ब्रजक्षेत्र में फाल्गुन माह और होली का उल्लास

ईश्वर द्वारा होली का त्यौहार मनाने के लिए वसंत ऋतु को चुना गया, जब प्रकृति पूर्ण यौवन पर होती है, मन में उल्लास होता है, फसलें पक रही होती हैं। भारत में होली सबसे सरस, रंगीला त्यौहार है, प्रकृति के अस्तित्व के आनंद का उत्सव वर्णन से परे है। होली को मन से मनाया जाए तो कुछ ऐसी ही अवस्था होती है। प्रकृति की ही भांति स्त्रियों की भी होली में पूर्ण भागीदारी रहती है।

Apr 16, 2024 - 14:32
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ब्रजक्षेत्र में फाल्गुन माह और होली का उल्लास
Phalgun

होली हिंदुओं का प्रमुख त्यौहार है। रामायण से लेकर महाभारत, पुराणों में भी इसका उल्लेख मिलता है। भारतीय संस्कृति का अनूठा संगम त्यौहारों और पर्वों में खूब दिखाई देता है। इन पर्वों में जातपांत कुछ नहीं होती, राजा और रंक सभी एक होकर इन त्यौहारों को मनाते हैं। सभीजन सारी कटुता को भूल सौहार्दपूर्ण तरीके से इसे मनाते हैं। इसलिए होली को एकता, समन्वय और सद्भावना का राष्ट्रीय त्यौहार कहा जाता है। बसंत का आगमन और होली के त्यौहार से मानो धरा भी प्राणवान हो जाती है, प्रकृति खिल उठती है। और ऐसे में गांवो में बसा हमारा भारत, और इस संस्कृति में रचे बसे लोग, अपने होली के लोक गीत, रसिया, भजन, छंद गाकर वातावरण को और लुभावना बना देते हैं। कवियों का भावुक मन ना जाने कितने रंग बिखेर देता है। यहां के लोग धरती/ प्रकृति के गीत गाते हैं और उन्हीं में हमारे पर्व और त्यौहारों की झांकी होती है। ईश्वर द्वारा होली का त्यौहार मनाने के लिए वसंत ऋतु को चुना गया, जब प्रकृति पूर्ण यौवन पर होती है, मन में उल्लास होता है, फसलें पक रही होती हैं। भारत में होली सबसे सरस, रंगीला त्यौहार है, प्रकृति के अस्तित्व के आनंद का उत्सव वर्णन से परे है। होली को मन से मनाया जाए तो कुछ ऐसी ही अवस्था होती है। प्रकृति की ही भांति स्त्रियों की भी होली में पूर्ण भागीदारी रहती है। बसंत एकमात्र ऋतु है जिसमें कोई अतिरेक ( सर्दी, गर्मी, बारिश की अधिकता) नहीं हो सकता। बसंत प्रकृति का यौवन मदनोत्सव है और उसकी रचनात्मकता का चरम बिंदु भी, आनंद ही आनंद है इसलिए मनुष्य ही नहीं संपूर्ण जीव जगत के साथ उसकी अनुकूलता है। बसंत में जैसे प्रकृति खुलती है वैसे ही हम भी खुलते हैं यह सर्वश्रेष्ठ उपहार है, जो सृष्टि अपने आप को देती है। होली मिलन, मौज मस्ती, नाचने गाने, दुख भूल जाने का त्यौहार है। 

ब्रजवासियों के शब्दों में तो होली राधा और कृष्ण द्वारा प्रारंभ की गई रीति है जो उस समय से आज तक चली आ रही है। फाल्गुन का महीना ब्रजभूमि के लिए आमोद प्रमोद की स्थली कही जा सकती है। इन दिनों ब्रजवासी ही नहीं देश विदेश से श्रद्धालु, राधा कृष्ण के उपासक, भक्त वृंदावन गोकुल व बरसाने पहुंचकर अपना भक्ति भाव प्रकट करने से नहीं चूकते, खूब आनंद मनाते हुए खुद को धन्यभाग मानते हैं। लोग भांग ठंडाई छानते हैं, एक दूसरे पर प्रेम से अबीर गुलाल मलते हैं रंग डालते हैं, और पुरानी शत्रुता को भूल जाते हैं। ढोल/ मंजीरा/ झांझ बजाते हैं होली गाते हैं और स्वयं को उस काल में ले जाते हैं, जहां अपने कृष्ण कन्हैया गोपियों संग जी भर होली खेल रहे हैं-

मथुरा में सांवरिया खेले होरी, अरे! खेले होरी भरे झोरी।
अरे! इतते आई सबही ग्वालिन, उतते सांवरिया केसर घोरी। 
अरे पिचकारी सबई पे मारी,अरे! कोई गोरी कोई है भोरी। 
नंदबाबा ने रंग घुरवाए,अरे! कुंड एक मन केसर छोरी। 

स्त्री–पुरुष का आकर्षण एक विशिष्ट प्रकार का आकर्षण है जिसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं है, इसीलिए सभी भक्त ईश्वर को अपना प्रियतम मानकर उसकी मादक अनुभूति से घिरे रहते हैं। ब्रज क्षेत्र में भक्तों द्वारा कृष्ण को प्रियतम/ पति मानकर भजने की प्रथा रही है। कोई सखा भाव से, कोई पुत्र भाव से तो कोई दास भाव से इन्हें पूजता है। यह परंपरा और धर्मों संप्रदायों में भी अपने अपने ईष्ट को लेकर देखी जा सकती है। कृष्ण के लिए आकर्षण को इस गीत में बड़े ही सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया गया है।

कन्हैया घर चलो गुईंयां, आज खेलें होरी...
अपने अपने भवन से निकरीं 
कोई सांवरी कोई गोरी 
एक से एक जबर मदमाती 
सब उमर की छोरी,  आज खेलें होरी ...
कन्हैया घर चलो गुईंयां,  आज खेलें होरी...
बंसी बजावत मन कूं लुभावत  
ऐसौ मंत्र पढ़ो री 
सास ननद से चोरी चोरी, 
निकल परीं सब गोरी, आज खेले होरी ... 
कन्हैया घर चलो गुईंयां, आज खेलें होरी...
कोई लचकत कोई मटकत आवत, 
कोई छुप छुप चोरी चोरी 
कोई चपला सी चपल चाल, 
कोई झिझकत बदन मरोरी,आज खेलें होरी...
कन्हैया घर चलो गुईंयां, आज खेलें होरी...
अबीर गुलाल अगर औरू चंदन,
केसर भर पिचकारी 
श्याम सुंदर संग होरी खेलें, 
होनो होय सो होय री, आज खेलें होरी... 
कन्हैया घर चलो गुईंयां, आज खेलें होरी...

मनु वाशिष्ठ

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