धनतेरस
यह हिंदी कहानी रजनी और विनय के वैवाहिक जीवन की एक ऐसी घटना पर आधारित है, जो विनय के जीवन में बड़ा बदलाव लाती है। धनतेरस के दिन विनय जुए में जीते हुए पैसे अपनी पत्नी को देता है, लेकिन रजनी गलत तरीके से कमाए गए धन का विरोध करती है। उसका दृढ़ रवैया विनय को अपनी गलती का एहसास कराता है और वह जीवनभर कोई गलत काम न करने का संकल्प लेता है। समय के साथ विनय एक आदर्श व्यक्ति बन जाता है, जिसका उदाहरण समाज में दिया जाता है। कहानी का संदेश है कि सच्चा प्रेम केवल साथ निभाना नहीं, बल्कि अपने प्रियजन को गलत रास्ते से हटाकर सही दिशा दिखाना भी है। ईमानदारी, पश्चाताप और जीवनसाथी के नैतिक साहस से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
शाम का समय था, सुगन्धित पवन बह रही थी। चारों तरफ सूर्यास्त के समय की मनभावनी लालिमा छायी हुई थी। सभी पक्षी-वृन्द अपने-अपने घोंसले में जाने के लिए अपनी उड़ान भर चुके थे। समस्त पशु-गण भी अपने-अपने घरों की ओर जाने के लिए उन्मुख हो चुके थे। रजनी डूबते हुए अरुण देव को देखकर सोच रही थी, सूर्य की शोभा डूबते समय भी अनुपम होती है। कितनी शीतलता बिखेरती हैं उनकी किरणें। हमें भी दुःख-सुख दोनों में समान भाव रखना चाहिए। यदि आज दुःख है तो कल सुख रूपी सुबह भी जरूर होगी।
ङ्खरजनी, रजनी, कहाँ हो?ङ्ग उसी समय सासू माँ ने आवाज़ लगाई।
ङ्खजी माँ जी, अभी आई,ङ्ग कहते हुए वह घर के अन्दर चली गई।
ङ्खअपना सब सामान रख लिया है? कल सुबह जल्दी ही निकलना है। ठंडे-ठंडे में हम लोग बनारस पहुँच जाएँगे।ङ्ग सास ने रजनी से कहा।
ङ्खजी माँ जी, सब सामान ठीक से रख लिया है।ङ्ग रजनी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। शादी के करीब दस महीने बाद उसको गाँव से शहर में अपने पति के पास जाने का मौका मिल रहा था। बनारस में ही उसके ससुर नौकरी करते थे तथा उनके साथ रहते हुए उसके पति वहाँ पर किसी योग्य नौकरी की तलाश में थे। बनारस में ही दो कमरे का एक घर लेकर सास-ससुर तथा उसके पति रहा करते थे। करीब दस माह बाद जब उन्होंने देखा कि बहू के पाँव भारी हैं तो उन्होंने उसको भी अपने साथ शहर ले जाने का निर्णय किया। वह इसलिए भी कि जरूरत पड़ने पर उन्हें डॉक्टरी सुविधा ठीक से मिल सके। सभी हँसी-खुशी शहर आ गए।
विनय की अभी नौकरी तो लगी नहीं थी, सो उसका काम था सुबह खा-पीकर घर से निकल जाना, काम की तलाश करना तथा शाम को दोस्तों के साथ मटरगश्ती करना। रजनी घर का काम-धाम निपटाकर कुछ समय सास के साथ गुजारती, फिर अपने कमरे में चली जाती। वहाँ कुछ देर आराम करने के बाद फिर शाम का काम शुरू हो जाता। रात में विनय बहुत देर से आता तो उसका गुस्सा बढ़ जाता था, पर सास-ससुर के आगे वह उसे कुछ भी बोलना उचित नहीं समझती थी। उसे लगता, यह काम माता-पिता का है कि वे अपने लड़के पर निगाह रखें।
कुछ महीने बाद दीपावली का समय नजदीक आ गया। धनतेरस से पहले ही सास व ससुर दोनों ही खेत की बुआई आदि के लिए गाँव जाने की तैयारी करने लगे। सास ने गाँव जाते-जाते अपनी बहू रजनी को ढेर सारी हिदायतें दे डालीं, ङ्खरजनी, ठीक से रहना। ज्यादा देर तक खड़ी मत होना और कुछ भारी सामान मत उठाना। मैं जल्दी ही गाँव से आ जाऊँगी। दीपावली के दिन मैं आ जाऊँगी। बहुत ही ध्यान से रहना।ङ्ग
रजनी ने सास को आश्वस्त करते हुए हामी भरी, ङ्खजी माँ जी, आप लोग निश्चिंत होकर गाँव जाइए, मैं अपना व घर का पूरा ध्यान रखूँगी।ङ्ग
सब कुछ समझा-बुझाकर सास बड़े ही बेमन से ससुर जी के साथ गाँव चली गई। कुछ दिनों बाद धनतेरस का दिन आया। आज विनय सुबह से ही घर से निकला था। रात के ग्यारह बजने को आए, वह अभी तक घर ही नहीं पहुँचा था। यह सब वाक़या रजनी को नागवार लग रहा था। आज के दिन भी विनय जाने कहाँ है? दिन तो अकेले कट जाता है, पर रात काटनी बहुत मुश्किल महसूस होती है। रजनी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच रहा था। ठीक उसी समय दरवाजे पर खट-खट की आवाज़ सुनाई दी। उसने खिड़की से देखा तो विनय खड़ा था। घर के अन्दर आकर सबसे पहले विनय ने हँसते हुए जेब से रुपए निकालकर रजनी के हाथ पर रख दिए और बड़े गर्व से बोला, ङ्खलो, आज धनतेरस मनाने के लिए पैसे।ङ्ग
रजनी को उन रुपयों को देखकर बहुत आश्चर्य हुआ। आखिर अचानक इतने पैसे इनके पास कहाँ से आ गए? उसने पूछा, ङ्खआपको इतने सारे रुपए कहाँ से मिले?ङ्ग
अब विनय सकपका-सा गया। उसने सोचा था कि रुपए पाकर रजनी बहुत खुश होगी, वह खुशी से फूली न समाएगी, पर यहाँ तो उसका उलटा ही हो रहा है। उसे इन रुपयों के बारे में पूरी जानकारी देनी पड़ेगी, यह उम्मीद नहीं थी। उसने बात को कुछ सँभालने की कोशिश की, ङ्खये रुपए, ये तो मैंने जुए में जीते हैं। मैंने पहली बार तुम्हारे लिए जुआ खेला और देखो, मैं जीत भी गया।ङ्ग विनय ने उसे खुश करने का प्रयास किया।
अब एक तो रजनी पहले से ही गुस्से में थी और विनय द्वारा जुए में जीते हुए उन पैसों को देखकर वह और भी खौल उठी और गुस्से में बोली, ङ्खभाड़ में जाए आपका यह धनतेरस, आपने जुआ कैसे खेला? यह शरीफों का काम नहीं है।ङ्ग
उसने सारे रुपए एक झटके में टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दिए। यह देखकर विनय ने समझाते हुए कहा,
ङ्खरुपए क्यों फाड़ दिए, इस रुपए में लिखा था क्या कि यह जुए में जीती हुई है?ङ्ग
यह सुनकर तो रजनी का गुस्सा और भी भड़क गया।
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तड़-तड़ाक!!! खींचकर एक चाँटा विनय के गाल पर जड़ दिया और लगभग चीखते हुए वह बोली, ङ्खठीक है, अगर नहीं लिखा है तो चलो, मैं भी गलत काम करती हूँ और मैं भी पैसे कमाती हूँ। कोई पैसों पर लिखा थोड़े ही होगा कि यह पैसा कैसे आया है?ङ्ग
यह सुनते ही विनय की रूह तक काँप गई। उसने रजनी को एक चाँटा जड़ दिया और बोला, ङ्खतुम्हारी हिम्मत भी कैसे हुई इस तरह की बात बोलने की?ङ्ग वह गुस्से से काँप रहा था।
ङ्खहाँ, वैसे ही जैसे तुम्हारी हिम्मत जुआ खेलने की हुई।ङ्ग रजनी ने उतनी ही दृढ़ता से जवाब दिया।
विनय को अब अपनी गलती का एहसास हो चुका था। उसकी आँखों से पछतावे के आँसू बह निकले। उसने रोते हुए दोनों हाथ जोड़कर रजनी से माफ़ी माँगी। यह देख रजनी भी अब रो पड़ी। दोनों कुछ देर तक रोते रहे, फिर विनय ने रजनी का हाथ पकड़कर उससे यह वादा किया कि वह अब कभी भी जीवन में कोई भी गलत काम नहीं करेगा, जिस काम से उसे जरा-सा भी कष्ट पहुँचे। आज के दिन उनका धनतेरस इस तरह मन रहा था। आज रजनी जैसी पत्नी पाकर वह खुद को धन्य मान रहा था। वह सही अर्थ में एक सहधर्मिणी व अर्द्धांगिनी बनी खड़ी थी।
विनय ने अपने इस वादे का निर्वाह भी आजीवन किया। आज के समय में विनय और रजनी दो बेटे, बहू और नाती-पोतों से भरे घर में सुख और शांति से रह रहे हैं, पर कभी भी किसी ने विनय के बारे में कुछ भी गलत नहीं कहा। यही नहीं, उसके क्षेत्र में सभी लोग विनय को एक आदर्श के रूप में देखते हैं और अपने बच्चों को उनका उदाहरण देते हैं।
डॉ. सरला सिंह ‘स्निग्धा
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