ओवरटाइम

यह एक संवेदनशील और मार्मिक कहानी है, जिसमें फैक्टरी मजदूर प्रकाश अपनी पत्नी पार्वती के इलाज के लिए लगातार ओवरटाइम करता है। सीमित आमदनी, महंगे इलाज और आर्थिक मजबूरियों के बीच वह दिन-रात काम करता रहता है, लेकिन अत्यधिक मेहनत अंततः उसकी जान ले लेती है। पति की मृत्यु का सदमा और बीमारी पार्वती को भी मौत के मुहाने तक पहुँचा देती है। कहानी मजदूरों की आर्थिक विवशता, स्वास्थ्य, श्रम-शोषण और उस व्यवस्था पर सवाल उठाती है, जिसमें रोटी और इलाज के लिए इंसान को अपनी जिंदगी तक ओवरटाइम करनी पड़ती है।

Sep 29, 2026 - 12:44
Sep 29, 2026 - 12:44
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ओवरटाइम
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फैक्टरी में सेकंड शिफ्ट खत्म होने का सायरन गूँजा तो मशीनों की घरघराहट धीरे-धीरे थमने लगी। मजदूर अपने-अपने औज़ार समेटकर बाहर निकलने लगे,लेकिन प्रकाश की आँखों में अब भी मशीनों की थकान घूम रही थी। उसका आठ घंटे का ओवरटाइम पूरा हो चुका था। इच्छा तो उसकी यह थी कि सुबह तक रुककर और काम करे,पर फैक्टरी के नियम उसके इरादों से बड़े थे।

वर्कर्स के गुसलखाने में हाथ-मुँह धोने के बाद वह फैक्टरी गेट से बाहर निकला। सड़क किनारे लगे पीले बल्ब की रोशनी में उसने कमीज़ की जेब से छोटी-सी बहीनुमा डायरी निकाली और आज की कमाई जोड़ने लगा। हिसाब पूरा होते ही उसका चेहरा बुझ गया। डॉक्टर द्वारा बताए गए खर्च के मुकाबले यह रकम अब भी बहुत छोटी थी। घर पहुँचकर उसने साइकिल दीवार से टिकाई ही थी कि दरवाज़ा खुल गया। ‘क्यों रोज-रोज इतना ओवरटाइम कर रहे हो? शरीर है या मशीन?’ पार्वती ने चिंता से कहा। प्रकाश हल्का-सा मुस्कराया,पर कुछ बोला नहीं।

पार्वती उसकी पत्नी थी-उसकी दुनिया,उसका एकमात्र सहारा। छोटे कस्बे में किराए का मकान, पास की फैक्टरी में मजदूरी और मामूली-सी जिंदगी। महीने के आठ हजार रुपये में जैसे-तैसे घर चल जाता था। कभी थोड़ा ओवरटाइम मिल जाता तो दस हजार तक पहुँच जाते। दोनों अपने छोटे-छोटे सपनों में संतुष्ट थे। फिर अचानक सब बदल गया। 

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कुछ महीनों से पार्वती के पेट में दर्द उठता था। वह चुपचाप दवा खाकर बात टाल देती। लेकिन एक दिन दर्द इतना बढ़ा कि उसकी चीख निकल गई। अगले दिन प्रकाश उसे कस्बे के महिला क्लिनिक ले गया। जाँच रिपोर्ट देखकर डॉक्टर का चेहरा गंभीर हो गया। ‘पेट में बड़ी रसौली है,’ डॉक्टर ने धीमे स्वर में कहा, ‘एक महीने के भीतर ऑपरेशन जरूरी है। देर हुई तो जान को खतरा हो सकता है।’

‘खर्च कितना आएगा,मैडम?’ प्रकाश ने हिचकते हुए पूछा।

‘करीब पच्चीस हजार।’

यह सुनते ही जैसे उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

रिश्तेदारों के दरवाजे उसने पहले ही अपने मन में बंद कर दिए थे। कुछ दोस्तों ने सहानुभूति में दो-चार हजार रुपये दे दिए। ठेकेदार से एडवांस माँगा तो उसने साफ मना कर दिया। अब उसके सामने सिर्फ एक रास्ता बचा था-ओवरटाइम।

उस दिन के बाद प्रकाश ने अपनी जिंदगी को घंटों में बाँट दिया-आठ घंटे नौकरी,आठ घंटे ओवरटाइम और बाकी बचा थोड़ा-सा समय नींद के लिए।

धीरे-धीरे उसका शरीर टूटने लगा। आँखों के नीचे काले धब्बे उतर आए। चेहरे की चमक गायब हो गई। रात देर से घर लौटता तो पार्वती थाली लिए उसका इंतजार करती मिलती। कई बार वह दो कौर खाकर ही सो जाता, कई बार बिना खाए बिस्तर पर गिर पड़ता।

पंद्रह दिन लगातार ओवरटाइम करने के बाद उसका शरीर जवाब देने लगा।

उस रात फैक्टरी की ऊपरी मंज़िल से नीचे उतरते समय उसे तेज चक्कर आया। सीढ़ियों पर उसका पैर फिसला और वह सीधे नीचे आ गिरा। जब तक साथी मजदूर उसे अस्पताल पहुँचाते, बहुत देर हो चुकी थी।

आधी रात पार्वती को खबर मिली। वह बदहवास-सी अस्पताल पहुँची। सामने सफेद चादर में लिपटा प्रकाश पड़ा था। कुछ क्षण वह पत्थर बनी उसे देखती रही। फिर अचानक उसके पेट में असहनीय दर्द उठा-मानो भीतर कुछ फट गया हो। उसकी आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा। अगले ही पल वह लड़खड़ाकर प्रकाश की मृत देह पर गिर पड़ी।

अस्पताल के उस ठंडे कमरे में अब दो शव थे-एक पति का,दूसरा पत्नी का।

दोनों की निर्जीव देहें मानो यह कह रही थीं कि जिंदगी की मजबूरियों ने उनसे इतना ‘ओवरटाइम’ करवा लिया था कि अंततः मृत्यु ही उनकी स्थायी छुट्टी बन गई। 

अटल कश्यप 

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