चापलूसी : एक कला

यह व्यंग्यात्मक हिंदी लेख आधुनिक समाज में चापलूसी और चाटुकारिता के बढ़ते प्रभाव पर तीखा प्रहार करता है। लेखक ने ‘चमचासन’ की कल्पना के माध्यम से दिखाया है कि किस प्रकार प्रतिभा, योग्यता, परिश्रम और नैतिकता की अपेक्षा खुशामदी को सफलता का साधन बना लिया गया है। विशेष रूप से नौकरशाही में चापलूसी के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए लेख बताता है कि स्वार्थ और शॉर्टकट की प्रवृत्ति व्यक्ति के विवेक, स्वाभिमान तथा आत्मसम्मान को कमजोर कर सकती है। यह रचना पाठकों को ईमानदारी, सिद्धांतों और वास्तविक योग्यता के महत्व पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।

Oct 9, 2026 - 15:48
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चापलूसी : एक कला
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६४ कलाओं में जिस कला की सर्वाधिक आवश्यकता कलिकाल में है, वह कला चापलूसी अथवा चाटुकारिता है। यह कला मनुष्य को क्षण भर में रंक से राजा, धनहीन से धनयुक्त तथा पदहीन से पदयुक्त कब और कैसे बना देती है? कलाकार को इसका पता ही नहीं चलता।
कलाकार की योग्यता व प्रतिभा की इसमें कोई जरूरत नहीं है, बस उसे एक विशेष प्रकार के आसन में सिद्ध होना पड़ता है, जिसे योग की प्रक्रिया में चमचासन कहते हैं। इस आसन में शरीर और मन भले ही स्वस्थ न हो, लेकिन उसका जमीर इतना मजबूत हो जाता है कि वह असंभव लगने वाले कार्य को भी पल भर में संभव कर देता है।
वर्तमान युग में राम व कृष्ण भी यदि पृथ्वी पर अवतरित हो जाएँ, तो शायद उन्हें भी पूर्ण अवतार न माना जाए, क्योंकि पूर्ण अवतार में जिस कला की सर्वाधिक आवश्यकता वर्तमान में है, वह कला ‘चापलूसी’ अथवा ‘जी-हुजूरी’ है। योग दर्शन के प्रणेता महर्षि पतंजलि का अष्टांग योग भी अधूरा-सा प्रतीत होता है, क्योंकि उसमें एक आसन की कमी रह गई है। वह है चमचासन। महर्षि के इस अधूरे कार्य को वर्तमान युग के मनुष्य ने पूर्ण कर अष्टांग योग की प्रक्रिया को पूर्ण कर दिया है और उसने समस्त योग की विधाओं को एक ही आसन में सिद्ध कर दिया है। 


चाटुकारिता मनुष्य के विवेक को कब नष्ट कर देती है, उसे पता ही नहीं चलता और व्यक्ति स्वार्थी होकर अपनी आत्मा तक का सौदा बिना मोल के कर बैठता है। शायद यही मनुष्यता के पतन की निशानी है। आधुनिक युग में सिद्धांत और आदर्श केवल किताब तक सीमित रह गए हैं। उन मूल्यों को जीने वाला व्यक्तित्व हमारे बीच से वैसे ही गायब हो रहा है, जैसे दोपहर के साथ-साथ व्यक्ति की छाया भी छोटी होती चली जाती है।
सफलता के शॉर्टकट ने हमें परिश्रम व मेहनत से विरत कर दिया और हम लक्ष्य की सिद्धि में साधन की पवित्रता को गंवा बैठे, जिससे हमारी नैतिकता संदिग्ध हो गई। संदिग्ध नैतिकता ने ही हमारे स्वाभिमान और आत्मसम्मान को धक्का देकर उसकी जगह चापलूसी और चाटुकारिता को प्रतिस्थापित कर दिया।
चापलूसी ने ही हमारी प्रतिभा और ज्ञान को हाशिये पर धकेल दिया, क्योंकि चाटुकारिता में प्रतिभा और ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं है। इसमें आवश्यकता है - छल, द्वेष और पाखंड की, जिससे दूर रहने का संदेश हमें बचपन से ही दिया जाता रहा है, आज वही हमारे लिए महत्वपूर्ण बन गया है। 

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इस कला में व्यक्ति जितना प्रवीण और सिद्धहस्त होगा, उतना ही विकासशील होगा। कला की यह प्रवीणता अभ्यास से कम, खुशामदी से ज्यादा विकसित होती है। कलाकार के दुर्गुण को भी यह कला बड़ी निपुणता के साथ उसे सद्गुण में बदल देती है।
चापलूसी में सम्मोहन की अद्भुत कला होती है। सम्मोहन का यह तीर कामदेव के तरकश में भी नहीं है। शायद कामदेव में भी उतना सम्मोहन शेष नहीं रह गया है, जितना सम्मोहन चापलूसी अथवा चाटुकारिता में है। २१वीं सदी के मनुष्यों के हाथ यह एक अचूक अस्त्र लग गया है, जिससे वह बिना रक्त की एक बूंद बहाए युद्ध में आसानी से विजय प्राप्त कर रहे हैं।
वर्तमान नौकरशाही में चापलूसी कला भी है और अस्त्र भी। व्यक्ति जिसे कला से सम्मोहित नहीं कर पा रहा है, उस पर अस्त्र से विजय प्राप्त कर रहा है। नौकरशाही, जिसे कभी सत्य, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा का पर्याय माना जाता था, आज वही नौकरशाही चापलूसी, खुशामदी और चाटुकारिता का पर्याय हो चला है। आज योग्यताएँ और प्रतिभाएँ भी खुद को हीन समझने लगी हैं। 

डॉ. उमा महेश्वर पांडेय

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