संतान की सुख समृद्धि का व्रत है अहोई अष्टमी

  यह व्रत अधिकतर भारतवर्ष के उत्तर क्षेत्र में मनाया जाता है। अहोई को दूध और चावल का भोग लगाने के बाद एक लोटे में पानी भरकर अहोई अष्टमी की कथा सुनी जाती है। कुछ कथाएं बहुत प्रचलित है इस व्रत को मनाए जाने के पीछे।एक कथा के अनुसार एक नगर में एक साहूकार रहता था जिसके साथ लड़के थे। एक दिन उसकी पत्नी खदान में मिट्टी खोदने के लिए गई थी और जैसी ही उसने वहां जाकर कुदाली को मिट्टी  खोदने के लिए मेरी वैसे ही  कुदाली वहां रह रही सेही के बच्चे के सिर पर कुदाली लगने से वह मर गया।

Mar 19, 2025 - 19:01
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संतान की सुख समृद्धि का व्रत है अहोई अष्टमी
Ahoi Ashtami is a fast for the happiness and prosperity of children
कार्तिक मास की अष्टमी तिथि को और करवा चौथ से ठीक चार दिन बाद अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाता है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि में यह व्रत रखा जाता है इसलिए इसको अहोई अष्टमी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन माताएं अपनी संतानों की सुख समृद्धि के के लिए यह व्रत रखतीं है। इस दिन माताएं अपनी संतानों के लिए दिन भर उपवास करतीं है और शाम के समय आसमान में पहला तारा दिखते ही उसको अर्ध्य देकर पूजा करती हैं। घर में दीवार पर अहोई अष्टमी का चित्र  बनाकर ये पूजा पूरी की जाती है। प्राचीन समय में औरतें गेरू से दीवार पर आठ कोष्ठकों की एक पुतली की तरह आकृति बनाती थीं और उसकी पूजा करती थी। समयनुसार अब ऐसी आकृति वाली तस्वीर दुकानों में आमतौर पर आसानी से मिल जाती है। इस तस्वीर को दीवार पर लटकाकर माताएं अपनी संतानों को सुख समृद्धि और स्वास्थ्य के लिए पूजा करती है।
  यह व्रत अधिकतर भारतवर्ष के उत्तर क्षेत्र में मनाया जाता है। अहोई को दूध और चावल का भोग लगाने के बाद एक लोटे में पानी भरकर अहोई अष्टमी की कथा सुनी जाती है। कुछ कथाएं बहुत प्रचलित है इस व्रत को मनाए जाने के पीछे।एक कथा के अनुसार एक नगर में एक साहूकार रहता था जिसके साथ लड़के थे। एक दिन उसकी पत्नी खदान में मिट्टी खोदने के लिए गई थी और जैसी ही उसने वहां जाकर कुदाली को मिट्टी  खोदने के लिए मेरी वैसे ही  कुदाली वहां रह रही सेही के बच्चे के सिर पर कुदाली लगने से वह मर गया।
  इस घटना से साहुकार की पत्नी को बहुत आघात हुआ। वह अंतर्मन से बहुत ही दुखी थी परंतु वह विवश भी थी क्योंकि यह काम उसने जानबूझकर नहीं किया था यह तो सब अनजाने में हो गया था।वो बिना मिट्टी लिए ही घर वापिस आ गई। उधर  सेही जब अपनी घुरकाल में आई तो अपने बच्चे को मरा हुआ देखकर बहुत दुखी हुई और उसने भगवान से प्रार्थना की कि जिसने भी उसके बच्चे को मारा है उसको भी ऐसा ही कष्ट हो। उस सेही के श्राप से एक साल के अंदर उस साहूकार के सातों बच्चे खत्म हो गए।इसपर वो साहूकार अपनी अपनी संग तीर्थ जाकर  अपने प्राण न्यौछावर करने को तयार हो गए। उनको मूर्छित देखकर  भगवान करुणा सागर  ने भविष्यवाणी की कि तुमसे चूंकि अनजाने में ये हत्या हुई है इसलिए अगर घर जाकर तुम गऊ माता  और अहोई माता की दिल लगाकर सेवा करोगी तो युमको पुनः संतान सुख प्राप्त होगा। उन्होंने ऐसा ही किया और उनको संतान सुख प्राप्त हुआ। वहां से यह व्रत प्रचलन में आया। एक दूसरी प्रचलित कथानुसार साहूकार के साथ बेटे और सात बहुएं तथा एक बेटी थी।
 दीपावली से पहले कार्तिक मास की अष्टमी तिथि को सातों बहुएं अपनी इकलौती ननद के साथ जंगल में मिट्टी खोदने के लिए खदान में गई। वहीं स्याहू की मांद थी। मिट्टी खोदते समय नंद के हाथ से सेही का बच्चा मर गया।तब स्याहू माता बोली कि मैं तुम्हारी कोख बांधूंगी। तब ननद अपनी सातो भाभियों से बोली कि तुम मेरे बदले कोई अपनी कोख बांध लो। सब भाभियों ने अपनी कोख बंधवाने से इनकार कर दिया । परंतु छोटी भाभी सोचने लगी कि यदि मैं कोख नहीं बंधवाऊंगी तो सासु जी बहुत नाराज होगी। ऐसा विचार करके ननंद के बदले में छोटी भाभी ने अपनी कोख बंधवा ली ।इसके बाद जब उससे जो लड़का होता तो 7 दिन बाद मर जाता। एक दिन उसने पंडित को बुलाकर पूछा कि मेरी संतान सातवें दिन ही आखिरकार क्यों मरती है? तब पंडित जी ने कहा कि तुम सुरही गाय की पूजा करो। सुरही गाय श्याम माता की भायली है। वह तेरी कोख को  छोड़े तब तेरा बच्चा जियेगा। इसके बाद से बहू प्रातः काल उठकर चुपचाप से सुरही गाय के नीचे साफ सफाई करती थी।  एक दिन गौ माता बोली कि आजकल कौन मेरी सेवा कर रहा है? सो आज मैं देखूंगी! गौ माता खूब तड़के उठी क्या देखती है कि एक साहूकार के बेटे की बहू उसके नीचे साफ सफाई कर रही है ।तो गौ माता उसे बोली क्या मांगती है तू ! तब साहूकार की बहु बोली कि स्याहू माता तुम्हारी भायली  है और उसने मेरी कोख बंद रखी है। इसलिए मेरी कोख खुलवा दो। 
  गौ माता  समुद्र पर अपनी भायली के पास उसको लेकर चली। रास्ते में कड़ी धूप थी इसलिए वह दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गई। थोड़ी देर में एक सांप आया और उसी पेड़ पर गरुड़ पंखनी का बच्चा था, उसको डसने लगा तब साहूकार की बहू ने सांप को मार कर डाल के नीचे दबा दिया और बच्चों को बचा लिया ।थोड़ी देर में गरुड़ पंखनी आई। आसपास खून पड़ा देखकर  वो साहूकार की बहू को चोंच करने लगी। तब साहूकार की बहु ने  बोला कि मैं तेरे बच्चे को नहीं मारा! बल्कि सांप तेरे बच्चे को डसने को आया था लेकिन मैंने उसकी रक्षा की।ये  सुनकर गरुड़पंखनी बोली की मांग तू क्या मांगती है! तब वह बोली सात समुद्र पार सयाहू माता रहती है, हमें तू उसके पास पहुंचा दे ।तब गरुड़ पंखनी ने दोनों को अपनी पीठ पर बिठाकर सयाहु माता के पास पहुंचा दिया। उसे देखकर  वो बोली कि ए बहन बहुत दिनों बाद आई है! फिर कहने लगी कि बहन मेरे सिर में जुएं पड़ गई हैं तब सुरही के कहने पर साहूकार की बहू ने सिलाई से उनकी जुएं निकाल दी। इस पर से माता प्रसन्न होकर बोली कि तूने मेरे सिर में बहुत सिलाई गेरी है। जा तेरे सात बेटे और बहू होंगे।
   वह बोली मेरे तो एक भी बेटा नहीं। सात बेटे कहां से होंगे? स्याहू माता बोली वचन दिया है, वचन से फिरूं तो धोबी के कुंड पर जा कर मरू। तब साहूकार की बहू बोली कि मेरी कोख तो तुम्हारे पास बंद पड़ी है। ये सुनकर स्याहूय माता बोली कि तूने मुझे बहुत ठग लिया। मैं तेरी कोख को  खोलती तो नहीं परंतु अब खोलनी पड़ेगी। जा तेरे घर तुझे सात बेटे और सात बहुएं मिलेगी ।  वह लौटकर घर आई तो वहां देखा कि सात बेटे और सात बहू  बैठे हैं। वह बहुत खुश हुई। उसने सात अहोई बनाकर सात उजमन किए और साथ ही कढ़ाई की । रात के समय जेठाणिया आपस में कहने लगी कि जल्दी-जल्दी धूप पूजा कर लो, कहीं छोटी बच्चों को याद करके रोने न लगे । थोड़ी देर बाद उन्होंने अपने बच्चों से कहा अपनी चाची के घर जाकर देखो कि आज वह अभी तक रोई क्यों नहीं? बच्चे ने जाकर कहा कि चाचा जी तो कुछ मांड रही हैं! खून उजमन हो रहा है। यह सुनते ही जेठाणिया दौड़ी दौड़ी घर आई और जाकर कहने लगी कि तूने कोख कैसे छुड़ाई? वह बोली तुमने तो कोक बधाई नहीं थी तो मैने बंधवा ली थी । अब से माता ने कृपा करके मेरी कोख खोल दी है। स्याहु माता ने जिस प्रकार साहूकार की बेटी की को खोली इस प्रकार हमारी भी कोख खोले। कहने वाले तथा सुनने वाले हैं कि सब परिवार की कोख खोलियो।  इस प्रकार यहां से भी ये अहोई अष्टमी के व्रत की कथा शुरू होती है। इस व्रत को करने से परिवार  हरा भरा रहता है। माएं अपने बच्चों की सुख समृद्धि के लिए अवश्य ही इस व्रत को करती हैं।
लेखक एवम स्वतंत्र साहित्यकार
डॉक्टर जय महलवाल (अनजान)
बिलासपुर हिमाचल प्रदेश

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