए स्वयं प्रस्ताव रखने तथा पति को आकर्षित करने में झिझकती नहीं थी। सवाल यह है कि क्या उस समय में देह भोग एक छिपा कर रखने का विषय रहा होगा? यह भी संभव है कि लोपामुद्रा एक राजा के पास राजसी शिक्षा से पाली गई, अतः उसमें एक भयमुक्त स्वाभाविक त्वरा रही हो, उसी कारण उसमें अपनी बात कहने का पूर्ण आत्मविश्वास हो!

दूसरे, ऋषि द्वारा अत्यंत बुद्धिमती स्त्री के रूप में उसका सृजन किया गया, जिसकी वजह से अपने सृजन के प्रति एवं उसकी आत्मविश्वास और ज्ञान से भरपूर बात के प्रति ऋषि आनंदित अनुभव करते हों एवं सहज ही उसे संतुष्ट करने को तत्पर हुए हों!  इन परिस्थितियों का उस काल में जो भी कारण रहा हो, यह तो निश्चित ही सत्य है कि लोपामुद्रा अत्यंत रूपमती और ज्ञानवती स्त्री थी। इस आख्यान का अंत करने से पहले मैं लोपामुद्रा के नदी बन जाने की कहानी भी बताना चाहूंगी। कहा जाता है कि किसी कारण रुष्ट होकर  विष्णु भगवान ने लोपामुद्रा को श्राप दिया कि नदी बन जाओ। किन्तु ऋषि को लोपामुद्रा से दूर होना कष्टकर प्रतीत हुआ। अतः उन्होंने अपने कमंडल में नदी रूपी लोपामुद्रा को सहेज लिया। एक वेगवान नदी की लिए एक छोटे से कमंडल में बंद होकर रहना कठिन था।  यह कठिनाई दूर करने के लिए श्री गणेश एक कौवे के रूप में आये और तपस्या करते ऋषि के पास ही रखे कमंडल को गिरा दिया। इस प्रकार लोपामुद्रा कमंडल में से नदी की तरह बह निकली और कावेरी नदी के नाम से पहचानी गई।  एक अजन्मी अद्भुत कन्या को किसी साधारण रूप से जन्मे व्यक्ति की भांति मृत्यु नहीं प्राप्त हो सकती थी, अतः उसका नदी बन कर जग कल्याणकारी रूप में परिवर्तित हो जाना ही श्रेयस्कर! 

पूजा अनिल

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