जल और हमारा पर्यावरण

पर्यावरण का सरंक्षण व परिवर्द्धन का संदेश भारतीय जीवन दर्शन के आधार-चिंतन में निहित है। यहाँ अनादिकाल से दिन का प्रारंभ सूर्य को अर्ध्य व तुलसी को जल देकर करने की परम्परा यों ही नहीं है। पूजन-पद्धति में पीपल को जल और वट से लेकर नीम, आँवला और केला तक जैसे पेड़-पौधों की महत्ता का प्राचीन काल से स्थापित होना भी न तो अचानक है

Mar 29, 2024 - 16:11
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जल और हमारा पर्यावरण
environment

प्रकृति का यह आवरण है, जिसमें हम घिरे हुए हैं, पर्यावरण कहलाता है। आज वही पर्यावरण प्रदूषण की चरम सीमा पर पहुँच चुका है जिसके कारण वर्तमान सरकार ने भी प्रदूषित कारकों के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए, इस पर प्रभावी ढंग से काम करने व जनमानस को साथ लेकर चलने की मंशा जाहिर की है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि हमारा भारत देश उन्नति की ओर बढ़ रहा है। आज हम किसी भी देश से कमतर नहीं हैं। लेकिन क्या यह सही है कि हम अन्य विकसित देशों के विकास की दौड़ में तो दौड़ते रहें परंतु अपनी धरोहर को नष्ट होते भी देखते रहें। पंच तत्व जिनसे हमारा जीवन चलता है, जिसमें जल ही जीवन है क्या उस जीवन में भी प्रदूषण नाम का विष घुलता जा रहा है? जल इंसान की अमूलभूत आवश्यकताओं में से एक है। बिना जल के जीवन की कल्पना करना भी व्यर्थ है। आज के परिवेश में जल भी प्रदूषण की चरम सीमा पर है। जलवायु के नाम से पर्यावरण को जाना जाता है। लेकिन अब न तो जल प्रदूषण मुक्त है, न ही वायु। यह विषय सिर्फ़ सरकार का ही नहीं बल्कि प्रत्येक जनमानस के चिंता का विषय होना चाहिए क्योंकि प्रकृति ही हमारी चिर जीवन संगिन है और रहेगी।

पर्यावरण का सरंक्षण व परिवर्द्धन का संदेश भारतीय जीवन दर्शन के आधार-चिंतन में निहित है। यहाँ अनादिकाल से दिन का प्रारंभ सूर्य को अर्ध्य व तुलसी को जल देकर करने की परम्परा यों ही नहीं है। पूजन-पद्धति में पीपल को जल और वट से लेकर नीम, आँवला और केला तक जैसे पेड़-पौधों की महत्ता का प्राचीन काल से स्थापित होना भी न तो अचानक है, न निरूद्देश्य। दिन-रात ऑक्सीजन उत्सर्जित करने वाले पीपल के वृ़क्ष को सर्वथा बचाकर रखा जाए, इसलिए उसमें देवताओं के वास की बात कही गई। उसी प्रकार की मान्यता जिस तुलसी के पौधो के विषय में प्रचलित है, उनकी औषधीय उपयोगिता सभी के समक्ष है। प्रकृति और पुरूष के संयोग से सृष्टि का उत्पन्न होना और प्रकृति में देवत्व के दर्शन करने का हमारा दर्शन इसी बात की ओर इंगित करता है कि जिनसे हमारा जीवन संभव, उन पेड़, पौधों, नदियों, पर्वतों यानि पूरे पर्यावरण में ही देवत्व है। इनके पूजन को यथोचित सम्मान दें। विश्व के किसी अन्य दर्शन मत में समग्र प्रकृति या अखंड पर्यावरण के प्रति ऐसा समवेत, प्रगाढ़ और चिंतन या जन-भागीदारी सुनिश्चित करने वाला प्रयास नहीं मिलता। बाज़ारवादी दौर में आज यह अनुभूत करना भी रोमांच से भर देता है कि हमारे पूर्वजों ने शताब्दियों पूर्व ही कैसे प्रकृति व पर्यावरण से जुड़े चुनौती ख़तरों को भाँप लिया था और कितने सटीक रूप में इनकी संरक्षण के कार्य में प्रत्येक व्यक्ति की भागीदारी सुनिश्चित करने वाली जीवन-प्रणाली का विकास कर डाला।

‘रामायण’ की कथा में भगवान श्रीराम का चौदह वर्षों तक का वनवास काल इस कथानक का वह प्रमुख भाग है, जिसमें सभी निर्णायक घटनाएँ हुई हैं। राक्षसों का विनाश या वध ही नहीं, जगत जननी सीता के हरण से लेकर भगवान के
मर्मस्पर्शी विलाप, अतुलनीय भक्त पवनसुत हनुमान से प्रथम मिलन और वानरी सेना के गठन तक। ज्योतिष शास्त्र में रत्नों के प्रभावशाली विकल्प के रूप में वनस्पतियों को रखा गया है। इस मान्यता के रूप में प्रकटतः पौधों को रत्नों के समतुल्य बताया गया है, जो वस्तुतः यही भावबोध जगाता है कि वनस्पतियों का क्या स्थान है? धर्म से जोड़कर विकसित की गई ऐसी धारणाएँ प्रकृति की सुरक्षा या उसके संरक्षण के लिए बनाई गई हैं। यह सारा उपक्रम इसलिए भी किया गया, ताकि प्रकृति के साथ मनुष्य का आत्मिक लगाव और इस रूप में उनका संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।

अब प्रश्न यह उठता कि पर्यावरण के संरक्षण में रत इस संस्कृति का संवाहक होते हुए भी हम पर्यावरण के प्रति कितने सचेत हैं? क्या हम अपने आध्यात्मिक नीति-निर्माताओं की उदत्त भावनाओं को सिर्फ़ पूजा या कर्मकांड तक सीमित समझते हैं? हम नदियों को दूषित कर रहे हैं, वनों को काटकर वहाँ कंक्रीट के जंगल खड़े कर रहे और अपनी प्राकृतिक संपदा का दोहन कर रहे हैं। हमें सोचना होगा कि प्रकृति ने हमें जितना दिया, हम उसका ऋण नहीं चुका सकते, लेकिन उसका रख-रखाव तो रख सकते हैं। यही हमारी आध्यात्मिकता और यही हमारी पूजा की भावना होनी चाहिए। क्योंकि मानव एक बुद्धिजीवी प्राणी है इसलिए उसका कर्तव्य बनता है, कि वो स्वयं के, समाज के व राष्ट्र के हित के लिए वही करे।

रश्मि अग्रवाल

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