बँटवारा रिश्तों का
in

बँटवारा रिश्तों का

बँटवारा रिश्तों का अकसर दिल तोड़ जाता है,

मासूम बच्चों के कोमल मन को चोट बहुत पहुँचाता है,

बड़े तो अपनी जीत पे खुशियाँ मनाते हैं, मुस्कुराते हैं,

पर ये मासूम बच्चे खुद को तो बहुत ही तन्हा पाते हैं,

अपनी मन की किसी से कह न पाते हैं,

बस अकेले बैठ कर सोचा करते हैं,

बड़े हो कर, सब ठीक करना है मुझे,

मेरे अपनों, मेरे प्यारों को फिर से जोड़ना है मुझे,

रिश्तों में पड़ी दरारों को भरना है मुझे,

पर मासूम बच्चे ये कहाँ समझ पाते हैं,

रिश्तों में पड़ी दरारों को भरना बड़ा ही मुश्किल होता है,

ज्यों-ज्यों वक़्त गुजरता जाता है,

ये और गहरा होता जाता है,

ये हक़ीक़त तो बड़े होने के बाद ही पता चलती है,

जब पता चलती है, फिर से मन पे चोट बहुत लगती है।

Faza Saaz

What do you think?

Written by Faza Saaz

One Comment

Leave a Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Screenshot 2022 02 04 214455

ज़िंदगी का मुसाफ़िर

स्वामी विवेकानंद

भारतीय अध्यात्म और राष्ट्रवाद के अन्तरराष्ट्रीय प्रवक्ता स्वामी विवेकानंद