संजा- प्रेम, एकता और सामंजस्य का सृजन करती
संजा पर्व मालवा-निमाड़ सहित भारत के विभिन्न क्षेत्रों की समृद्ध लोककला और लोकपरंपरा का प्रतीक है। श्राद्ध पक्ष के सोलह दिनों में कुँवारी कन्याएँ गोबर, फूल-पत्तियों और रंगीन कागज से दीवारों पर संजा की कलाकृतियाँ बनाती हैं तथा पारंपरिक लोकगीत गाकर पूजा-अर्चना करती हैं। यह पर्व लड़कियों में कला, रचनात्मकता, प्रेम, एकता और सामंजस्य की भावना विकसित करता है। संजा की विदाई बेटी की विदाई जैसी भावुक होती है और इसकी यादें जीवनभर बनी रहती हैं। आधुनिक जीवनशैली, शहरीकरण, तकनीक और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के कारण यह परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त होने के कगार पर है। संजा पर्व न केवल लोकगीतों और लोककलाओं को संरक्षित करता है, बल्कि मनुष्य को प्रकृति और पर्यावरण से भी जोड़ता है। इसलिए इस अनमोल सांस्कृतिक विरासत को सहेजना और नई पीढ़ी तक पहुँचाना आवश्यक है।
लोककलाओं की संस्थाओं में बड़ी संख्या में लड़कियाँ एकत्रित होकर संजा बनाती हैं। छत्तीसगढ़, बुंदेलखंड क्षेत्र में लड़कियाँ झाड़ की पत्तियों को, विशेषकर नींबू को ओढ़नी उड़ाकर फूलों से सहेजने की प्रक्रिया को वे मामुलिया बोलती हैं, पर्व मनाती हैं। लोकगीतों और कलाकृतियों को बचाने में कई स्थानों पर संजा उत्सव संस्थाएँ पुनीत और प्रेरणादायी कार्य कर रही हैं, जो कि प्रशंसनीय है।
तिथिवार कलाकृतियों के नाम क्रमशः पूनम का पाटला, एकम की छाबड़ी, बीज का बिजोरा, तीज का तीजों, चौथ का चोपड़, पंचम का पाँच कटोरा, छठ का छह पंखुड़ी का फूल, सातम का स्वस्तिक-सातिया, अष्टमी को आठ पंखुड़ी का फूल, नवमी का डोकरा-डोकरी, दशमी का दीपक या निसरनी, ग्यारस का केल, बारस का पंखा, तेरस का घोड़ा, चौदस का कला कोट, पूनम का कला कोट, अमावस का कला कोट। श्राद्ध के १६ दिनों कुँवारी कन्याओं द्वारा गोबर, फूल-पत्तियों आदि से संजा को संजोया जाता है।
मधुर लोकगीतों की स्वरलहरियाँ घर-घर में गुंजायमान होती हैं। वर्तमान में संजा का रूप फूल-पत्तियों से कागज में तब्दील होता जा रहा है। संजा का पर्व आते ही लड़कियाँ प्रसन्न हो जाती हैं। संजा को कैसे मनाना है, ये बातें छोटी लड़कियों को बड़ी लड़कियाँ बताती हैं। शहरों में सीमेंट की इमारतें और दीवारों पर महँगे पेंट पुते होने, गोबर का अभाव, लड़कियों का ज्यादा संख्या में एक जगह न हो पाने की वजह, टीवी, इंटरनेट का प्रभाव और पढ़ाई की वजह बताने से शहरों में संजा मनाने का चलन खत्म-सा हो गया है। लेकिन गाँवों/देहातों में पेड़ों की पत्तियाँ, तरह-तरह के फूल, रंगीन कागज, गोबर आदि की सहज उपलब्धता से ये पर्व मनाना शहर की तुलना में आसान है। परंपरा को आगे बढ़ाने की सोच में बेटियों की कमी से भी इस पर्व पर प्रभाव पड़ा है।
ठसंजा-सोलही गीतठ को देखें तो-ठकाजल टिकी लेव भाई, काजल टिकी लेव / काजल टिकी लई न म्हारी संजा बाई के देवठ, ठसंजा तू थारा घरे जा / थारी माँ मारेगा के कूटेगाठ, ठनानी-सी गाड़ी लुढ़कती जाएठ, ठसंजा बाई का सासरे जावंगा-जावंगाठ, ठसंजा जीम लेठ-मालवी मिठास लिए और लोक परंपराओं को समेटे लोक संस्कृति को विलुप्त होने से तो बचाती है, साथ ही लोक कला के मायनों के दर्शन भी कराती है।
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संजा की बिदाई मानो ऐसा माहौल बनाती है, जैसे बेटी की बिदाई हो रही हो। सबकी आँखों में आँसुओं की धारा फूट पड़ती है। ये माहौल बेटियों को एक लगाव और अपनेपन का अहसास कराता है। बस, ये बचपन की यादें सखियों के बड़े हो जाने और विवाह उपरांत बहुत याद आती हैं। गीत संकलन में कहीं-कहीं अंग्रेजी एवं फ़िल्मी गीतों की तर्ज की झलक भी गीतों में समाहित होने से एक नयापन झलकता है। रिश्तों के ताने-बाने बुनती व हास्य रस को समेटे लोकगीत वाकई अपनी श्रेष्ठता को दर्शाते हैं। श्रृंगार रस से भरे लोकगीत जिस भावना और आत्मीयता से बेटियाँ गाती हैं, उससे लोकगीतों की गरिमा बनी रहती और ये विलुप्त होने से भी बचे हुए हैं। मालवा-निमाड़, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, ब्रज के क्षेत्रों की लोक परंपरा में इनको भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है। श्राद्ध पक्ष के दिनों में कुँवारी लड़कियाँ माँ पार्वती से मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए पूजन-अर्चन करती हैं। विशेषकर गाँवों में संजा ज्यादा मनाई जाती है। संजा पर्व एक पाठशाला है। संजा से कला का ज्ञान प्राप्त होता है, पशु-पक्षियों की आकृति बनाना और उसे दीवारों पर चिपकाना। गोबर से संजा माता को सजाना और किला कोट, जो संजा के अंतिम दिन में बनाया जाता है, उसमें पत्तियों, फूलों और रंगीन कागज से सजाने पर संजा बहुत सुंदर लगती है। लड़कियाँ संजा के लोकगीत को गाकर संजा की आरती कर प्रसाद बाँटती हैं। श्रृंगार रस से भरे लोकगीत जिस भावना और आत्मीयता से गाती हैं, उससे लोकगीतों की गरिमा बनी रहती और ये विलुप्त होने से भी बचे हुए हैं। मालवा-निमाड़ की लोक परंपरा श्राद्ध पक्ष के दिनों में कुँवारी लड़कियाँ माँ पार्वती से मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए पूजन-अर्चन करती हैं। विशेषकर गाँवों में संजा ज्यादा मनाई जाती है। संजा मनाने की यादें लड़कियों के विवाहोपरांत गाँव/देहातों की यादों में हमेशा के लिए तरोताजा बनी रहती हैं और यही यादें उनके व्यवहार में प्रेम, एकता और सामंजस्य का सृजन करती हैं।
संजा के गीतों की खासियत ये भी है कि जब लड़कियाँ आरती समाप्त करती हैं, तो जो प्रसाद वितरित किया जाता है, उसके पहले वो उस प्रसाद को ढाँक के रखकर प्रसाद का नाम भी पूछती हैं। किंतु प्रसाद का नाम नहीं बता पाता। जब कोई बता देता या नहीं भी बता सकती, तब अंत में प्रसाद वितरित किया जाता। गीत मन को छू जाते हैं। लड़कियाँ एक सहेली के घर गीत गाने के बाद अन्य सहेलियों के यहाँ मनुहार के बाद जाती हैं। इस तरह संजा के लोकगीत बचाने में पर्व का महत्व बरकरार है।
संजा विसर्जन के समय जिन गाँवों में नदी बहती है, उसके किनारों पर तगारी, टोपले में संभालकर रखी गई संजा को नदी में विसर्जन किया जाता है। ये पर्यावरण की हितैषी है। इसको जल में प्रवाहित करने पर नदी प्रदूषित नहीं होती। लड़कियों का इतने दिनों तक संजा के संग रहने और अब अगले वर्ष संजा का आना आँखों में आँसू ला देता है। खाली तगारियों, टोपलों को वे नदी के किनारे एक के ऊपर एक रखकर उस पर से कूदती हैं। शायद ये वियोग को भुलाकर इस तरह खुशियाँ समाहित करती हैं। संजा पर्व की यादें विवाह उपरांत ताउम्र याद रहती हैं। संजा के गीत मुखाग्र एक-दूसरे से सीखने जाती हैं। शाम होने पर इनके मधुर गीत कानों में मिश्री घोलते हैं। संजा पर्व पर ही गाए जाने वाले गीतों को सुनने के लिए लोग घरों से बाहर आ जाते और चलते हुए राहगीरों के पग रुक-से जाते।
संजा सीधे-सीधे हमें पर्यावरण से, अपने परिवेश से जोड़ती है, तो क्यों न हम इस कला को बढ़ावा दें और विलुप्त होने से बचाने के प्रयास किए जाएँ। संजा मनाने की यादें लड़कियों के विवाहोपरांत गाँव/देहातों की यादों में हमेशा के लिए तरोताजा बनी रहती हैं और यही यादें उनके व्यवहार में प्रेम, एकता और सामंजस्य का सृजन करती हैं। संजा सीधे-सीधे हमें पर्यावरण से, अपने परिवेश से जोड़ती है, तो क्यों न हम इस कला को बढ़ावा दें और विलुप्त होने से बचाने के प्रयास किए जाएँ। वैसे उज्जैन में संजा उत्सव पर संजा पुरस्कार से सम्मानित भी किया जाने लगा है। साथ ही महाकालेश्वर में उमा साझी महोत्सव भी प्रति वर्ष मनाया जाता है। कुल मिलाकर संजा देती है कला ज्ञान एवं मनोवांछित फल प्रदान करती है।
संजय वर्मा 'दृष्टि
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