विवाहिता
यह मार्मिक और कटु सामाजिक कहानी सुमन के जीवन के माध्यम से उस मानसिकता पर सवाल उठाती है, जिसमें स्त्री के सम्मान को उसके सुख, आत्मनिर्भरता और व्यक्तित्व के बजाय उसके वैवाहिक दर्जे से जोड़ दिया जाता है। माता-पिता की मृत्यु के बाद आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने वाली सुमन समाज के तानों से बचने के लिए विवाह स्वीकार करती है, लेकिन उसे शराबी और हिंसक पति के साथ प्रताड़ना भरा जीवन मिलता है। उसकी कमाई और स्वतंत्रता छीन ली जाती है और वह वर्षों तक घरेलू हिंसा सहते-सहते भीतर से टूट जाती है। मृत्यु के बाद वही समाज उसे “भाग्यवान सुहागन” कहकर सम्मान देता है। कहानी नारी सम्मान, घरेलू हिंसा और समाज की दोहरी मानसिकता पर तीखा प्रश्न उठाती है।
इंसान बड़ा विचित्र प्राणी है। समाज की स्वीकृति पाने के लिए वह कभी मशीन बन जाता है, कभी कठपुतली और कभी ईश्वर बनने का अभिनय करने लगता है। लेकिन एक प्रश्न हमेशा अनुत्तरित रह जाता है-वह इंसान बने रहना क्यों नहीं चाहता? शायद इसलिए कि इंसान बने रहने के लिए सबसे अधिक साहस चाहिए। और इस बनने-बनाने की दौड़ में सबसे आगे स्त्रियाँ ही खड़ी मिलती हैं।
सुमन एक साधारण-सी लड़की थी। न बहुत सुंदर, न कुरूप; न बहुत लंबी, न बहुत छोटी। उसका चेहरा भी वैसा ही था-उन अनगिनत चेहरों में से एक, जिन्हें समाज कभी याद नहीं रखता, लेकिन सबसे पहले परखता अवश्य है।
माता-पिता की सड़क दुर्घटना में मृत्यु के बाद उसका इकलौता बड़ा भाई और भाभी ही उसका परिवार रह गए। सुमन ने कभी शिकायत नहीं की। वह अँधेरा रहते उठती, घर का सारा काम निपटाती और फिर पास के सिलाई केंद्र में बच्चों और महिलाओं को सिलाई सिखाने चली जाती। महीने के अंत में मिलने वाले रुपये उसके लिए केवल कमाई नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का प्रमाण थे।
सिलाई मशीन की घरघराहट के बीच उसे विश्वास रहता था कि जीवन अभी पूरी तरह उससे रूठा नहीं है। महिलाओं को नए टाँके सिखाते समय उसके चेहरे पर उभरने वाली मुस्कान उसकी सारी थकान चुरा लेती थी। लेकिन समाज को उसके हुनर से कोई सरोकार नहीं था। बत्तीस वर्ष की होते-होते हर मिलने वाले रिश्तेदारों और पड़ोसियों के पास बस एक ही प्रश्न होता था-ठअभी तक शादी क्यों नहीं हुई?ठ
किसी ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह कैसी है, क्या चाहती है या किन संघर्षों से गुजर रही है। धीरे-धीरे उसे खुद भी यह लगने लगा था कि वह एक बोझ के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।
एक दिन उसका भाई एक रिश्ता लेकर आया। लड़के का नाम दीपक था। वह फर्नीचर की दुकान पर काम करता था। सबने कहा, ठघर ठीक है, लड़का चार-पैसे कमाता है। इससे अच्छा रिश्ता नहीं मिलेगा।ठ
सुमन ने आईने में खुद को देखा। उसे लगा, शायद विवाह के बाद ताने बंद हो जाएँगे। शायद उसे भी वह सम्मान मिलेगा, जो विवाहोपरांत एक लड़की को इस कलंकित समाज द्वारा दिया जाता है। उसने कोई प्रश्न नहीं किया। लड़के को देखने की इच्छा तक व्यक्त नहीं की। बस चुपचाप 'हाँ' कह दी।
कुछ ही दिनों बाद उसका विवाह हो गया। विदाई के समय उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन उन आँसुओं में दुख से अधिक उम्मीद थी। उसे विश्वास था कि अब उसका जीवन बदल जाएगा।
जीवन बदला भी... पर वैसा नहीं, जैसा उसने सोचा था।
शादी के कुछ ही दिनों बाद उसे पता चला कि दीपक शराब का आदी है। रात को वह नशे में घर लौटता और पूरा घर गालियों से भर जाता। कभी बर्तन टूटते, कभी सन्नाटा। फिर एक दिन पहली बार उसने सुमन पर हाथ उठाया। उस एक थप्पड़ ने उसकी सारी उम्मीदों को चकनाचूर कर तितर-बितर जमीन पर बिखेर दिया।
दीपक न ढंग से अपना काम करता था, न घर की ज़िम्मेदारी निभाता था, लेकिन अहंकार उसमें कूट-कूटकर भरा था। कुछ ही दिनों बाद उसने सुमन का सिलाई केंद्र जाना भी बंद करवा दिया। उसने एक दिन सुमन से कह डाला,
ठमेरे घर की औरत बाहर काम नहीं करेगी।ठ
सुमन ने धीमे स्वर में कहा, ठमेरी कमाई से घर का खर्च भी तो चलता है।ठ
उत्तर में शब्द नहीं, केवल अपमान, गालियाँ और हिंसा थी।
विडंबना यह थी कि जो आदमी उसे काम करने से रोक रहा था, वही अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा शराब में उड़ा देता था।
लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि समय किसी के लिए नहीं रुकता। देखते-ही-देखते सुमन दो बच्चों की माँ बन गई-एक बेटा और एक बेटी। ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं, पर उसके हिस्से का सुख नहीं आया। उसकी सुबह बच्चों की भूख से शुरू होती, दोपहर रसोई के धुएँ में बीतती और रात दीपक की शराब, गालियों और मारपीट के बीच समाप्त होती।
कई बार बच्चे अपनी माँ को पिटते हुए देखते और सहमकर एक-दूसरे से लिपट जाते। सुमन अपने आँसू तुरंत पोंछ लेती, ताकि उन्हें यह भ्रम बना रहे कि उनकी माँ मज़बूत है। वह जानती थी कि उसके टूटने से केवल वह नहीं, बच्चों का बचपन भी बिखर जाएगा। ऐसा नहीं था कि उसने उस जीवन से बाहर निकलने की कोशिश नहीं की। उसने कई बार प्रयास किया, लेकिन हर बार परिस्थितियाँ उसे उसी चौखट पर लौटाकर खड़ा कर देतीं।
धीरे-धीरे उसने शिकायत करना छोड़ दिया-अपने पति से भी और ईश्वर से भी। अब वह जी नहीं रही थी, केवल दिन काट रही थी। पड़ोस की औरतें उसके चेहरे का पीलापन देखकर पूछतीं, ठतबीयत ठीक नहीं रहती क्या?ठ वह मुस्कुराकर कहती, ठबस, थोड़ी कमजोरी है।ठ वह जानती थी कि लोगों को सच नहीं, केवल एक औपचारिक उत्तर चाहिए।
एक दिन उसने आईने में खुद को देखा। उसे लगा, सामने खड़ी स्त्री कोई और ही थी शायद। चेहरे पर समय से पहले झुर्रियाँ उतर आई थीं। आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे। उसे अपना सिलाई केंद्र याद आया-मशीनों की घरघराहट, बच्चों की हँसी और अपनी मेहनत की कमाई। उसके भीतर खुद को देखकर एक ही प्रश्न उसके कानों में गूंज रहा था-ठये कौन आकर मेरे सामने खड़ा है? मैं तो बिल्कुल भी नहीं हूँ, ये तो समाज का सम्मान पाने वाली 'विवाहिता' सुमन है, फिर मैं कहाँ हूँ या अब हूँ भी या नहीं।ठ
साल बीतते गए। सुमन भीतर ही भीतर बिखर चुकी थी।
फिर एक सुबह पूरे मोहल्ले में खबर फैल गई-सुमन नहीं रही।
किसी ने कहा, ठलंबे समय से बीमार थी।ठ किसी ने कहा, ठशरीर ने जवाब दे दिया।ठ लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि वर्षों से रोज़-रोज़ मरती हुई एक स्त्री आखिर कितने दिन और जी सकती थी।
घर के एक कोने में दोनों बच्चे बिलख रहे थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि माँ क्यों नहीं उठ रही। दीपक चुपचाप बैठा था। उसके चेहरे पर न पश्चाताप था, न बेचैनी; मानो कुछ बदला ही न हो।
धीरे-धीरे पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो गया। औरतों ने सुमन को अंतिम बार सजाया। दीपक से माँग में सिंदूर भरवाया गया, किसी ने हाथों में नई चूड़ियाँ पहनाईं, किसी ने उसकी बिंदी ठीक कर दी।
फिर आवाज़ें आने लगीं-
ठबेचारी बड़ी भाग्यवान थीष्ठ सुहागन गई है।ठ
ठईश्वर ऐसी मृत्यु सबको दे।ठ
सुमन पहली बार सम्मान के साथ विदा की जा रही थी।
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जीते-जी किसी ने उसके चेहरे का पीलापन नहीं देखा। किसी ने उसके शरीर पर पड़े घावों के बारे में नहीं पूछा। किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह खुश भी थी या नहीं। लेकिन आज सब उसकी माँग के सिंदूर का गुणगान कर रहे थे।
उसे वह सम्मान अंततः मिल ही गया, जिसकी तलाश में उसने विवाह स्वीकार किया था।
कितनी विचित्र बात है-जब वह अविवाहित थी, तब समाज को उसके विवाह की चिंता थी। जब वह विवाहिता बनी, तब किसी को उसके जीवन की चिंता नहीं रही। उसकी हँसी, उसके सपने और उसका आत्मसम्मान धीरे-धीरे मरते रहे, और समाज मौन बना रहा।
शायद यही हमारे समाज का सबसे बड़ा व्यंग्य है-यहाँ एक स्त्री का सम्मान उसके जीवित होने से नहीं, उसके विवाहिता होने से तय किया जाता है।
नेहा 'प्रेम पृथी'
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