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इन दरारों से कहीं

दरारों
खिड़की से भीतर आती
लैंप पोस्ट की रोशनी
जब मेरे कमरे में गिरती है,
भरम होता है कि चाँदनी है।
हर बार होता है।
हाँ! मैं जानता हूँ
चाँदनी दूधिया होती है, पीली नहीं,
पर इंतज़ार में हर आहट
आने वाले की आमद का भरम देती है।
मुझे किसी चाँदनी का इंतज़ार है,
कि उसी चाँदनी की सीढ़ी बनाकर
किसी रात मेरे कमरे में चाँद उतरे।
मेरी खिड़की से तो चाँद दिखता ही नहीं है !
हमारे दरमियाँ हैं मेरे घर के चारों ओर बनी
ऊँची-ऊँची, सिर उठाए, घनी इमारतें,
मैं इन इमारतों के गिरने की
दुआ भी नहीं कर सकता,
क्योंकि इन इमारतों में इंसान रहते हैं
इंसान जिसे गुमान है बुनियादी होने का
और चिपका हुआ है सड़ी बुनियाद पे खड़ी
परम्पराओं की इमारत से।
पर मैं चाहता हूँ
घनी इमारतों की किसी दरार से होकर
थोड़ी चाँदनी मेरे घर तक पहुँचे।
और चाँद उतरे किसी रात मेरे कमरे में
उसी चाँदनी को सीढ़ी बनाकर।
अमन चंद्रा

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