मुफ़्त का सफ़र
क्या-आज-की-शिक्षा-सिर्फ-परीक्षा-तक-सीमित-है
यात्री जी प्रतिदिन घर से कॉलेज और कॉलेज से घर तक बस से यात्रा करते थे। इस नित्य यात्रा ने उन्हें समाज के अनेक रंगों और लोगों के विविध स्वभावों से परिचित करा दिया था। वे प्रायः कहा करते थे कि बस केवल यात्रियों को नहीं, बल्कि समय और समाज को भी ढोती है।
उस दिन उनकी परीक्षा ड्यूटी थी। समय पर परीक्षा केंद्र पहुँचने के लिए वे सुबह की बस में बैठ गए। बस अभी कुछ ही दूर चली थी कि अगले चौराहे पर अचानक ब्रेक लगानी पड़ी। देखते ही देखते विद्यार्थियों का एक झुंड बुलेट ट्रेन की गति से बस में चढ़ा और कई दिनों से भूखे शेरों की तरह खाली सीटों पर टूट पड़ा।
कंडक्टर ने टिकट माँगते हुए कहा,“चलो भाई, सब लोग किराया निकालो।” एक विद्यार्थी, जिसकी आँखों पर काला चश्मा, गले में चमकीला गमछा और माथे पर बड़ा-सा तिलक था, बोला- “हम लोग विद्यार्थी हैं, परीक्षा देने जा रहे हैं।”
दूसरे ने मोबाइल में बाल सँवारते हुए कहा- “पहचानते नहीं हैं क्या?” कंडक्टर मुस्कराया और बोला-“बाबू रे, मैं भी अपने समय में छात्र था और छात्रनेता भी। खूब हीरोगिरी किया इसलिए आज कंडक्टरी कर रहा हूँ। विद्यार्थी हो; अच्छी बात है, पर किराया तो देना ही पड़ेगा।”
एक लड़के ने कहा-“इतनी-सी दूरी के लिए भी किराया लोगे?” कंडक्टर ने गंभीर होकर कहा, “बाबू गाड़ी डीजल से चलता है,पानी से नहीं। चुपचाप भाड़ा निकालो।” बहस बढ़ने लगी। ड्राइवर ने बस रोक दी। तभी यात्री जी ने हस्तक्षेप किया और कहा-“कंडक्टर साहब, आज इन्हें जाने दीजिए। इनका किराया मैं दे देता हूँ। जल्दी बस बढ़ाइए”
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कंडक्टर ने धीमे स्वर में कहा, “सर, आप नहीं जानते। इनका रोज़ का यही नाटक है। मालिक को हिसाब देना पड़ता है।”
यात्री जी बोले- “ठीक है, आज भर छोड़ दीजिए। मुझे विश्वास है कि आगे से ये ऐसा नहीं करेंगे।” बस फिर चल पड़ी। छात्रों ने बैग से नोटबुक नहीं, बल्कि अपने-अपने पॉकेट से मोबाइल निकाले। कोई रील्स स्क्रॉल करने लेने लगा, कोई लाइव वीडियो बनाने लगा, तो कोई यूट्यूब पर गीत सुनने लगा। कंडक्टर ने यात्री जी की ओर देखकर कहा-“देख रहे हैं सर? किस कोन (कोण) से ये विद्यार्थी लगते हैं?” यात्री जी केवल मुस्करा दिए।
कॉलेज के पास बस रुकी। लड़के उतरने लगे। उतरते-उतरते एक छात्र ने चश्मा उतारते हुए कंडक्टर की ओर देखकर कहा-“बेटा, फिर मिलना, तब बताएँगे।”
बस आगे बढ़ गई। यात्री जी ने माथे पर हाथ रख लिया। बस अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रही थी, किंतु यात्री जी के मन में एक प्रश्न अब भी ठहरा हुआ था- क्या आज की शिक्षा केवल परीक्षा तक सीमित रह गई है?
राजीव कुमार
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