प्रेमचंद की ऐतिहासिक कहानियां तथा उपन्यास

प्रेमचंद की ऐतिहासिक कहानियों में “रानी सारंधा”, “सती”, “मर्यादा की वेदी” “पाप का अग्निकुंड”, “राज्यभक्त” में राजस्थान, बुंदेलखंड एवं उत्तर प्रदेश के राजपूतों एवं रानियों के आन, बान, शान एवं स्व उत्सर्ग की कहानियां प्रस्तुत होती है । जबकि “राजा हरदौल” कहानी में राजा हरदौल की वीरता एवं भाई के शक को दूर करने हेतु स्व बलिदान की गाथा कहीं गई है ।

Mar 13, 2024 - 16:06
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प्रेमचंद की ऐतिहासिक कहानियां तथा उपन्यास
PREMCHAND

वर्तमान के साहित्यकारों ने प्रेमचंद की ग्राम्य जीवन परकेन्द्रित रचनाओं पर ही अधिक ध्यान दिया है या फिर विमर्शों के चश्मे
से निहारते हुए उनकी समस्त रचनाओं को विश्लेषित किया है , जिसके कि फलस्वरुप उनके साहित्य सृजन के कई महत्वपूर्ण पहलू उपेक्षित रह गये है । उनके साहित्य सृजन का ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पहलू उनके द्वारा लिखी गई ऐतिहासिक कहानियों एवं उपन्यास का है जिस पर वर्तमान साहित्य में संभवतः उतनी चर्चा नहीं की गई जितनी आपेक्षित थी । प्रेमचंद की इतिहास में प्रारंभ से ही विशेष रुचि रही । अपने अध्ययन काल में ही उनने सन 1810 में अंग्रेजी, दर्शन और फ़ारसी के साथ इतिहास लेकर इंटर तथा सन् 1919 में अंग्रेजी, फ़ारसी तथा इतिहास लेकर बी. ए. की शिक्षा ग्रहण की थी । साहित्य सृजन करते हुये उनने 18 उपन्यास तथा लगभग 300 कहानियां लिखी जिनमें से 14 ऐतिहासिक कहानियां तथा 1 ऐतिहासिक उपन्यास उनके द्वारा लिखा गया । ऐतिहासिक कहानियों में – (1) वज्रपात (2) रानी सारंधा (3) राजा हरदौल (4) दिल की रानी (5) शतरंज के खिलाड़ी (6) धिक्कार (7) लैला (8) सती (9) मर्यादा की वेदी (10) पाप का अग्निकुण्ड (11) धोखा (12) जुगनू की चमक (13) राज्यभक्त तथा (14) न्याय कहानियों के नाम लिये जा सकते हैं । कुछ विद्वान “परीक्षा” कहानी को भी ऐतिहासिक कहानी मानते हैं लेकिन परीक्षा
कहानी का कथानक किसी कालखंड के इतिहास से जुड़ा हुआ नहीं है । जबकि ऐतिहासिक उपन्यास के बतौर “रूठी रानी” का जिक्र किया जा सकता है, जो कि मूलतः उर्दू में लिखा गया था तथा सन् 1962 मेँ अमृतराय ने अपनी पुस्तक “मंगलाचरण” में प्रेमचंद के प्रारंभिक उपन्यासों के तहत इसे संकलित कर के “ हंस प्रकाशन इलाहाबाद” से तीन अन्य उपन्यासों के साथ प्रकाशित कराया था ।

प्रेमचंद की ऐतिहासिक कहानियों में “रानी सारंधा”, “सती”, “मर्यादा की वेदी” “पाप का अग्निकुंड”, “राज्यभक्त” में राजस्थान, बुंदेलखंड एवं उत्तर प्रदेश के राजपूतों एवं रानियों के आन, बान, शान एवं स्व उत्सर्ग की कहानियां प्रस्तुत होती है । जबकि “राजा
हरदौल” कहानी में राजा हरदौल की वीरता एवं भाई के शक को दूर करने हेतु स्व बलिदान की गाथा कहीं गई है । राजा हरदौल से संबंधित लोक कथाओं में जहां हरदौल के बड़े भाई जुझार सिंह द्वारा अपना शक दूर करने के लिए अपनी पत्नी रानी कुलीना को हरदौल के खीर में विष मिला कर खिलाने हेतु विवश किया जाता है वहीं प्रेमचंद की इस कहानी में जुझार सिंह द्वारा स्वयं विषयुक्त पान का बीड़ा हरदौल को देने तथा सब जानते हुये भी हरदौल द्वारा पान का बीड़ा खाने की बात कही गई है । जबकि “जुगनू की चमक” कहानी के कथानक मे पंजाब की रानी चन्द्रकुंवरी को नेपाल में राणा जंगबहादुर द्वारा ससम्मान शरण देने की बात की गई है । प्रेमचंद की ऐतिहासिक कहानियां सिर्फ राजपूतों की आन बान शान की बात नहीं करती और ना ही सिर्फ भारतीय परिवेश
में ही सिमट कर रह जाती है बल्कि उनकी ऐतिहासिक कहानियों का फलक काफी विस्तृत है । उनकी कई ऐतिहासिक कहानियां अरब, ईरान, यूनान, तेहरान आदि के परिवेश पर केन्द्रित है । उनकी “दिल की रानी” कहानी जहां तैमूर द्वारा तुर्को के दमन की कहानी कहती हैं वहीं पुरुष वेश में हबीब यजदानी की लड़की तुल हबीब तैमूर की वजीर बन कर इस्तखर इलाके के इसाइयों पर लगे जजिया कर तथा गिरजाघर में घंटा बजाने की पाबंदी को हटा कर इस्लाम के उदार पक्ष को प्रस्तुत करती है ।बाद में तुल हबीब तैमूर का ह्रदय परिवर्तन कर तथा तैमूर से निकाह कर उनकी सर्वाधिक प्रचलित “बेगम हमीदा” के नाम से मशहूर होती है । इस कहानी में जहां इस्लाम का उदार पक्ष प्रस्तुत होता है वहीं प्रेमचंद की “जिहाद” कहानी में पठानों द्वारा हिन्दुओं पर अत्याचार एवं तलवार की नोक पर धर्मान्तरण की कहानी कही गई है जिसमें धर्मदास धर्म परिवर्तन स्वीकार लेता है लेकिन खजान चंद धर्मांन्तरण को न स्वीकार कर मौत को गले लगाता है । जबकि प्रेमचंद की “ लैला” कहानी लैला मजनू की कहानी नहीं है अपितु लैला और नादिर की प्रेम कहानी है, जिसमें नादिर और लैला जनता की बगावत से राज्य छोड़ कर वन चले जाते हैं फिर अमीरों द्वारा उन्हे वापस लाया जाता है तथा लैला के प्यार मे नादिर द्वारा ठीक से राज्य संचालन होता न देख लैला फिर से अपनी डफ़ली लेकर अपनों के बीच वापस चली जाती है । “ धिक्कार” कहानी में ईरान और यूनान के बीच घनघोर युद्ध में डेल्फी के मंदिर में पुजारिन के बेटा द्वारा अपने देश यूनान से देशद्रोह करने पर पुजारिन धिक्कारते हुए अपने पुत्र पर पहला पत्थर उठाती है तथा उसे बंद कमरे
मे चुनवा देती है । “न्याय” कहानी हज़रत मुहम्मद साहब के इलहाम के बाद “इस्लाम” के प्रसार एवं कुरैशियों द्वारा विरोध के मध्य मुहम्मद साहब की पुत्री जैनब एवं उसके पति अबुलआस के दाम्पत्य जीवन बिखरने की कहानी है । जैनब इस्लाम धर्म स्वीकार लेती है जबकि अबुलआस कुरैशियों के साथ है जिसे कि इस्लामधर्मी विधर्मी मानते हैं । कथानक में अबुलआस को मुस्लिमों द्वारा गिरफ्तार करना, क्षमादान देना तथा बाद में अबुलआस द्वारा इस्लाम धर्म स्वीकार लेना समाहित है ।

प्रेमचंद की कई ऐतिहासिक कहानियों में विशेष काल खंड की राजनीतिक परिस्थितियों का प्रतिबिंबन होता हुआ दिखाई पड़ता है । इस संबंध में “राज्यभक्त” एवं “ शतरंज के खिलाड़ी” कहानी का जिक्र किया जा सकता है । दोनों ही कहानियों का परिवेश लखनऊ का है । लखनऊ के तत्कालीन बादशाह नासिरूद्दीन के राज्य में अंग्रेजों एवं उनकी कंपनी का दबदबा कहानी में चित्रित होता दिखाई पडता है । जबकि “ शतरंज के खिलाड़ी” कहानी में वाजिद अली शाह के पतनशील सामान्तवाद का जीवंत चित्र प्रस्तुत किया गया है । वाजिद अली के सामान्त भोग विलास में डूबे हुए हैं । उनके सामान्त सज्जाद अली तथा मीर रोशन अली शतरंज के खेल में इस कदर डूबे हुये है कि उन्हें अंग्रेजी सेना का लखनऊ पर कब्जा होने तथा वाजिद अली शाह के गिरफ्तारी से कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन शतरंज के हार जीत के विवाद में वे एक दूसरे की जान ले लेते हैं । प्रेमचंद की “ शतरंज के खिलाड़ी” कहानी अक्टूबर 1924 में “माधुरी” पत्रिका में प्रकाशित हुई थी तथा सन् 1977 में सत्यजीत राय ने इस कहानी पर इसी नाम से फिल्म का
निर्माण किया था । ऐतिहासिक कहानियों के अतिरिक्त पहाड़ी कबीले अफरीदी की जीवन शैली उनकी कहानी “फातिहा” में रोचक ढंग से प्रस्तुत होती है ।

लंबे समय से देखने में आ रहा है कि वर्तमान साहित्य में प्रेमचंद की सिर्फ कुछ कहानियों विशेष तौर पर “कफन” कहानी पर ही लगातार बारंबार चर्चा की जा रही है जबकि जरुरी है कि उनकी ऐतिहासिक कहानियों के साथ ही उन कहानियों पर भी चर्चा की जाये जिन पर अब तक चर्चा नहीं की गई है । शायद तभी हम प्रेमचंद की समग्र कहानियों का सही मूल्यांकन कर सकेंगे ।

प्रेमचंद ने ऐतिहासिक कहानियों के अलावा “ रूठी रानी” शीर्षक से एक ऐतिहासिक उपन्यास उर्दू में लिखा था जो कि अप्रैल 1907 से अगस्त 1907 तक “जमाना” में प्रकाशित हुआ था । उपन्यास के कथानक में जैसलमेर के रावल लोनकरन की सुंदर बेटी उमादे का मारवाड़ के बहादुर राजा मालदेव से विवाह तथा विवाह के बाद सुहाग सेज पर उमादे, राव जी की राह तकती रह जाती हैं और राव जी शराब के नशे में बदमस्त गानेवालियों का गाना सुनते रहते हैं । उमादे की सहेली बांदी भारीली रावल जी को बुलाने जाती है तो उसकी नियत में खोट आ जाता है और उन्हें रनिवास न ले जा कर स्वयं अपन घर ले जाती है । राव जी नशे में उसे ही रानी समझते है लेकिन सुबह नशा टूटने पर जब हकीकत का पता चलता है तो वे बेहद शर्मिंदा होते हैं । दूसरी तरफ रानी उमादे इस बात पर रूठ जाती है तथा वह राव जी की लाख मिन्नौतों के बावजूद भी उनसे बात नहीं करती है । बारात विदा हो कर जोधपुर पहुंची साथ में उमादे और उसकी बांदी सहेली भारीली भी जोधपुर पहुंची लेकिन वहां भी उमादे रूठी रही। राव जी की अन्य रानियों ने सौतिया डाह से उमादे और राव जी को एक न होने दिया । किसी प्रकार चारण ईश्वरदास के प्रयास से पुनः रानी उमादे, राव जी से मिलने को तैयार होती है लेकिन संदेश लेकर भेजी गई बांदी भारीली पर फिर से एक बार राव जी फिसल पड़े जिसे देख कर उमादे फिर रूठ गई । भारीली को जैसलमेर भेज दिया गया लेकिन उमादे रानी रूठी रही । राव जी ने रामसिर परगना रानी उमादे की जागीर में लिख दिया कि जब तक रानी का मिजाज नरम न हो वे वहां रहें और स्वयं युद्ध में व्यस्त हो गये । उस वक्त बंगाल में हुमायूं और शेरशाह में लड़ाई छिड़ी हुई थी तथा राव जी ने हिन्दुन बयान तक फतह हासिल की तथा बाद में बिकानेर भी जीत लिया । राव जी ने उमादे रानी को जोधपुर की जिम्मेदारी दे कर अजमेर से बुलाया लेकिन उनकी अन्य\ रानियों ने सौतिया डाह से ईश्वरदास चारण तथा बाद में आस जी चारण को रिश्वत दे कर उमादे को उसकी आन का हवाला दे कर जोधपुर आने से रोक दिया तथा रानी उमादे कोसाने में अपने लावा लश्कर के साथ रुक गई । सौतिया डाह में राव जी की अन्य रानियों ने राव जी के कान भरे और रूठी रानी को गोंडोज भेज दिया गया । दूसरी ओर दिल्ली में अकबर के तख्तनसीन होने के साथ ही राव जी के हांथ से कई इलाके निकलते चले जाते हैं तथा संवत 1619 में वृद्धावस्था में राव जी का स्वर्गवास हो गया लेकिन ताउम्र राव जी रूठी रानी उमादे को न मना सके । राव जी की पगड़ी के साथ रूठी रानी उमादे तथा कछवाही रानी सती हो गई । कुछ अन्य रानियां, खवासे, रखेलिया जो गिनती में 21 थी राव जी के साथ सती हुई तथा शेष अन्य रानियां बाद में राव जी की अन्य पगडियो के साथ सती हुई ।

उपन्यास एक ओर रूठी रानी के हठ तथा उनके आन बान शान की कथा कहता है तो दूसरी ओर उस युग के राजस्थान के राजपूताने के इतिहास एवं मुगलों से हुये युद्धों पर भी नजर डालता है । इतना ही नहीं वहां की लोक संस्कृति, लोक गीतों तथा चारणों की राजपूताने में अहमियत तथा उनकी महत्वपूर्ण भूमिका पर भी बात करता है । कुल मिलाकर उपन्यास अपने कथानक में रूठी रानी और राव जी के संबंधों तथा रानी के हठ भर की बात नहीं करता बल्कि राजपूताने के विभिन्न पहलुओं तथा काल विशेष की ऐतिहासिकता को भी अपने आप में समाहित करता है । यह विडंबना ही है कि साहित्य में बतौर ऐतिहासिक उपन्यासकार हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्य चतुरसेन, गुरुदत्त, वृन्दावन लाल वर्मा, अमृतलाल नागर आदि की चर्चा की जाती है लेकिन इनके साथ या अलग से बतौर ऐतिहासिक कहानीकार एवं उपन्यासकार प्रेमचंद की पर्याप्त चर्चा नहीं की गई हैं जबकि प्रेमचंद की
ऐतिहासिक कहानियां एवं उपन्यास साहित्य में अपना एक अलग ही स्थान रखते हैं । प्रेमचंद जयंती पर उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि तभी दी जा सकती है जब कि हम विमर्शों के चश्मे से निहारते हुए उनकी कुछ रचनाओं पर ही चर्चा न करते रह जाये बल्कि उनकी समस्त रचनाओं का मूल्यांकन करते हुये नये अचर्चित लेकिन महत्त्वपूर्ण मुद्दों को वर्तमान साहित्य के पटल पर रखे ।

राजेन्द्र सिंह गहलौत

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