दोषी कौन?
यह मार्मिक कहानी माता-पिता और संतान के बीच बदलते रिश्तों तथा संस्कारों के महत्व को उजागर करती है। सक्सेना दंपति ने अपने बेटे विनय को अच्छी शिक्षा, सुख-सुविधाएँ और व्यवसाय में सफलता दिलाने के लिए हर संभव प्रयास किया, लेकिन वृद्धावस्था और बीमारी में वही बेटा उन्हें बोझ समझने लगा। विनय के व्यवहार से आहत होकर भी उसकी माँ ने अपनी बहू को दोष नहीं दिया, बल्कि स्वीकार किया कि बेटे को संस्कार देने में कहीं न कहीं उनसे ही कमी रह गई। अंततः सक्सेना दंपति अपनी संपत्ति वृद्धाश्रम को दान कर देते हैं और देहदान का निर्णय लेते हैं। कहानी यह गंभीर प्रश्न उठाती है कि संतान को सफल बनाना जितना आवश्यक है, उससे कहीं अधिक आवश्यक उसे संवेदनशील और संस्कारी इंसान बनाना है।
सक्सेना अंकल के घर से कल रात गए बहुत जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज आ रही थी। सुबह घर के बाहर ऑटो में सामान रखते हुए विनय को देखा तो थोड़ा-थोड़ा अंदाज़ा हुआ, पर उसके चेहरे को देख पूछने की हिम्मत नहीं हुई। ऑटो में बैठकर जब वो रवाना हो रहे थे तो सक्सेना आंटी उसे रोकने की बहुतेरी कोशिश कर रही थी, तरह-तरह से समझा रही थी, पर वो रुकने के लिए तैयार ही नहीं था।
थोड़ी देर बाद ऑटो विनय और उसके परिवार को लेकर चला गया। पीछे रह गई रोती-बिलखती सक्सेना आंटी। तभी अंकल की आवाज सुनाई दी और आंटी अपने आँसू पोंछती अंदर चली गई।
सक्सेना अंकल और आंटी का परिवार इस मोहल्ले में काफी लंबे समय से रह रहा है। हम इस मोहल्ले में उन्हीं के मकान में किरायेदार बनकर आए थे और थोड़े समय बाद ही उनके पास वाले मकान को हमने अपना आशियाना बना लिया। बीते चार सालों के दौरान अंकल-आंटी से एक लगाव हो गया था। उनके सहयोग की वजह से हमें कभी भी यहाँ अजनबीपन महसूस नहीं हुआ। यहाँ सेटल होने से अपना आशियाना बनाने तक उन दोनों ने हमारा काफी सहयोग किया। आंटी तो कई बार बातों-बातों में कह भी देती थी कि मेरी ज़िंदगी में बेटी की कमी थी, जो तुम्हारे आने से पूरी हो गई।
आंटी की बातचीत में वो हमेशा अंकल के बारे में ही बात करती थी। बात कहीं से भी शुरू हो, खत्म अंकल की पोस्ट और रुतबे और अभी की अंकल की स्थिति पर ही होती थी। कुछ दिनों पहले भी जब वो विनय के रवैये से थोड़ा परेशान थी तो यही सब बता रही थी और मैं चुपचाप सुनती जा रही थी। वो बता रही थी, ङ्खइनकी सरकारी नौकरी थी, ऊँची पोस्ट पर थे, लोग आगे-पीछे घूमते थे। कुछ सालों पहले ही रिटायर हुए हैं। वैसे तो ये स्वस्थ थे, पर दो साल पहले ब्लड प्रेशर बहुत ज्यादा बढ़ गया था। उस वक्त तो सब ठीक हो गया था, परन्तु उसके महीने भर बाद तबियत इतनी ज्यादा बिगड़ी कि धीरे-धीरे इन्होंने बिस्तर पकड़ लिया। यदि आज ठीक होते तोष्ठष्ठङ्ग
उनकी आँखें नम हो आई थीं और वो अपनी बात छोड़कर इधर-उधर की बात करने लगी।
अंकल और आंटी के एक ही बेटा है विनय, जिसने श्ँA करने के बाद अपना व्यवसाय करना पसंद किया। अंकल ने भी उसके इस विचार का स्वागत किया और उसे अपना व्यवसाय जमाने में बहुत मदद की। उनकी मदद और विनय की मेहनत से उसकी गिनती शहर के नामी बिजनेसमेन में होती है।
आंटी ने विनय की तरक्की का श्रेय हमेशा सक्सेना अंकल के पालन-पोषण और विनय की मेहनत को दिया। उनका मानना था कि उनका बेटा विनय आज के जमाने का श्रवण कुमार है। वो सच में उनके बुढ़ापे का सहारा है।
विनय के हर निर्णय को अंकल-आंटी ने हमेशा अपनी मंजूरी दी। यहाँ तक कि विनय की सहमति से आंटी-अंकल ने विनय का रिश्ता तय कर दिया था। रिश्ता तय होने के बाद विनय दो साल के लिए बॉम्बे चला गया।
साल भर बाद एक दिन विनय का फ़ोन आया कि वो इस शादी के लिए तैयार नहीं है। उसे अपनी पसंद की लड़की यहाँ मिल गई और वो उसी से शादी करेगा। अंकल-आंटी के सामने तब बड़ी समस्या खड़ी हो गई कि वो कैसे मना करें? उन्होंने लड़की वालों से इस बारे में बात करी और विनय की इच्छा बताई। वे लोग बहुत नाराज़ हुए। रिश्ता तो टूट गया, पर अंकल को इससे बहुत तकलीफ हुई। खैर, अपने बेटे की खुशी के आगे वो मुस्कुराकर आगे बढ़ गए और उसकी इच्छा का मान रखा।
विनय ने शादी कर ली। उसके व्यवसाय ने भी गति पकड़ी। सुषमा ने भी धीरे-धीरे सबका दिल जीत लिया। सब कुछ ठीक ही चल रहा था, पर अंकल की बीमारी की वजह से अब घर का माहौल थोड़ा तनावग्रस्त रहने लगा।
हर सप्ताह अंकल को डॉक्टर को दिखाने ले जाना विनय का ही काम था। उसे अपना काम छोड़कर अंकल को दिखाने ले जाना समय की बर्बादी लगने लगा। आंटी जी भी अंकल जल्द से जल्द ठीक हो जाएँ, इसके लिए जो भी कोई इलाज बताता, आंटी जी करने को तैयार हो जाती। और वे अकेले जा नहीं सकती थीं। ऐसे में विनय की जिम्मेदारी हो जाती कि वो लेकर जाए।
कुछ समय तो विनय ने किया, पर फिर जब उसे यह रोज का फिजूल का काम लगने लगा तो उसने इस काम के लिए भी एक आदमी नियुक्त कर दिया, जो अंकल के बाकी सभी काम करने के साथ उन्हें डॉक्टर को दिखाने भी ले जाए। परन्तु जब कहीं मंदिर या किसी जगह धोक दिलवाने जाना होता तो वो चाहती कि विनय भी साथ में आए।
जब उन्हें लगने लगा कि विनय उनकी बात पर ध्यान नहीं दे रहा तो वे सुषमा से कहती कि वो विनय को साथ जाने के लिए कहे। सुषमा के कहने पर विनय साथ तो हो लेता, पर पूरे रास्ते वो आंटी पर गुस्सा ही करता रहता। आंटी अंकल के ठीक होने के लिए किसी न किसी ज्योतिषी के पास जाती रहती और वो जो बताते, वही करती भी, पर अब तो ये रोज का ही काम हो गया था। उनकी इच्छा यह रहती कि विनय भी अपने हाथ से कुछ दान-पुण्य करें और विनय को ये सब करना बिल्कुल पसंद नहीं था।
ऐसी ही छोटी-मोटी बातों ने कब विनय के लिए माता-पिता को बोझ बना दिया, अहसास ही नहीं हुआ और फिर कल रात अपने इस बोझ से हल्का होने के लिए विनय गुस्सा होकर आंटी से झगड़ा कर बैठा और अपनी पत्नी को लेकर घर से चला गया।
विनय के जाने के बाद आंटी ऐसे हो गई, जैसे मानो उनकी कोई संतान कभी रही ही न हो। वो खुद को और अंकल को ज्यादा से ज्यादा खुश रखने की कोशिश करती। पूरा मोहल्ला, विनय ने उनके साथ जो व्यवहार किया उससे परिचित था। सब लोग कोशिश करते कि विनय की कमी उन्हें महसूस न हो।
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धीरे-धीरे सब कुछ सहज होने लगा। पहले आंटी की हर बात में विनय का जिक्र रहता था, पर अब आंटी के मुँह पर कभी विनय का नाम नहीं आता था। उन्हें देख कर इस बात का हमेशा ख्याल आता था कि क्या ऐसे ही बच्चों की कामना माँ-बाप करते हैं? यदि बच्चों का अच्छा पालन-पोषण करना माँ-बाप का फ़र्ज़ है तो क्या बच्चों की उनके प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है?
विनय को घर से गए साल भर होने को आया था। आंटी ने घर के एक हिस्से को वृद्धाश्रम वालों को दे दिया था। अपने पास बस एक कमरा और एक रसोई रखा। ज़िंदगी फिर से पटरी पर लौटने लगी। आंटी की सेवा से अंकल की हालत में अब थोड़ा सुधार आने लगा था।
एक रात ३ बजे आंटी का फोन आया। थोड़ी घबराई हुई थी। पता चला कि अंकल की तबियत एकाएक बिगड़ गई है। हम लोग फ़ौरन आंटी के पास पहुँचे और अंकल को लेकर अस्पताल गए। डॉक्टर ने तुरंत ही इलाज शुरू कर दिया।
थोड़ी देर में अंकल की हालत में सुधार आ गया और हम अंकल को लेकर घर आ गए। घर पर आने वाला हर व्यक्ति यही कह रहा था कि विनय को सूचना कर देनी चाहिए, पर आंटी ने साफ मना कर दिया।
मिलने आई कुछ औरतें आपस में बातें करती हुई कह रही थी कि इनका बेटा तो बहुत बढ़िया था, पर बहू ही खराब आई, जिसकी वजह से आज दोनों पति-पत्नी की यह हालत हो गई। उनकी बात सुन आंटी फ़ौरन बोल उठी, ङ्खनहीं, रूप की मम्मी, आप गलत सोच रही है। मेरी बहू में कोई कमी नहीं थी। यदि उसमें कोई कमी होती तो वो मेरे बेटे को अपने माँ-बाप से प्यार करना नहीं सिखा पाती। यदि वो सिखा पाई तो उसकी वजह उसका अपने मम्मी-पापा के प्रति प्यार था। कमी हमारे बेटे में थी या हमने उसे संस्कार देने में कमी कर दी, इसलिए हम अपने बेटे को खुद से प्यार करना नहीं सिखा पाए। यदि पढ़ाई-लिखाई करवाने और उसे सुविधासंपन्न जीवन देने के साथ संस्कार भी दे पाते तो वो हमें बोझ समझकर छोड़कर जाने के बारे में कभी नहीं सोचता। इस बात के लिए मैं अपनी बहू पर दोषारोपण नहीं कर सकती।
आंटी की बात ने सबको चुप करने के साथ सोचने पर मजबूर कर दिया।
दो महीने बाद एक दिन अंकल की तबियत फिर बिगड़ी और अंकल की सार-संभाल करते हुए आंटी को भी अटैक आ गया और दोनों पति-पत्नी इस दुनिया को छोड़कर चले गए।
जाने से पहले आंटी ने अपनी आखिरी इच्छा और वसीयत के बारे में अपने वकील और डॉक्टर अंकल को बता दिया था। वकील साहब ने उनकी इच्छानुसार काम किया। दोनों की देह मेडिकल कॉलेज को दान कर दी गई। उनकी सारी संपत्ति भी वृद्धाश्रम को दे दी गई। मकान का एक हिस्सा तो उन्होंने पहले ही वृद्धाश्रम को दे दिया था, बाकी हिस्सा भी उन्हें सौंप दिया गया।
अपनी वसीयत में उन्होंने यह भी इच्छा जाहिर की थी कि उनके बेटे से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है। अतः उनकी मृत्यु की सूचना उनके बेटे को नहीं दी जाए और यदि उसे पता भी चल जाए तो उसे उनके शरीर को नहीं देखने दिया जाए। उनकी मृत्यु के बाद कोई क्रियाकर्म नहीं किए जाएँ, क्योंकि श्रीमान विनय के व्यवहार को देखते हुए उन लोगों ने अपने जीवित रहते ही अपने क्रियाकर्म करवा दिए थे।
आंटी-अंकल की ऐसी स्थिति देख कर आज भी दिमाग में कई सवाल आते हैं। क्या कभी विनय को एहसास होगा कि उसने क्या खोया है? आज जो कुछ भी अपने आस-पास देख-सुन रहे हैं, आखिर उसका दोषी कौन है?
संगीता दवे
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