कुंडलिया छंद के विकास में महिला कुंडलियाकारों की सहभागिता

"जनश्रुति है कि गिरिधर एवं उनकी पत्नी दोनों ही कुण्डलियाँ लिखते थे। जोधपुर के मुं. देवीप्रसाद द्वारा संकलित एवं सम्पादित 'महिला मृदुवाणी' पुस्तक में लिखा है, 'गिरिधर कविराय की स्त्री भी कविया थी और वह भी अपने पति की देखा- देखी उन्हीं की छाया पर नीति, व्यवहार की कुण्डलियाँ बनाया करती थी, जो गिरिधर कविराय की कुण्डलियों से मिली-जुली हैं और 'सांईं' शब्द से प्रारम्भ होती हैं

Apr 25, 2024 - 13:34
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कुंडलिया छंद के विकास में महिला कुंडलियाकारों की सहभागिता
Kundalia Chhanda

हिंदी साहित्य में प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल के काव्य में छंदों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है आदिकाल हो या भक्ति काल या फिर रीतिकाल, हर काल में रचनाकारों द्वारा प्रचुर मात्रा में अनेक लोकप्रिय छंदों की रचना की गई है।  यति, गति,‌ लय, तुक, गण, वर्ण के नियमों से बंधे इन्हीं छंदों में से एक कुंडलिया छंद जन मानस का लोकप्रिय छंद रहा है।

वर्तमान में कुंडलिया छंद के कीर्ति स्तंभ श्री त्रिलोक सिंह ठकुरेला जी ने कुण्डलिया छंद की  विकास यात्रा के बारे में  लिखा है -

"आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कृत 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' के अनुसार कवि एवं सूत्रकार शांङ्गधर ने 'हम्मीर रासो' की रचना की, जिसमें कुण्डलिया छंद का उदाहरण देखने को मिलता है। शांङ्खधर के ग्रंथों का समय विक्रम की चौदहवीं के अंतिम चरण में माना गया है। गोस्वामी तुलसीदास ( 'कुण्डलिया रामायण') एवं स्वामी अग्रदास ने‌  ( 'कुण्डलिया') नामक कृतियों की रचना की।

कुण्डलियाकार के रूप में गिरधर का नाम बहुश्रुत है। गिरधर की कुंडलियां जन-जन में खूब लोकप्रिय हुई।
कुण्डलियों में संत गंगादास नाम भी बड़े आदर के साथ लिया जाता है। बाबा दीनदयाल गिरि, राय देवीप्रसाद पूर्ण, कवि ध्रुवदास जैसे अनेक रचनाकारों  ने  इस  छंद को पल्लवित  किया। 

1999 में श्री रामपाल शर्मा 'काक' का कुण्डलिया संग्रह 'काक कवि की कुण्डलियाँ' प्रकाशित हुआ। सन् 2009 में डॉ. कपिल कुमार का कुण्डलिया-संग्रह 'कहें कपिल कविराय' प्रकाशित हुआ। सन् 2010 में श्री राम औतार 'पंकज' का कुण्डलिया-संग्रह 'कुण्डलिया कुंज' प्रकाशित हुआ।

कुण्डलिया छंद यात्रा को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से त्रिलोक सिंह ठकुरेला द्वारा 13 जुलाई, 2012 को फेसबुक पर 'कुण्डलिया छंद' नामक समूह की शुरुआत की।

त्रिलोक सिंह सिंह ठकुरेला द्वारा संपादित कुण्डलिया  संकलन  'कुण्डलिया छंद के सात हस्ताक्षर' सन् 2012 में  राजस्थानी ग्रन्थागार जोधपुर द्वारा प्रकाशित हुआ जिसमें डॉ कपिल कुमार गाफिल स्वामी डॉक्टर जगन्नाथ प्रसाद बघेल डॉ रामसनेही लाल शर्मा यायावर शिवकुमार दीपक सुभाष मित्तल सत्यम एवं त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कुण्डलिया संकलित हैं।”

कुण्डलिया छंद की इतिहास  यात्रा  देखने से यह स्पष्ट होता है कि कुंडलिया छंद के इतिहास में  महिला रचनाकारों की उपस्थिति न के बराबर रही है, या दर्ज नहीं हो पाई है।

'कुण्डलिया संचयन' की भूमिका में इसी बात की ओर संकेत किया गया है -
"जनश्रुति है कि गिरिधर एवं उनकी पत्नी दोनों ही कुण्डलियाँ लिखते थे। जोधपुर के मुं. देवीप्रसाद द्वारा संकलित एवं सम्पादित 'महिला मृदुवाणी' पुस्तक में लिखा है, 'गिरिधर कविराय की स्त्री भी कविया थी और वह भी अपने पति की देखा- देखी उन्हीं की छाया पर नीति, व्यवहार की कुण्डलियाँ बनाया करती थी, जो गिरिधर कविराय की कुण्डलियों से मिली-जुली हैं और 'सांईं' शब्द से प्रारम्भ होती हैं और इसी से ये पहचानी जाती हैं। कोई यों भी कहते हैं कि गिरिधर कविराय ने जितनी कुण्डलियाँ बनाने का संकल्प लिया था, उतनी बनाये बिना ही वह कालग्रस्त हो गये, तब उनकी स्त्री ने शेष कुण्डलिया बनाकर उनका मनोरथ पूरा किया।”
इतिहास के परिदृश्य में वर्तमान को देखें तो आज ऐसी स्थिति बिल्कुल नहीं है। आज अनेक महिला रचनाकार कुण्डलिया लेखन की ओर अग्रसर हैं। यदि हम अग्रणीय  महिला कुण्डलियाकारों की बात करें तो सबसे पहले महिला कुण्डलियाकारों के रूप में संयुक्त रूप से कल्पना रामानी  एवं साधना ठकुरेला के कुण्डलिया छंद सामने आते हैं। कल्पना रामानी  वेब पत्रिका 'अनुभूति' के 5 मई 2014 अंक में एवं  साधना ठकुरेला ने कुण्डलिया कानन, सन् 2014 सांझा कुण्डलिया संकलन में अपने कुण्डलिया छंदों से उपस्थिति दर्ज करवाई।

2015 में त्रिलोक सिंह ठकुरेला के संपादन में  'कुण्डलिया संचयन'  कुंडलिया संग्रह प्रकाशित हुआ जिसमें डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा , परमजीत कौर 'रीत' एवं साधना ठकुरेला  के कुण्डलिया छंद अन्य रचनाकारों के साथ प्रकाशित हुए।

2016 त्रिलोक सिंह ठकुरेला एवं साधना ठकुरेला के संयुक्त संपादन में 'कुण्डलिया छंद के नये शिखर' प्रकाशित हुआ। 

जिसमें ऋता शेखर 'मधु', डा. रंजना वर्मा, वैशाली चतुर्वेदी आदि  महिला कुण्डलियाकारों के कुण्डलिया छंद प्रकाशित हुए।

2019 में रघुविन्द्र यादव द्वारा संपादित 'मानक कुण्डलिया' कुण्डलिया संग्रह में वैशाली चतुर्वेदी, तारकेश्वरी 'सुधि', परमजीत कौर 'रीत', ' पुष्प लता शर्मा, साधना ठकुरेला एवं अनामिका सिंह अना के कुण्डलिया छंद अन्य रचनाकारों के साथ प्रकाशित हुए ।

2023 में त्रिलोक सिंह ठकुरेला द्वारा संपादित में 'अभिनव कुण्डलिया' में डॉ. उपमा शर्मा,ऋताशेखर 'मधु', तारकेश्वरी सुधि, परमजीत कौर'रीत, डॉ. रंजना वर्मा, वैशाली चतुर्वेदी, साधना ठकुरेला, शकुंतला अग्रवाल 'शकुन' आदि महिला रचनाकारों के छंद अन्य रचनाकारों के साथ प्रकाशित हुए। 

2024 में त्रिलोक सिंह ठकुरेला द्वारा संपादित  'समकालीन कुण्डलिया शतक' में 
अनमोल रागिनी 'चुनमुन', अनुजा मिश्रा 'सुहासिनी', आशा देशमुख,  डॉ. उपमा शर्मा, ऋताशेखर 'मधु' , उर्मिला श्रीवास्तव उर्मि का किरण सिंह, गरिमा सक्सेना,ज्योतिर्मयी पंत, ज्योत्सना प्रदीप, डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा , तारकेश्वरी यादव, परमजीत कौर 'रीत' , पुष्प लता शर्मा, प्रतिभा प्रसाद कुमकुम,  मनजीत कौर मीत, डॉ. मंजु लता श्रीवास्तव,  रचना उनियाल, रजनी गुप्ता पूनम चंद्रिका, डॉ. रंजना वर्मा, वीणा शर्मा वशिष्ठ,  वैशाली चतुर्वेदी, शशि पुरवार, शालिनी रस्तोगी, डॉ. सरला सिंह 'स्निग्धा', साधना ठकुरेला, सुशीला जोशी विद्योतमा आदि महिला रचनाकारों के छंद  अन्य रचनाकारों के साथ प्रकाशित हुए। 

इन साँझा संग्रहों के अतिरिक्त  और भी साँझा संग्रह हो सकते हैं जिनमें महिला कुण्डलियाकारों के छंद प्रकाशित हुए हों ।

इस प्रकार यह कह सकते हैं कि अनेक साँझा कुण्डलिया संकलनों में महिला रचनाकारों ने उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ अपने कुण्डलिया छंदों से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

लेकिन कुण्डलिया संग्रह  के इतिहास की पुस्तक सूची देखने से पता चलता है कि 2020 तक किसी महिला रचनाकार का एकल या व्यक्तिगत  कुण्डलिया संग्रह प्रकाश में नहीं आ सका था ।

2020 में डॉ रंजना वर्मा का कुण्डलिया संग्रह 'बसंत के फूल'  आया और महिला रचनाकारों के खाते में पहला व्यक्तिगत  कुण्डलिया संग्रह शामिल हुआ।

इसके पश्चात शकुंतला अग्रवाल 'शकुन' का कुण्डलिया संग्रह सन् 2021 में और परमजीत कौर 'रीत' का कुण्डलिया संग्रह 'कुण्डलिया सतसई' 2022 जो महिला रचनाकारों में पहली कुण्डलिया सतसई है, का प्रकाशन हुआ।

वर्तमान में महिला रचनाकारों में  से ऋताशेखर 'मधु' का कुण्डलिया संग्रह 'इंद्रधनुष' , उर्मिला श्रीवास्तव उर्मि का 'हृदय के बिंब', तारकेश्वरी सुधि का 'शब्द-वीणा' आदि कुण्डलिया संग्रह प्रमुख हैं 

निष्कर्ष में यह कहा जा सकता है कि घर और बाहर की ज़िम्मेदारियों को साधने वाली मानवियों ने कुण्डलिया छंद को साधकर अपनी लेखन क्षमताओं का परिचय दिया है। आशा है भविष्य में महिला रचनाकारों की लेखनी से अनेक नये कुण्डलिया संग्रह निकलेंगे एवं कुण्डलिया छंद को समृद्ध करेंगे।..

परमजीत कौर रीत, 

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