देहरी
यह भावुक हिंदी कहानी चित्रा, उसके बेटे सुजान और वफादार कुत्ते झब्बू के माध्यम से माँ के प्रेम, घर से जुड़ी स्मृतियों और रिश्तों की गहराई को उजागर करती है। पहाड़ी गाँव में लगातार बारिश और भूस्खलन से भयंकर तबाही मच जाती है, लेकिन चित्रा का पुराना घर और उसकी प्रिय देहरी बची रहती है। मलबे में दबे झब्बू को बचाने के बाद चित्रा अपने बेटे के लौटने की प्रतीक्षा करती है। शहर से गाँव पहुँचा सुजान माँ को सुरक्षित देखकर भावुक हो उठता है और उसे अपने साथ ले जाने का निर्णय करता है। अंततः चित्रा अपनी देहरी से विदा लेते हुए समझती है कि घर से दूर जाना उसकी स्मृतियों को छोड़ना नहीं है। कहानी का मूल संदेश है कि घर केवल ईंट-पत्थरों से नहीं बनता, बल्कि यादों, संघर्षों और रिश्तों से बनता है। माँ का अटूट साहस, बेटे का प्रेम और झब्बू की वफादारी इस कहानी को मार्मिक बनाते हैं।
पहाड़ की तलहटी में बसा वह छोटा-सा गाँव आधा खाली हो चुका था। अधिकतर घरों के दरवाज़ों पर ताले पड़े हुए थे। रोज़गार के सीमित साधनों और कठिन जीवन ने लोगों को शहरों की ओर जाने के लिए मजबूर कर दिया था। गाँव की पगडंडियाँ अब पहले जैसी चहल-पहल से भरी नहीं थीं।
उसी गाँव के आख़िरी छोर पर एक पुराना-सा घर था, जहाँ चित्रा अकेली रहती थी। चित्रा पचास की उम्र पार कर चुकी थी। उम्र बढ़ी थी, मगर जिम्मेदारियों का भार उठाते-उठाते भी उसके कंधे कभी झुके नहीं थे। उसने अकेले ही घर और बाहर की सारी जिम्मेदारियाँ सँभालते हुए अपने इकलौते बेटे सुजान को शहर के छात्रावास में रखकर उच्च शिक्षा दिलाई थी। सुजान कई वर्षों पहले अपने परिवार के साथ शहर में बस चुका था।
चित्रा कर्मठ थी, स्वाभिमानी थी और अपनी मिट्टी से गहरी जुड़ी हुई थी। घर की दीवारों पर समय की परतें चढ़ गई थीं। दरवाज़े का रंग फीका पड़ गया था, मगर उस घर की देहरी उतनी ही पवित्र थी। तीस वर्ष पहले इसी घर की देहरी पर वह डोली में दुल्हन बनकर आई थी। तभी मन ही मन उसने प्रण लिया था-जिस देहरी ने उसे दुल्हन बनाकर स्वीकार किया है, एक दिन उसकी अर्थी भी यहीं से उठेगी। समय ने उसे बहुत कुछ दिया भी था और बहुत कुछ छीन भी लिया था। वैधव्य की वेदना ने उसे भीतर तक झकझोर दिया था, लेकिन पति की आख़िरी निशानी-उसके बेटे सुजान की परवरिश की जिम्मेदारी ने उसके भीतर अद्भुत साहस भर दिया था। उसकी सच्चाई और दृढ़ता उसकी आँखों से ही झलकती थी।
दस दिनों से लगातार बारिश हो रही थी। बादल जैसे पहाड़ों पर डेरा डालकर बैठ गए थे। परसों ही पानी की तेज धार पड़ोस के एक घर को बहा ले गई थी।
सुजान माँ को समझाते-समझाते थक चुका था।
ङ्खमाँ, आप भी घर का दरवाज़ा बंद कर दो। डाल दो ताला। कब तक अकेले घर और खेती-बाड़ी सँभालोगी? मेरे साथ शहर चलो। वहाँ आप सुरक्षित रहोगी।
चित्रा ने हर बार की तरह इस बार भी शांत स्वर में केवल इतना कहा-ङ्खमेरी देहरी ही मेरा सुकून है।ङ्ग
चित्रा घर की देहरी पर बैठी ऊपर की ओर देख रही थी। चारों ओर बादलों की काली चादर पसरी हुई थी। चित्रा की आँखों में आशा का नीला आकाश था और होंठों पर एक मूक प्रार्थना-
ङ्खहे ईश्वर! मेरे सपनों के इस घर को अपनी कृपा की छाँव में रखना।
वह बार-बार अपने पालतू झब्बू की ओर देख रही थी। झब्बू बेचैनी से लगातार भौंक रहा था। कभी वह आँगन की ओर दौड़ता, कभी दरवाज़े के पास आकर रुक जाता। जैसे किसी अनहोनी की आहट उसे पहले ही सुनाई दे गई हो। और हुआ भी वही।
अचानक बारिश ने अपना रौद्र रूप धारण कर लिया। पानी की धारें जैसे आसमान को चीरती हुई धरती पर उतरने लगीं। बिजली की कड़कड़ाहट से पूरा गाँव काँप उठा।
जोर-जोर से चीखों की आवाज़ें आ रही थीं-
ङ्खबाहर भागो! घरों से बाहर निकलो!ङ्ग
चित्रा कुछ समझ पाती, उससे पहले ही धरती जैसे हिल उठी। पहाड़ का एक विशाल हिस्सा भरभराकर नीचे आने लगा। अगले ही पल न जाने कितने घर, कितने आँगन और कितनी ज़िंदगियाँ प्रकृति के प्रचंड वेग में समा गईं।
चित्रा की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह अपनी देहरी पर दरवाज़े को कसकर पकड़े बैठी थी-मानो लकड़ी के उस दरवाज़े को नहीं, स्वयं ईश्वर की बाँह थामे हुए हो।
कुछ देर बाद जब शोर थमा तो चारों ओर सन्नाटा पसरा था। जहाँ कभी घर थे, वहाँ मलबे के ढेर थे। जहाँ आँगन थे, वहाँ मिट्टी और पत्थरों की मोटी परतें थीं। पूरा गाँव जैसे अपनी पहचान खो चुका था। चित्रा की आँखें सामने जमी थीं। हर ओर मलबा ही मलबा नज़र आ रहा था। लेकिन उस मलबे के बीच उसका घर और उसकी देहरी अब भी खड़ी थी।
बारिश धीमी पड़ चुकी थी। पानी की तेज धाराएँ अभी भी रास्ता तलाश रही थीं। चारों ओर पसरे सन्नाटे में कभी-कभार किसी पेड़ के गिरने की चरमराहट सुनाई दे जाती। झब्बू की आवाज़ अब नहीं आ रही थी। चित्रा ने घबराकर चारों ओर देखा और आवाज़ दी-
ङ्खझब्बू!ङ्ग
कोई उत्तर नहीं मिला।
वह उठने का प्रयास करने लगी, मगर पैरों ने साथ नहीं दिया। उसने दरवाज़े का सहारा लिया और धीरे-धीरे खड़ी हुई। तभी उसकी नज़र सामने पड़ी। मलबे के नीचे कुछ हलचल थी। चित्रा का दिल ज़ोर से धड़क उठा। वह ज़ोर से चीखी, ङ्खझब्बू! झब्बू!ङ्ग
और लड़खड़ाती हुई आगे बढ़ी। मिट्टी और पत्थरों को अपने हाथों से हटाने लगी। उँगलियों में मिट्टी भर गई, हथेलियाँ छिलने लगीं, लेकिन उसने परवाह नहीं की। कुछ ही क्षण बाद मलबे के भीतर से धीमी आवाज़ आई। झब्बू जीवित था।
चित्रा की आँखों से आँसू बह निकले। उसने उसे अपनी बाहों में भर लिया।
ङ्खतू भी नहीं गया मुझे अकेला छोड़कर।
झब्बू ने उसके हाथ को चाट लिया।
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चित्रा ने पहली बार महसूस किया कि शायद उस भयावह घड़ी में वह अकेली नहीं थी। उसका वफादार झब्बू उसके घर, उसकी देहरी और शायद उसे भी बचाए रखने के लिए आख़िरी दम तक वहीं रहा था। शहर में सुजान पूरी रात बेचैन रहा। बार-बार माँ को फोन मिलाता रहा, मगर नेटवर्क बंद था। टीवी पर पहाड़ी क्षेत्र में आई तबाही की खबरें चल रही थीं। स्क्रीन पर टूटे हुए घर, कीचड़ में दबे रास्ते और रोते-बिलखते लोगों के दृश्य दिखाई दे रहे थे। सुजान का चेहरा पीला पड़ गया। उसके मुँह से बस एक शब्द निकला-ङ्खमाँ!ङ्ग और उसी क्षण वह गाँव के लिए निकल पड़ा।
रास्ते जगह-जगह बंद हो गए थे। कई किलोमीटर तक उसे पैदल चलना पड़ा। जितना वह गाँव के करीब पहुँचता, उसका डर उतना ही बढ़ता जाता।
आख़िरकार जब वह गाँव की सीमा पर पहुँचा तो उसके कदम ठिठक गए। वह गाँव, जिसे उसने बचपन में अपनी पूरी दुनिया समझा था, अब पहचान में नहीं आ रहा था। कहीं दीवार का आधा हिस्सा खड़ा था, कहीं छत का टूटा हुआ टुकड़ा। कुछ घर पूरी तरह मिट्टी में मिल चुके थे। सुजान की आँखें अपने घर को खोज रही थीं, तभी मलबे के बीच में उसे जाना-पहचाना-सा लकड़ी का दरवाज़ा दिखाई दिया। सुजान दौड़कर गया।
ङ्खमाँ!ङ्ग
चित्रा ने सिर उठाया। कुछ क्षणों तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे, फिर सुजान माँ से लिपट गया।
ङ्खमाँ! आप ठीक हो न?ङ्ग
चित्रा ने उसके सिर पर हाथ रखा और बोली- ङ्खतू आ गया, बस!ङ्ग न कोई शिकायत, न कोई उलाहना।
सुजान की आँखों से आँसू बह निकले और रुँधे गले से बोला-
ङ्खमैं आपको कितनी बार कहता था। माँ, मेरे साथ शहर चलो, लेकिन आप मेरी बात नहीं मानती थीं।
चित्रा हल्का-सा मुस्कुराई और कहने लगी-
ङ्खतू मेरी बात कब मानता था।
सुजान चुप हो गया। चित्रा ने उसकी ओर देखा और कहने लगी-
ङ्खतुझे याद है, जब तू छोटा था तो बारिश से डरकर मेरी गोद में छिप जाता था।ङ्ग
सुजान के होठों पर धीमी-सी मुस्कराहट उभरी। मन में वही पुराना विश्वास जाग उठा और बोला-
ङ्खहाँ माँ! और आप कहती थीं, डर मत, मैं हूँ न!ङ्ग
चित्रा ने उसका हाथ थाम लिया। आज भी वही कहूँगी-
ङ्खडर मत, मैं हूँ न!ङ्ग
सुजान ने माँ का हाथ कसकर पकड़ लिया और बोला-
ङ्खनहीं माँ, अब मैं हूँ।
दोनों कुछ देर तक चुप रहे। उनके बीच वर्षों से जमा बहुत-सी बातें थीं, मगर उस क्षण किसी शब्द की जरूरत नहीं थी।
सुजान ने अगले दिन माँ को शहर ले जाने की तैयारी शुरू कर दी। इस बार चित्रा ने कोई विरोध नहीं किया। जाने से पहले वह एक बार अपनी देहरी के पास जाकर बैठ गई। उसने हथेली से मिट्टी उठाई, माथे से लगा ली और धीमे से कहा-
ङ्खतीस साल तक तूने मुझे संभाला है। अब कुछ दिन मुझे अपने बेटे के घर भी रह लेने दे।ङ्ग
सुजान दूर खड़ा माँ को देख रहा था। उसने पहली बार समझा कि माँ की इस देहरी से कितनी स्मृतियाँ जुड़ी हैं।
सच ही तो है-इसी देहरी से उसने अपने पति को अंतिम विदाई दी थी। इसी देहरी पर बैठकर उसने अपने बेटे को आँचल में बैठाकर अनेकों सपने बुने थे। इसी देहरी पर हर बार सुजान के लौटने की राह देखी थी। घर केवल ईंट-पत्थरों से नहीं बनता; कुछ घर यादों से बनते हैं और कुछ रिश्ते शब्दों के बिना भी पूरी उम्र निभते हैं।
सुजान ने माँ का हाथ थामा।
ङ्खचलो! माँ!ङ्ग
चित्रा ने आख़िरी बार पीछे मुड़कर देखा। मलबे के बीच खड़ी वह देहरी अब भी वैसे ही थी। उसने मुस्कुराकर कहा- ङ्खमैं फिर आऊँगी।ङ्ग
सुजान ने कहा- ङ्खकब?ङ्ग चित्रा ने उसकी ओर देखा- ङ्खजब तू मुझे फिर मेरी देहरी तक छोड़ने आएगा।ङ्ग
सुजान ने चित्रा की ओर देखा और धीमे से बोला-
ङ्खमाँ! यह हमारी देहरी है, इससे हमारा जीवन भर का नाता है। बस कुछ दिनों बाद... हम जल्दी वापस लौटेंगे।ङ्ग चित्रा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस बेटे का हाथ थाम लिया।
सुजान भी माँ का हाथ थामे आगे बढ़ता गया। झब्बू चित्रा के साथ था, बस पीछे रह गया था उसका घर... और आगे था बेटे पर विश्वास।
राजश्री बिष्ट ‘रश्मिका
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