महाभारत काल की द्रौपदी को पाँच पांडवों की पत्नी के नाम से जाना जाता है। जिसे पांडवों ने जुए में दांव पर लगा दिया और हार गए और कौरव जीत गए। अपनी विजय के मद में पारिवारिक-सामाजिक मर्यादा को तोड़ कर दुर्योधन के कहने पर दुःशासन ने भरी सभा में द्रौपदी को निर्वस्त्र करने का प्रयास किया किन्तु श्री कृष्ण ने चमत्कारिक रूप से द्रौपदी का चीरहरण नहीं होने दिया।
द्रौपदी का परिचय बस इतना ही नहीं बल्कि द्रौपदी का व्यक्तित्व इससे कहीं अधिर विस्तृत है। द्रौपदी विराट् युद्ध महाभारत की धुरी है। जिसके कारण इस युद्ध का सूत्रपात हुआ। महाभारत पारिवारिक वैमनस्य का एक ऐसा युद्ध था, जिसके परिणाम भारत कभी भूल नहीं सकता। कौरव -पाण्डवों का महासंग्राम द्रौपदी की ही धुरी पर घूमा है, जो ना सिर्फ पांचाल नरेश की पुत्री याज्ञयसेनी है ---जिसे उन्होंने यज्ञ की ज्वाला से आशीर्वाद स्वरूप प्राप्त किया था-- बल्कि द्रौपदी भारत की महानतम नारियों में एक है। उसे अक्षय कौमार्य का वरदान प्राप्त है । वह पंचकन्या में नामित है ।
यज्ञ कुण्ड़ से जन्म लेने वाली, प्रतापी राजा द्रुपद की पुत्री है, जिसे याज्ञनी नाम से जाना जाता है। कृष्ण की सखी होने और सांवले रंग की अद्वितीय सुन्दरी होने के कारण कृष्णा नाम भी दिया गया है। किन्तु, अतुलनीय रूप-गुण से संपन्न द्रौपदी का नाम पाँच पतियों की पत्नी के रूप में अधिक विख्यात है ।
विडम्बना है कि, इतिहास ने द्रौपदी के साथ न्याय कभी नहीं किया। उसे पाँच पतियों की पत्नी और कौरवों के अहंकार के नाश में धधकती स्त्री के ही रूप में चित्रित किया गया । वस्तुतः द्रौपदी अपने युग की सुन्दरतम -बुद्धिमती स्त्री है। असाधारण रूप-गुण, संयम , धैर्य ,शील और समर्पण से परिपूर्ण है । कोई नारी उसकी बराबरी नहीं कर सकती। द्रौपदी ने उस काल में पाँच पतियों का वरण किया था, जब स्त्री के सतीत्व और मर्यादा का अर्थ था , केवल एक पुरुष की समर्पित और निष्ठावान पत्नी होना ।
कथा है कि माता कुंती ने अपने पुत्र अर्जुन से कहा था -- "जो लाए हो , पाँचों भाई बाँट लेना। " सवाल ये है, कि जब बिना देखे कुंती ने बाँटने की बात कही , तब देखने के बाद क्यों नहीं अपनी भूल सुधारी ? द्रौपदी कोई वस्तु तै नहीं थी ?
माता कुंती भी कोई सामान्य नारी नहीं थी । बुद्धि चातुर्य का पूरा ज्ञान रखती थीं। उन्हें पता था , कि द्रौपदी के अतुलनीय -असाधारण रूप-गुण के कारण उनके पाँचों पुत्र, जो आपस में प्रेम का उदाहरण हैं , आपस में कट कर मर सकते हैं। कुन्ती ,जो दिव्य देवताओं को स्मरण मात्र से बुला सकती है , वह अज्ञानी कैसे हो सकती है ? कथा सरल है , लेकिन घटना इतनी सरल नहीं हो सकती । क्योंकि, माँ जानती थी कि जो संघर्ष दुर्योधन और अर्जुन में होगा, वही संघर्ष पाँचों भाई में हो सकता है । क्योंकि द्रौपदी थी ही ऐसी। पाँच पाण्डव भी "बाँट लो " के बाद भूल सुधार के पक्षधर नहीं थे। कुंती ने सुगमतम राजनीति से इस बँटवारे को होने दिया। यह समझना होगा कि द्रौपदी अद्वितीय है।
उसमें सीता का माधुर्य है, उसमें क्लियोपेट्रा का नमक और गार्गी का तर्क एक साथ है। सीता, सावित्री , सुलोचना सभी श्रेष्ठ नारियाँ हैं, लेकिन जिस तरह द्रौपदी असाधारण है वह दूसरी कोई स्त्री हो ही नहीं सकती ।
पांडव यदि कौरव को पाँच गाँव दे देते, तो विवाद नहीं बढ़ता। लेकिन पांडव अपनी आन में राज्य और पत्नी भी दांव पर लगा बैठे।
स्वयंबर में अर्जुन के विजयी होने पर द्रौपदी ने अर्जुन का वरण किया। इसके बाद से ही द्रौपदी के जीवन की उथल-पुथल का आरंभ हो गया। ससुराल पहुचते ही उसे पाँच पतियों की पत्नी बना दिया गया । किन्तु बल बुद्धि और धर्म के प्रतीक पाँच श्रेष्ठ पतियों की पत्नी, प्रतापी राजा द्रुपद की पुत्री और श्री कृष्ण की सखी, जैसी श्रेष्ठ स्त्री को धर्मराज कहे जाने वाले , युधिष्ठिर ने जब वस्तु के रूप में दांव पर लगाया , तब द्रौपदी के तार्किक प्रश्न के आगे युधिष्ठिर भी कमजोर पड़ जाते हैं। फिर भी द्रौपदी ने उनका तिरस्कार नहीं किया। चीर हरण के समय द्रोणाचार्य चुप थे,किन्तु द्रौपदी ने मर्यादा तोड़ कर अपशब्द नहीं कहे, ना शाप दिया। जिन सात महारथियों ने द्रौपदी के पाँच पुत्रों को सोते हुए मारा था, द्रौपदी ने उन्हें माफ़ कर दिया। द्रोणाचार्य का उसने सदा सम्मान किया । गुरु पुत्र होने के कारण उसने अश्वथामा का वध भी नहीं होने दिया। अद्वितीय द्रौपदी को उस युग के किस पुरुष ने नहीं चाहा होगा? निश्चय ही दुर्योधन ने भी उसे चाहा होगा। द्रौपदी को दुर्योधन नहीं पा सका, वह द्रौपदी के व्य॔ग से बिंधा हुआ है। पुरुष की सब से बड़ी हार है उसकी पराजय । दुर्योधन पर हंसने वाली स्त्री साधारण स्त्री नहीं हो सकती। पाँच पतियों की हो कर भी द्रौपदी पवित्र और सति है।
उसकी श्रद्धा है संकल्प है, जो उसे नग्न करने के प्रयास को विफल करता है। नग्न करना और नग्न होना दोनों अलग बात है ।
द्रौपदी का अपना संकल्प और विश्वास उसे सभी से श्रेष्ठ बनाता है ।
ड़ॉक्टर राम मनोहर लोहिया नारीवादी स्वर में कहते हैं--"नारी को गठरी के समान नहीं, बल्कि इतनी शक्तिशाली होनी चाहिए कि वक्त पर पुरुष को गठरी बना कर अपने साथ ले चले ।" वे सीता सावित्री से किसी प्रकार द्रौपदी को कम नहीं आंकते हैं। उनके विचार से स्त्रीत्व का मापदण्ड केवल निष्ठा जैसे गुणों तक ही सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
कुन्ती की राजनीतिक दूरदर्शिता का ग्रहण द्रौपदी के चरित्र पर आभासी छाया देता है , जो उसकी विलक्षणता को नजर अंदाज कर के केवल पाँच पतियों की पत्नी के नाम से प्रचारित करता है ।
द्रौपदी के चरित्र का महत्व पूर्ण पक्ष उसका रूप-गुण , बुद्धि और असाधारण धैर्य है,जो उसे कुंती के निर्णय का सम्मान करने का साहस देता है। पंचकन्या में गिनी जाने वाली द्रौपदी निश्चय ही श्रेष्ठ नारी है ।