महिला कथाकारों द्वारा नए रास्ते की तलाश

भारतीय मूल की इसरा नोमानी अपने चुटीले लेखन के लिये प्रख्यात है। उसकी लिखी किताब ‘ताँत्रिका” में हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म में सेक्स को लेकर अनैतिक बातें दर्ज़ हैं। इसरा ने साधु, संतों, भिक्षुओं और लामाओं के साथ भेंट करके सभी जानकारियाँ हासिल कीं और इनके बीच सेक्स घटनाओ का चटखारेदार वर्णन किया है। उसने अपनी अगली किताब “मक्का में अकेली खडी औरत” में औरतों और मर्दों को एक साथ नमाज़ अदा करने उसकी इमामत यानी नेतृत्व महिला को अदा करने देने की बात उठाई।

Apr 19, 2024 - 12:40
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महिला कथाकारों द्वारा नए रास्ते की तलाश
Women's Day

मैं अतीत के गलियारे से गुज़र रही हूँ। यह गलियारा है महिला कथाकारों के रचे साहित्य का, उनकी आपबीती का। हाथ लगती है पँजाबी की वरिष्ठ लेखिका अजीत कौर की आत्मकथा “कूडा कबाडा” जिसमें वे लिखती हैं कि उनके पति का हुक्म था कि  "कहानियाँ लिखना महज़ पागलपन है, शरीफ घरों की औरतें कहानियाँ नहीं लिखतीं। यह सब यहाँ नहीं चलेगा, ये शरीफों का घर है।"

दँग हूँ मैं इस सोच पर...आखिर क्यों है ऐसा कि औरत कलम थामती है तो पुरुषवादी सोच में खलबली मच जाती है।

वरिष्ठ लेखिका इस्मत चुगताई की कहानी लिहाफ कौन भूल सकता है? चुनौती भरे लेखन और सटीक बयानी पर उन्हें कानूनी दाँव पेंच में घसीटा गया।जीवन का कडवा यथार्थ लिखने वाली इस्मत आपा महीनों कोर्ट कचहरी की खाक छानती रहीं।

शायद यही वजह रही कि कई महिला कथाकारों ने खुद को पितृसत्ता के चौखटे में कैद कर महिलाओं के प्रति उनकी सोच पर ही कलम चलाई। लिहाज़ा वे दादी,नानी,घर ,परिवार के झमेलों में उलझी औरत की दास्तान बयान करने के अतिरिक्त कुछ न लिख पाईं। उन्होंने अपने लेखन में नायिका का ऐसा बिम्ब रचा जो पुरुष समाज को मान्य था और जिस पर पति रूपी सैंसर की कैंची चलना अनिवार्य न था। लिहाज़ा लेखिकाएँ खुद को समेटकर अपने खोल में सुरक्षित रहते हुए खुलकर लिखने से परहेज़ करते हुए लिखती रहीं। इस बीच जिन्होने यह खोल तोडने की कोशिश की उनके लेखन को नकारा गया,ज़लील किया गया। औरत के हाथ में कलम? और लीक से हटकर विद्रोही तेवर? भले ही तमाम आधुनिक हथियारों से लैस राष्ट्र हो या वेद मंत्र, श्लोक, सबद, सूक्तियों, वचनों और आयतों से लैस राष्ट्र हो जब औरत कलम थाम लेती है तो थर्रा जाता है पुरुष समाज। याग़्य़वल्क्य हथियार उठा लेते हैं गार्गी को खामोश करने के लिये और जॉन ऑफ आर्क ज़िन्दा जला दी जाती है। 

बाँग्ला देश की लेखिका तस्लीमा नसरीन ने जब लज्जा (किताब) लिखी जिसमें बांग्ला देश में गरीब हिन्दू अल्पमतों से कैसे पेश आया जा रहा है इसका वर्णन है तो बांग्लादेश की तत्कालीन सरकार ने कठमुल्लाओं के फतवा जारी करने पर कि तस्लीमा को ज़िंदा रहने का कोई हक नहीं है लज्जा ज़ब्त कर ली और तस्लीमा को देश निकाला दे दिया। वह आज भी दर दर भटक रही है। तस्लीमा की दूसरी किताब द्विखँडिता नाम से जब प्रकाशित हुई तो उसे पश्चिम बंगाल ने ज़ब्त कर लिया । इस किताब में उन बातों का खुलासा है जो उसकी ज़िन्दगी में घटित हुई हैं।तस्लीमा पर कई तरह के आरोप हैं कि वह सारी घटनाओं का बयान पूरी सच्चाई से करती है कि कोलकाता के कई विख्यात लेखकों से उसके शारीरिक सम्बन्ध रहे हैं कि वह औरत मर्द यहाँ तक कि अपने पति के साथ संभोग का वर्णन करने मे भी नहीं हिचकिचाती कि वह धार्मिक कट्टरता के खिलाफ है। कि वह सरेआम बयान देती कि एक मर्द को तो इस बात की इज़ाज़त है कि वो दर्जनो औरतों से सम्बन्ध बना ले और घमँड से इस बात का ज़िक्र करें लेकिन यदि कोई औरत अपने दोस्तो का,अपनी मोहब्बत का ज़िक्र करें तो उसे तरह तरह की गालियों के साथ याद किया जाता है।  

पाकिस्तान की शायरा परवीन शाकिर को पाकिस्तान ने बागी लेखिका के विशेषण से नवाज़ा और उसके पति ने उसे इसलिये तलाक दे दिया क्योंकि वह अपनी तनहाईयों के दर्द को शायरी में डुबो रही थी। जबकि उसके पति को यह कतई पसँद न था कि उनके खानदान की इज़्ज़त शायरी जैसे घटिया लेखन में अपना समय ज़ाया करे। उसने इसे चुनौती माना और उदासीनता,महरूमी और बगावत पर कलम चलाने लगी।
 
कुछ तो तेरे मौसम ही मुझे रास कम आये
और कुछ मेरी मिट्टी में बगावत बहुत थी।

भारतीय मूल की इसरा नोमानी अपने चुटीले लेखन के लिये प्रख्यात है। उसकी लिखी किताब  ‘ताँत्रिका” में हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म में सेक्स को लेकर अनैतिक बातें दर्ज़ हैं। इसरा ने साधु, संतों, भिक्षुओं और लामाओं के साथ भेंट करके सभी जानकारियाँ हासिल कीं और इनके बीच सेक्स घटनाओ का चटखारेदार वर्णन किया है। उसने अपनी अगली किताब “मक्का में अकेली खडी औरत” में औरतों और मर्दों को एक साथ नमाज़ अदा करने उसकी इमामत यानी नेतृत्व महिला को अदा करने देने की बात उठाई। उसने मर्दों के औरतों से गले मिलने को और बिनब्याही माँ बनने को जायज़ कहा। आज इसरा के इस मुक्त लेखन से प्रभावित कई दबी , ढँकी लेखिकाएँ चर्चा का विषय हैं।

इस तरह के लेखन से औरत का शताब्दियों का इतिहास अपनी फफूँदी तोडकर बाहर निकला और तमाम तारीखें आज की तारीखों में तब्दील हों उसी के लिये अपनी कलम से आवाज़ उठाने लगीं जिन्हे उनकी परदादियाँ,परनानियाँ भुगतते भुगतते चल बसी थीं। लिहाज़ा मर्द समाज डर गया। उसने ऐसी किताबों पर सेंसरशिप लगा दी। उसे धर्म पर सीधी मार घोषित कर दिया पर फिर भी कलम नहीं रुकी  वह इतिहास अपनी हर दरारों से औरत के शोषण, अत्याचार, कठमुल्लाओं के फतवे ,धार्मिक ज़्यादतियाँ और कुरान की आयतों का सहारा लेकर औरत पर हुए ज़ुल्मो सितम की स्याह तस्वीरें दिखा रहा था। कैसे रुकती कलम? इन तमाम स्याह तस्वीरों में उनका वर्तमान भी तो स्पष्ट झलक रहा था। लेखिकाओं में अब सच कहने का साहस आ गया है। उनकी लिखी आत्मकथाएँ सीधी सीधी पुरुष सत्ता से टक्कर लेती हैं। पहले जो आपसी रिश्तों में टकराव,तलाक,तलाकशुदा औरत के मानसिक धरातल का चित्रण,शादी की मँडी में बार बार नकारी जाना ,विवाहेतर सम्बन्ध,नारी मनोविग्यान,एवं सामाजिक सम्बन्धों की विषमताएँ लेखन का विषय होती थीं वैसी मानसिकता अब लेखिकाओं की रही नहीं। नये रास्तों की तलाश में पिछली पीढी और वर्तमान पीढी की लेखिकाओं ने घिसे पिटे जाल को तोडा है। जहाँ मन्नू भँडारी की आत्मकथा एक कहानी यह भी में उनके राजेन्द्र यादव के साथ के अनेक अनछुए प्रसंग सामने आये हैं वहीं प्रभा खेतान ने छिन्नमस्ता में खुलकर पितृसत्तात्मक समाज पर  चोट की है। इस आत्मकथात्मक उपन्यास में लेखिका ने प्रिया के रूप में यह स्वीकार किया है कि उसके ही सगे भाई ने उसका लगातार यौन शोषण किया और वह भी सँयुक्त कट्टर मारवाडी घराने में रहते हुए। अलका सरावगी,मैत्रेयी पुष्पा  देह स्पर्श,परिवार के रिश्तों में ही पनपते यौन सम्बन्धों को ही लिख् पाईं जबकि तेलुगु लेखिका वोल्गा ने स्त्री के अँगों में पुरुष विलासिता की वीभत्सता को खोजा और यह स्वीकार किया कि लडकी माने चोटी डालना,फूल लगाना,सुसज्जित रहना और औरत माने आँख का पानी, गर्भ की थैली,दो ओवरीज़। अब वैसा ज़माना आ गया है कि औरत ऐसी धारणाओं से इंकार करती है। 

कृष्णा सोबती ने भी औरत की पीडा को खूब उकेरा पर ऐसा लगता है वे लेखन में बदलाव की कोशिश में भटक गईं और उनका लेखन पुरुष द्वेष से उपजा हुआ लगने लगा। बदलाव का यह मतलब नहीं कि पुरुष या औरत की कमियों को लेखन के तराजू पर तौला जाए। यहाँ फ्राँसीसी लेखिका सीमोन द बौउवार का ज़िक्र करना ज़रूरी है। उन्होंने खुद भी आज़ाद जीवन जिया और अपनी चर्चित पुस्तक “द सेकेंड सेक्स” में औरत के तमाम उन रूपों से नकाब हटाए जो पूरे विश्व में लगभग एक जैसे हैं। यह पुस्तक जब प्रकाशित हुई तो खलबली मच गई और सभी को अहसास हुआ क्या यही हमारी नियति है? नारी पत्नी, प्रेमिका, माँ, बेटी, रखैल, वैश्या या दासी ? आधी दुनिया की इस तस्वीर में जडे तमाम स्त्री रूपो की ओर उठा बस एक ही सवाल कि क्या नारी की अपनी कोई पहचान है? सीमोन लिखती है कि इतनी प्रतिभा सम्पन्न होकर भी आज तक कोई लेखिका शेक्स्पीयर नही बनी, दांते नही बनी। यह तथ्य एक सतहीपन का द्योतक है। संस्कृति भले ही कुछ विशिष्ट जनो के संरक्षण में पनपती थी किंतु महान प्रतिभाएँ हमेशा सामान्य जनो से ही उपजती हैं। महिला लेखक के विरुद्ध सारी परिस्थितियाँ हैं। सीमोन की यह बात आज भी जस की तस है। ज्यादातर लेखिकाओं के पास वह भौतिक स्वतंत्रता नही है जो आंतरिक स्वतँत्रता को विकसित करने में सहायक हो सके। फिर भी लेखिकाओं ने हिम्मत जुटाई और लिखने की अवधारणाओं को नकारते हुए वैचारिक स्वतँत्रता को मज़बूती दी। मराठी की लेखिकाओं ने अपनी कलम को धार दी और झँझोड कर रख देने वाली आत्मकथाएँ लिखीं। ये आत्मकथाएँ पितृसत्ता में जकडी औरत का आईना है। जहाँ एक ओर दलित औरत की पीडा है तो वहीं बेडिया समाज एवं कोल्हाटी समाज स्त्रियों के यौन शोषण का लम्बा सिलसिला है जिसे सहती, मरती,खपती औरत उस डोर पर चलने को विवश है जिसके दोनो सिरे खूँखार भेडियों के हाथ में हैं। मुखौटा उतरते ही असलियत सामने आ जाती है। मराठी की ऐसी सनसनी खेज़ हकीकत से लबरेज़ आत्मकथाओं के आते ही और उनके हिन्दी अनुवाद प्रकाशित होते ही कुछ पत्रिकाओं के सम्पादक हिन्दी लेखिकाओं से इसी तरह के लेखन की माँग करने लगे और यह इसलिये नहीं कि वे उनके लेखन से चुनौतीपूर्ण,प्रौढ लेखन की उम्मीद करते थे बल्कि वे तो अपने मज़े के लिये लिखवाते रहे और अपने संपादकीय में उन मुद्दों को उठाकर पाठकों से बहस आमँत्रित करते रहे। अक्सर यही लेखिकाएँ चर्चा में भी रहीं। बहरहाल।

आज जब स्त्री ने लिखने की स्वतँत्रता पाई है तो उसके भीतर का सदियों से दबा दर्द उछालें मारकर बाहर निकल आया है और उसकी लिखी आत्मकथाओं और स्त्रीविमर्श की किताबों ने बुद्धिजीवियों की नींदें उडा दी हैं।

बात तमाम देशों और तमाम भाषाओं में लिखी लेखिकाओं के लेखन के लम्बे सफर की है। इस सफर में उन्होने क्या क्या सहा या क्या क्या वे सह रही हैं यह एक अलग दास्तान है। इस सबके बावजूद उन्होंने लेखन के जो नये रास्ते तलाशे हैं ,बदलते समय के साथ कथा में नये विषयों का चयन किया है वह उनके जज़्बे को रेखांकित करता है । तमाम स्वीकृतियों और अस्वीकृतियों के साथ समय की नब्ज़ को पहचानकर लेखिकाओं ने खुद को प्रतिस्थापित किया है ....जबकि पुरुष लेखकों के मुकाबले यह अधिक जोखिम भरा है। वे जोखिम उठाने को तैयार हैं और औरत होने के जुर्म की सज़ा से उन्हें इंकार है। वे जो लडाई लडना चाहती हैं उसकी कीमत चुकाने का उनमें साहस है। लेखिकाओं ने इस लडाई में कलम को अपना औज़ार बनाया हैऔर सामना कर रही हैं एक सशक्त विरोधी समाज का जो उनके हकों को नकारता है। सारा शगुफ्ता लिखती है। 

वह अपने जिस्म के तने से अपने गिरे पत्ते उठाती है 
और रोज़ अपनी बंद मुट्ठी में सिसक के रह जाती है
वह सोचती है 
कि इंसान होने से अच्छा तो वह गन्दुम का पेड होती
तो कोई परिन्दा चहचहाता
तो वह अपने मौसम देखती
लेकिन वह सिर्फ मिट्टी है सिर्फ मिट्टी
वह अपने बदन से रोज़ खिलौने बनाती है
और खिलौने से ज़्यादा टूट जाती है
वह कुँवारी है
लेकिन ज़िल्लत का लगान सहती है
वह हमारी है
लेकिन हम भी उसे अपनी दीवारों में चुन कर रखते हैं
कि हमारे घर ईंटों से भी छोटे है

संतोष श्रीवास्तव

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